भगवद्गीता 8.13

Akshara Brahma Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 8.13 — "जो पुरुष ओऽम् इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, व"
भगवद्गीता 8.13 — Akshara Brahma Yoga
संस्कृत

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् | यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ||८-१३||

लिप्यंतरण

omityekākṣaraṃ brahma vyāharanmāmanusmaran . yaḥ prayāti tyajandehaṃ sa yāti paramāṃ gatim ||8-13||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि मृत्यु के क्षण में यदि कोई व्यक्ति 'ॐ' नामक एकमात्र ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और भगवत् स्वरूप का चिंतन करके शरीर त्याग देता है, तो वह अत्यधिक पवित्र होता है। यह श्लोक बताता है कि मृत्यु के समय मानसिक स्थिति ही निर्णायक होती है; यदि मन ईश्वर और परब्रह्म में लीन हो जाए, तो व्यक्ति को तत्काल मोक्ष या 'परमा गति' प्राप्त हो जाती है। कृष्ण ने अर्जुन को यह मार्ग दिखाया है ताकि वह संघर्ष के बाद भी आध्यात्मिक रूप से संपूर्ण बन सकें।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'ध्यान योग' और 'भक्ति योग' के सिद्धांतों पर आधारित है जो अंततः 'अक्षर ब्रह्म' (The Imperishable Brahman) की अवधारणा को विकसित करते हैं। यह दर्शाता है कि निष्काम कर्म और भक्तियों का फल तब तक प्राप्त नहीं होता जब तक मन ईश्वरीय स्वरूप में स्थिर न हो जाए, जो 'ईश्वर-प्रतिपत्त' (God-realization) की कुंजी है। यह श्लोक बताता है कि आत्मसाक्षात्कार का अंतमार्ग मृत्यु के क्षण में भी सही संकल्प और स्मरण पर निर्भर करता है।

शब्दार्थ
Om, इति thus, एकाक्षरम् onesyllabled, ब्रह्म Brahman, व्याहरन् uttering, माम् Me, अनुस्मरन् remembering, यः who, प्रयाति departs, त्यजन् leaving, देहम् the body, सः he, याति attains, परमाम् supreme, गतिम् goal
पारंपरिक भाष्य
Having controlled the thoughts the Yogi ascends by the Sushumna, the Nadi (subtle psychic nervechannel) which passes upwards from the heart. He fixes his whole Prana or lifreath in the crown of the head in the Brahmarandhra or the hole of Brahman. He utters the sacred monosyllable Om, meditates on Me and leaves the body.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में पड़ता है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन एक दूसरे की बीच बसे रथ पर खड़े हैं। इस समय तक कृष्ण ने अर्जुन को धर्म, आत्मा और अध्यात्म के गहन सिद्धांत समझा दिए हैं (2.1 से 7वें अध्याय)। अब युद्ध शुरू होने वाला है और अर्जुन संघर्ष में अपने पिताजी का वध करने की चिंता कर रहे हैं, जबकि कृष्ण उन्हें यह आश्वासन दे रहे हैं कि मृत्यु के क्षण कैसे सही तैयारी से भरे रहने चाहिए।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप किसी महत्वपूर्ण परीक्षा या जीवन का निर्णायक संघर्ष (जैसे नौकरियां छोड़ना) कर रहे हैं और अत्यंत तनाव में हैं, तो इस श्लोक की प्रेरणा यह है कि अपने मन को उस एक सिद्धांत या ईश्वर के नाम पर केंद्रित करें जो आपके लिए सबसे पवित्र है। किसी भी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में जब आप चिंता से भर जाएं, तो 'ॐ' का उच्चारण और आत्म-ज्ञान की दृष्टि आपको बाहरी शोर से अलग करके शांत मन के साथ निर्णय लेने में मदद करेगी। यह सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी भयावह हों, आपके मानसिक ध्यान को स्थिर रखना ही सफलता की कुंजी है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम एक बड़े प्यारे खेल में हो और अब समय समाप्त होने वाला है, तो क्या तुम उसी तरह हंसी-खेल के साथ चलोगे या चिंतित रहकर? भगवान कृष्ण कहते हैं कि जैसे हम अंत में जो सोचते हैं वही हमारी परवाह बनता है। अगर आप मरने से पहले 'ॐ' बोलते हुए और प्रभु को याद करते हुए अपने मन को शांत रखें, तो आपको एक बहुत ही सुंदर नई दुनिया मिल जाएगी जहाँ कोई डर नहीं होता।

दैनिक चिंतन

आज जब आप किसी कार्य या संवाद में व्यस्त हों, तो अपने मन को इस बात पर केंद्रित करें कि यह क्षण भी भगवान का स्मरण करने के लिए ही उपलब्ध है। यदि शरीर त्यागने की स्थिति आ गई, तो क्या आपके पास 'ॐ' और प्रभु का एक साथ ध्यान रखने की तैयारी होगी? याद रखें कि अंतिम समय में जो भावना और विचार होता है, वही आपको परम गति दिलाता है।

