भगवद्गीता 9.3
Raja Vidya Raja Guhya Yoga · हिन्दी अनुवाद
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप | अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ||९-३||
aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya parantapa . aprāpya māṃ nivartante mṛtyusaṃsāravartmani ||9-3||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि इस पवित्र धर्म या ज्ञान में श्रद्धा (विश्वास) न रखने वाले मनुष्य मुझे प्राप्त नहीं कर पाते। वे भूल जाते हैं और फिर से उसी मृत्युरूप संसार के चक्र में वापस लौट आते हैं जो दुखों और जन्म-मरण का सांचा है। इस श्लोक की मुख्य शिक्षा यह है कि ईश्वर या परमात्मा तक पहुँचने के लिए निष्काम भाव से पूर्ण विश्वास करना अनिवार्य है, अन्यथा हमारी प्रगति रुक जाती है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक भक्ति योग और ज्ञान योग के मिलन पर आधारित है, जो बताता है कि 'श्रद्धा' (विश्वास) ही कर्मयोग का पहला चरण है जिसके बिना कोई आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं। यह सिखाता है कि ब्राह्मण या दैवीय स्वरूप को प्राप्त करने के लिए ज्ञान और क्रिया दोनों की आवश्यकता होती है, लेकिन इनका आधार 'श्रद्धा' ही है। बिना इस श्रद्धा के, व्यक्ति कर्मों (karma) में फंसकर संसार चक्र (samsara) में बंधा रह जाता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दी गई शिक्षाओं का एक हिस्सा है, जो 'राजविद्या राजगुह्य योग' (अध्याय 9) में आता है। इससे ठीक पहले कृष्ण ने अपने विश्वरूप दर्शाने के बाद अर्जुन को भक्ति और ज्ञान का महत्व समझाया था, लेकिन अर्जुन अभी भी निश्चिंत नहीं थे या युद्ध में शामिल होने की तैयारी कर रहे थे। इस संदर्भ में कृष्ण उन लोगों (और विशेष रूप से अर्जुन जैसे जिज्ञासु) के लिए चेतावनी दे रहे हैं जो मन में शंका रखते हैं, क्योंकि शंका ही आत्म-साक्षात्कार की सबसे बड़ी बाधा है।
आज के जीवन में
मान लीजिए आप एक नौकरी बदलने या व्यापार शुरू करने का निर्णय ले रहे हैं और आपके भीतर ईश्वर पर पूर्ण विश्वास के साथ आगे बढ़ना है, लेकिन डर और शंका (अश्रद्धा) आपको रोक रही है। जब आप 'मृत्युसंसारवर्त्मन' या निराशा की राह पर चलते हैं, तो आप बिना किसी दिशा के घूमते रह जाते हैं और तनाव बढ़ता जाता है। इस श्लोक का उपयोग करते हुए, आपको अपने कर्मों में ईश्वर को समर्पित करना चाहिए (जैसे भगवद गीता 2.47 की सिद्धांत), क्योंकि यह विश्वास आपको उस चक्र से मुक्त कर देगा जहाँ आप बार-बार वही त्रुटियां दोहरा रहे हैं।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
मान लो एक बहुत पुरानी और सुंदर खजाने की कहानी (यह धर्म) है जो आपको बताती है कि कैसे आप अपने सबसे अच्छे दोस्त (भगवान कृष्ण) को पा सकते हैं। अगर कोई बच्चा इस कहानी पर भरोसा नहीं करता या उसे पढ़ना ही छोड़ देता, तो वह खजाना और उसका दोस्त दोनों हाथ से निकल जाते हैं और वे फिर से वही खेलने की जगह (संसार) में वापस आकर अकेला महसूस करते हैं। कृष्ण जी कह रहे हैं कि अगर तुम भरोसा करोगे, तो वह खजाना मिल जाएगा और हमेशा के लिए खुश रह लोगे; लेकिन बिना विश्वास के वे रास्ते पर ही घूमते रहेंगे।
दैनिक चिंतन
प्रिय पाठक, क्या आपने कभी महसूस किया है कि जीवन में कुछ भी हासिल करने के बावजूद भी आंतरिक शांति और दिशा का अभाव रहा? भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में स्पष्ट करते हैं कि 'श्रद्धा' की अनुपस्थिति ही हमें मृत्यु-संसार में फंसाए रखती है। जब आप अपना विश्वास ईश्वर पर केंद्रित करेंगे, तो यह अंधेरा संसार आपके लिए मुक्त मार्ग बन जाएगा और आपको वास्तविक गति मिलने लगेगी।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन में 'श्रद्धा' (विश्वास) की कमी को पहचानें और उसे भगवान श्रीकृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण से बदलने का संकल्प लें। इस ध्यान में यह अनुभव करें कि जब तक हम ईश्वर पर अटूल विश्वास नहीं रखते, तब तक मृत्यु-संसार की चक्रवाहरी यात्रा समाप्त नहीं हो सकती।
मुख्य शिक्षाएँ
- श्रद्धा का महत्व (The Importance of Faith)
इस श्लोक में 'अश्रद्दधान' या अविश्वास को ही मृत्यु-संसार में वापसी का मुख्य कारण बताया गया है। बिना ईश्वर पर पूर्ण विश्वास के, ज्ञान और कर्म भी आत्मिक प्रगति नहीं ला सकते। - मिट्टी की यात्रा (The Cycle of Samsara)
जो व्यक्ति इस धर्म में श्रद्धालु नहीं है, वह मृत्युरूपी संसार के चक्रव्यूह से बाहर निकलने का मार्ग भूल जाता है। यह बताता है कि अविश्वास हमें कर्म-संस्कारों और पुनर्जन्म की जंजीरों में बंधे रखता है। - ईश्वर प्राप्ति का मार्ग (Path to Divine Realization)
भक्तियों के बिना ईश्वर को प्राप्त नहीं किया जा सकता; श्रद्धा ही वह कुंजी है जो द्वार खोलती है। इस राज-विद्या में प्रवेश करने वाले व्यक्ति ही संसार की पीड़ा से मुक्ति पाते हैं।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — यह श्लोक कर्म योग का आधार स्तंभ है और बताता है कि फल के चिंतन में न रहकर कार्य पर ध्यान देना क्यों आवश्यक है।
- 3.30 — इस श्लोक में पूर्ण समर्पण (sarva-karma-sannyasa) का वर्णन है जो 9वें अध्याय के 'मैं' को प्राप्ति करने वाला सीधा मार्ग प्रस्तुत करता है।
- 12.15 — इस श्लोक में भक्त की गुणों का वर्णन किया गया है जो ईश्वर को प्राप्त करने और संसार से मुक्ति पाने के लिए आवश्यक हैं।
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