भगवद्गीता 8.6
Akshara Brahma Yoga · हिन्दी अनुवाद
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् | तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ||८-६||
yaṃ yaṃ vāpi smaranbhāvaṃ tyajatyante kalevaram . taṃ tamevaiti kaunteya sadā tadbhāvabhāvitaḥ ||8-6||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि मनुष्य के शरीर त्यागे जाने वाले क्षण (अन्तकाल) में जिस विचार या भाव का ध्यान उस व्यक्ति की आत्मा पर सर्वाधिक होता है, वह ही उसके बाद प्राप्त होने वाली अवस्था निर्धारित करता है। यदि आपने जीवन भर शुभ और पवित्र चिंतन किया है, तो अंतिम समय भी उसी दिशा में होगा, जिससे आप उच्च लोक या मोक्ष की प्राप्ति करेंगे। इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि हमारा भव्य भाग्य सीधे तौर पर हमारे निरंतर चिंतन और मन के प्रवाह से जुड़ा होता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक गीता के दृढ़ संस्कृत दर्शन, विशेषकर भाव-योग (ध्यान योग) और पुनर्जन्म सिद्धांत का आधार स्तंभ है। यह संक्या और वेदांत की उस अवधारणा को विकसित करता है कि 'अहम्कार' या निजी अस्तित्व के साथ जुड़ा हुआ मन, कर्मों से मुक्त होकर भी विचारों (वासनाओं) द्वारा ही पुनर्जन्म का बोझ वहन करता है। यह सिद्धांत बताता है कि आत्मा की गतिशीलता सीधे उसकी अंतिम चेतना के स्वरूप पर निर्भर करती है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर स्थित है, जहाँ पांडव और कौरवों के बीच निर्णायक संघर्ष चल रहा था। इस समय अर्जुन ने अपने गुरु भगवान श्री कृष्ण को अपना शस्त्र फेंक दिया था क्योंकि उन्हें अपनी ही जाति-भ्राताओं से युद्ध करने में घोर संशय और करुणा थी। जब कृष्ण जी ने अर्जुन के मन के इस उदासीन अवस्था का निवारण किया और गीता की शिक्षाएं देना शुरू किया, तो यह श्लोक उस समय आया था जब अर्जुन को अपने भव्य भाग्य और पुनर्जन्म पर संदेह था।
आज के जीवन में
आज के तनावपूर्ण कार्य-स्थल (workplace) में यदि आप लगातार सफलता, ईमानदारी और टीम की खुशी के बारे में सोचते हैं, तो कठिन निर्णय लेने या प्रोजेक्ट खत्म होने पर भी आपका मन शांत रहेगा। इसके विपरीत, अगर आप पूरे दिन चिंता, लोभ या दूसरों को दोष देने वाले विचारों में डूबे रहेंगे, तो अचानक कोई बड़ी समस्या आने पर वह ही आपके सबसे बड़े मानसिक बोझ के रूप में उभरेगी। इसलिए, एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट समापन या नौकरी बदलते समय भी 'अच्छा हो जाएगा' और 'मैं कर सकता हूँ' जैसे सकारात्मक विचारों को मन में बसाए रखना आवश्यक है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
बच्चों, सोचिए जैसे आप रात को सोने जाते हैं तो जिस बात या कहानी का सबसे ज्यादा ख्याल आता है, वही सपनों में आपको मिल सकती है। इसी तरह जब हमारी सांसें रुकती हैं और शरीर छोड़ देते हैं, तो जो विचार मन में सबसे मजबूत होता है, वह आपकी अगली यात्रा का रास्ता बनाता है। इसलिए कृष्ण जी कहते हैं कि हमें हर समय अच्छी बातों के बारे में सोचना चाहिए ताकि हमारा भविष्य भी उज्ज्वल हो सके।
दैनिक चिंतन
आप अपने दिन को कैसे बिता रहे हैं, आपकी अंतिम श्वास उसी रूप में बदल जाएगी क्योंकि जीव सदैव जिस भाव से रहकर मृत्यु की ओर जाता है, वही उसके बाद का संसार बनता है। आज केवल यह नहीं देखिए कि क्या किया, बल्कि यह भी सोचिए कि आप किस 'भाव' (मनोदशा) में रहे हैं और वह आपके भविष्य को कैसे आकार देगा। कृष्ण की इस वाणी से प्रेरित होकर अपने विचारों को शुद्ध करें ताकि अंतिम क्षण आपको उसी दिव्यता का अनुभव दिलाने वाला बनाए जो आपने आज ही पालन किया है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के अंत में, अपने मन को शांत करके यह सोचें कि आप किस भावना या विचार से जी भरकर रह रहे हैं। इस शरीर को छोड़ने वाले क्षण की कल्पना करें और उसी दिशा में अपना हृदय समर्पित करने का संकल्प लें, भले ही वह प्रेम हो, सेवा हो या ईश्वर के प्रति आस्था।
मुख्य शिक्षाएँ
- अंतकाल की भावना निर्धारित करती है गति
जो भी विचार या आस्था मनुष्य के अंतिम क्षण में प्रबल होती है, वही उसके बाद का जन्म और अनुभव तय कर देता है। यह सिद्धांत बताता है कि शारीरिक मौत नहीं, बल्कि मानसिक स्थिति ही परमात्मा की ओर या पृथ्वी के चक्र में वापसी को निर्देशित करती है। - सादगी और निरंतरता का महत्व
चूंकि अंतिम क्षण की स्थिति हमेशा प्रबल होती है, इसलिए जीवन भर सतत तपस्या या विचारों के अभ्यास (स्मरण) की आवश्यकता है। यह समझना जरूरी है कि एक बार का ध्यान पर्याप्त नहीं है; 'सदा' (हमेशा) उस भाव को जीने वाला ही उसे प्राप्त करता है, न कि अचानक किया गया कार्य। - विश्वास और भक्ति की शक्ति
इस उपदेश में 'काउन्तेय' (अर्जुन) को संबोधित करके कृष्ण संकेत दे रहे हैं कि ईश्वर के प्रति समर्पण भाव ही सबसे उत्कृष्ट अंतिम विचार है। यदि जीव निरंतर भगवान या धर्म का स्मरण करता रहता है, तो वह अवश्य 'ब्रह्म' (अक्षय सत्य) को प्राप्त होता है और मोच के चक्र से मुक्त हो जाता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — यह वर्ज कर्मयोग की मूलभूत सिद्धांतों को समझता है, जो इस अंतिम क्षण के परिणामों का आधार बनते हैं।
- 3.30 — इसमें कर्मों की समर्पण भावना का वर्णन है, जो 8वीं अध्याय में चर्चित 'भाव' को शुद्ध करने के लिए आवश्यक है।
- 12.15 — इसमें भक्त की गुणों और ईश्वर प्रेम का वर्णन है जो अंतिम समय में सबसे बड़ा सहायक सिद्ध होता है।
अनुशंसित पुस्तकें
GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.