भगवद्गीता 7.6

Jnana Vijnana Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 7.6 — "यह जानो कि समम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से उत्पत्ति वाले हैं। (अत:) मैं सम्पूर्ण जगत् का उत्पत्"
भगवद्गीता 7.6 — Jnana Vijnana Yoga
संस्कृत

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय | अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ||७-६||

लिप्यंतरण

etadyonīni bhūtāni sarvāṇītyupadhāraya . ahaṃ kṛtsnasya jagataḥ prabhavaḥ pralayastathā ||7-6||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि संपूर्ण जगत की उत्पत्ति और प्रलय का कारण स्वयं वे ही हैं। इसमें यह सिद्ध किया गया है कि सभी प्राणी दो प्रकारों (प्रकृतियों) से उपजी हैं, लेकिन इन दोनों के मूल स्रोत कृष्ण स्वयं हैं। मुख्य शिक्षा यह है कि विश्व की रचना और विनाश का अंतःस्थित कारण ईश्वर में निहित है, न कि केवल भौतिक तत्वों में।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक ज्ञान और विज्ञान योग (Jnana Vijnana Yoga) का केंद्रीय सिद्धांत है जो 'अद्वैत वेदांत' की धारा में आता है, विशेष रूप से भगवान के सर्वव्यापक होने पर। यह संख्या या सांख्य दर्शन के द्वंद्वों (जैसे प्रकृति और पुरुष) को भी स्वीकार करता है लेकिन उनका अंतिम स्रोत 'ब्रह्मा' में जोड़ता है, जहाँ भगवान स्वयं सभी प्राणियों की उत्पत्ति का कारण हैं। यह सिद्धांत बताता है कि ईश्वर के बिना न कोई वस्तु बन सकती है और न ही विनष्ट हो सकती है।

शब्दार्थ
एतद्योनीनि those of which these two (Prakritis) are the womb, भूतानि beings, सर्वाणि all, इति thus, उपधारय know, अहम् I, कृत्स्नस्य of the whole, जगतः of the world, प्रभवः source, प्रलयः dissolution, तथा also
पारंपरिक भाष्य
These two Natures, the inferior and the superior, are the womb of all beings. As I am the source of these two Prakritis or Natures also? I am the cause of this universe. The whole universe originates from Me and dissolves in Me. In the Brahma Sutras (chapter 1, section 1, aphorism 2) it is said? Janmadyasya yatah meaning that Brahman is that omniscient and omnipotent cause from which proceed the origin, subsistence and dissolution of this world. Just as the mind is the material cause and also the seer (Drashta) for the objects seen in a dream, so also Isvara is the material cause of this world (UpadanaKarana) and also the seer (Drashta). He is also the efficient or the instrumental cause (NimittaKarana). (Cf. XIV.3)

यह कहाँ घटित होता है

यह संवाद महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हो रहा है, जहाँ पांडवों की सेना और कौरवों का विरोध चल रहा था। इससे पहले कृष्ण ने अर्जुन को 'ज्ञान' (2.1) और 'विज्ञान' के महत्व पर बातें करते हुए उन्हें भयमुक्त किया है, क्योंकि अर्जुन युद्ध करने से इनकार कर रहे थे और उदास हो चुके हैं। कृष्ण अब इस श्लोक में अपने सर्वशक्तिमान स्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं ताकि अर्जुन समझ सके कि वे केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि पूरे जगत के रचयिता और विनाशक भी हैं।

आज के जीवन में

एक कठिन प्रोजेक्ट या व्यवसायिक संकट में जब आप अपने हाथों से सब कुछ खोने का डर महसूस करें, तो यह श्लोक आपको यह समझाता है कि परिणाम आपके नियंत्रण में नहीं हैं। बजाय इस बात की चिंता करने के कि क्या होगा यदि योजना विफल हो गई (प्रलय), आप ईश्वरीय व्यवस्था पर भरोसा कर सकते हैं क्योंकि सभी प्रक्रियाएं एक उच्च स्रोत से आती हैं और वहां लौट जाती हैं। यह दृष्टिकोण आपको 'कर्म' में लगने के लिए प्रेरित करता है, जबकि परिणामों की चिंता त्याग देते हुए मानसिक शांति बनाए रखें।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो जैसे एक बड़ा पेड़ जिससे सारे पत्ते, फूल और डालियां निकलती हैं, लेकिन वह पूरा पेड़ उसी मजबूत जड़ से आता है जो धरति के अंदर छिपा होता है। भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि जैसे एक ही सूरज की रोशनी में सब कुछ दिखाई देता है और डुबा भी सकता है, वैसे ही पूरा संसार उनकी शक्ति से बना है और वहीं खत्म भी हो जाता है। मतलब यह कि हमारा अहसास करना चाहिए कि हर जगह ईश्वर का हाथ छिपा हुआ है जो सब कुछ पालता है।