आज के लिए एक अभ्यास

अपने मन को स्थिर करके 'ॐ' नाम के एक मात्र अक्षर का उच्चारण करें और अपने हृदय में भगवान श्री कृष्ण की प्रेममयी उपस्थिति को अनुभव करें। इस श्वसन क्रिया में यह आत्म-संकल्पना करें कि आप जो भी कर रहे हैं, उसे ईश्वरीय स्मरण के साथ समर्पित करते हुए अंतिम समय तक ध्यान बनाए रखेंगे।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. एकमात्र ब्रह्म का स्वरूप
    'ॐ' शब्द को केवल ध्वनि नहीं, वरन सनातन और अविनाशी ब्रह्मानुभव का प्रतीक माना गया है जो समस्त सृष्टि में व्याप्त है। यह एकल अवयव (एकाक्षर) उस निगूढ़ सत्य की ओर इशारा करता है जिसे केवल आत्म-ज्ञानियों द्वारा ही अनुभवा किया जा सकता है।
  2. दोहरी स्मृति का महत्व
    इस श्लोक में दो प्रमुख साधनाओं पर जोर दिया गया है: ईश्वर के नाम (ॐ) का उच्चारण और स्वयं भगवान कृष्ण का निरंतर स्मरण। यह संकेत देता है कि बाहरी ध्यान (उच्चारण) और आंतरिक प्रेमभावना (स्मरण) का संगम ही सफल साधना की कुंजी है।
  3. परमावस्था प्राप्ति
    शरीर त्यागते समय जो व्यक्ति इन दोनों तत्वों में समर्पित होता है, वह मोह और कर्म के बंधनों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करता है। यह अंतिम क्षण का महत्व बताता है कि जीवन भर की साधनाओं का फल उसी समय मिलता है जब मृत्यु द्वार खुलता है।

विषय

मृत्यु के क्षण में चेतना (Consciousness at death)ॐ का महत्व (Significance of Om)अक्षर ब्रह्म (The Imperishable Brahman)ईश्वर स्मरण (Remembrance of God)परमा गति (Supreme Goal/Moksha)ध्यान योग (Yoga of Meditation)

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  1. 8.5 — इस श्लोक का सीधा विस्तार करता है कि मृत्यु के समय मन में क्या आता है, वह वही गति प्राप्त कर लेता है।
  2. 17.23 — 'ॐ तत्सत' का उच्चारण और उसके महत्व पर विस्तृत चर्चा करता है जो इस अध्याय की साधना से जुड़ा हुआ है।
  3. 18.54 — 'ब्रह्मभूत' होने का वर्णन करता है, जो उस परमावस्था को परिभाषित करता है जहाँ यह श्लोक ले जाता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'एकाक्षर' से तात्पर्य क्या है?
'एकाक्षर' का अर्थ है वह ध्वनि जिसमें केवल एक मात्र वर्ण या स्वर हो, और यह यहाँ 'ॐ (ओम्)' को संदर्भित करता है। गीता में इसे संपूर्ण ब्रह्म की अभिव्यक्ति माना गया है जो सर्वश्रेष्ठ उच्चार्य ध्वनि के रूप में कार्य करती है।
क्या यह श्लोक केवल मृत्यु के समय ही लागू होता है?
हालांकि इसका सीधा संदर्भ 'देह त्याग' (मृत्यु) से जुड़ा है, लेकिन इसका अभिप्राय जीवन भर में भी ध्यान और स्मरण का अनुसरण करना सिखाना है। यदि आप जीवित रहते हुए ही अपने मन को ईश्वर और ओम् के चिंतन पर स्थिर कर लेते हैं, तो मृत्यु के क्षण तक की तैयारी स्वतः पूरी हो जाती है।
'परमा गति' से क्या तात्पर्य है?
'परमा गति' का अर्थ है मोक्ष या ब्रह्मलोक में प्रवेश करना, जहाँ से कोई पुनर्जन्म नहीं होता। यह आत्म-समुद्र के साथ मिलने की अवस्था है जो सभी दुखों और संसारिक कष्टों से मुक्ति देती है।
क्या इस श्लोक में भगवान का स्मरण करना आवश्यक है?
हाँ, इस श्लोक के अनुसार दो चीजें अनिवार्य हैं: 'ॐ' का उच्चारण और भगवान (श्री कृष्ण) का स्मरण। यह दोनों मिलकर आत्मा को ब्रह्म की ओर ले जाने वाला पथ प्रदर्शित करते हैं, जहाँ मन पूर्णतः एकनिष्ठ हो जाता है।
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