दैनिक चिंतन

आज जब आप जीवन की किसी भी घटना का सामना करते हैं, तो याद रखें कि यह क्षण आपके ही होने वाले उत्पत्ति और प्रलय (विघटन) का एक हिस्सा है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि वे समस्त जगत के उद्भव और विध्वंस दोनों की जड़ हैं; इसलिए आपकी वर्तमान स्थिति अस्थायी नहीं, बल्कि ईश्वरीय योजना का ही परिपाट्य है। जब आप यह स्वीकार कर लेते हैं कि सब कुछ उस एक स्रोत से आया है और वहीँ लौटेगा, तो डर खत्म हो जाता है और आपको गहरा शांति अनुभव होती है।

आज के लिए एक अभ्यास

अपने अंतर में स्थित होकर सोचें कि आपके शरीर और मन की हर कण, जो 'प्रकृति' के दो रूपों से बना है, उसमें वही एक परम आत्मा का संचरण कर रहा है। स्वयं को विश्व के कर्मभूमि में नहीं, बल्कि उसके मूल स्रोत और अंत—ब्रह्मन—के निवासस्थान के रूप में स्वीकार करें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. समस्त भूतों की उत्पत्ति का स्रोत
    यह श्लोक स्पष्ट करता है कि समग्र जगत के सभी प्राणी और वस्तुएं द्वैध प्रकृतियों (प्रकृति) से ही उभरी हैं। यह हमें याद दिलाता है कि हर रचना का मूल स्रोत ईश्वर स्वयं हैं, जो उनमें निहित शक्ति को देते हैं।
  2. उत्पत्ति और प्रलय की जड़
    भगवान कृष्ण खुद को 'जगत का उत्पत्ति' (प्रभव) और 'विध्वंस' (प्रलय) दोनों का स्थान बताते हैं। इसका अर्थ है कि सृष्टि का प्रारंभ भी उनके द्वारा होता है और विघटन या समाप्ति भी उनकी ही इच्छा से घटित होती है।
  3. अविनाशी चेतना की पहचान
    जब हम समझते हैं कि शारीरिक विश्व बदलता रहता है लेकिन सृष्टि का मूल आधार अटूट है, तो हम अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेते हैं। यह ज्ञान (ज्ञान योग) हमें कर्म के चक्र से मुक्ति दिलाकर मोक्ष की ओर ले जाता है।

विषय

ईश्वर का सर्वव्यापकत्वउत्पत्ति और प्रलयदोनों प्रकृतियाँ (प्रकृति)आत्म-ज्ञानभक्ति योग की नींवसंसार का स्वरूप

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — इस श्लोक में कर्मयोग का सिद्धांत दिया गया है, जो भगवान की प्रकृति के रूप में कार्य करने और परिणामों से मुक्त होने का मार्ग दिखाता है।
  2. 3.30 — यह श्लोक कर्मों को ईश्वर को समर्पित करने की विधि बताता है, जो 7.6 के 'समस्त जगत का प्रभु' होने वाले संकल्प से सीधा जुड़ाव रखता है।
  3. 12.15 — यह श्लोक भगवान की सर्वोपनिवेशी और करुणाशील प्रकृति का वर्णन करता है, जो 7.6 में बताए गए 'उत्पत्ति' के स्नेहपूर्ण पहलू को गहराई से समझाता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'दोनों प्रकृतियाँ' कौन सी हैं?
यहाँ 'दोनों प्रकृतियाँ' से अभिप्राय भगवान की दो विभेदनशील शक्तियों का है: परा (महत्तमा) और अपरा (सामान्य या भौतिक)। इन दोनों के मध्य सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं, लेकिन अंत में वे इनके स्रोत श्री कृष्ण की ओर ही लौटते हैं।
क्या 'प्रलय' से तात्पर्य केवल भौतिक विनाश से है?
नहीं, प्रलय का अर्थ केवल भौतिक नष्ट होने तक सीमित नहीं है; इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ भी है कि जब ज्ञान की रोशनी होती है तो मिथ्या (भ्रम) का विनाश हो जाता है। यह एक चक्र को संदर्भित करता है जिसमें सृष्टि बनाई जाती है और फिर उसका पुनः विलय होता है, जो असीमित ईश्वरीय शक्ति के प्रतीक हैं।
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