भगवद्गीता 6.38
Dhyana Yoga · हिन्दी अनुवाद
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति | अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ||६-३८||
kaccinnobhayavibhraṣṭaśchinnābhramiva naśyati . apratiṣṭho mahābāho vimūḍho brahmaṇaḥ pathi ||6-38||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
इस श्लोक में अर्जुन कृष्ण से डरते हुए पूछ रहा है कि यदि कोई व्यक्ति ध्यान योग का मार्ग अपनाकर बीच में ही पीछे हट जाता है, तो क्या वह पूरी तरह नष्ट हो जाता है? भय और संदेह के कारण अर्जुन को लगता है कि कर्म या ज्ञान से विमुख होने वाला व्यक्ति 'काटा हुआ बादल' की तरह दोनों ओर गिर जाएगा। श्री कृष्ण इस प्रश्न का उत्तर देते हैं, जो यह स्पष्ट करता है कि आध्यात्मिक साधना में कोई भी प्रयास व्यर्थ नहीं जाता और भ्रष्ट पुरुष का अंतिम संपर्क न तो टूटता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'ध्यान योग' (अध्यय 6) के तहत आता है जो मन को नियंत्रित करने और परमात्मा से जुड़ने की प्रक्रिया को समझाता है। यह सिद्धांत विकासशील चेतना (Progressive Evolution of the Soul) पर आधारित है, जहाँ कोई भी साधक 'अप्रतिष्ठ' या स्थिर न होने के बावजूद आत्मिक सुरक्षा में रहता है। इसमें कर्म योग और भक्ति का सिद्धांत यह स्थापित करता है कि ब्रह्म की ओर किया गया प्रत्येक पड़ाव अंतिम विफलता नहीं, बल्कि पुनर्जन्म तक सुधार का एक चरण है।
शब्दार्थ
यह कहाँ घटित होता है
यह संवाद महाभारत के युद्धक्षेत्र कुुरुक्षेत्र में चल रहा था, जहाँ अर्जुन और श्री कृष्ण रथ पर बैठे हैं। इससे ठीक पहले अध्याय 2 से लेकर अब तक (अध्याय 5) श्री कृष्ण ने कर्मयोग, आत्मज्ञान और ध्यान की विस्तृत शिक्षाएं दी थीं। अर्जुन को लग रहा था कि वे जीवन भर के लिए सफल हो जाएंगे या फिर यदि उनका संकल्प टूट गया तो सब कुछ बरबाद हो जाएगा। यह प्रश्न तब उठता है जब अर्जुन कृष्ण की दी गई 'ध्यान योग' (अध्यय 6) के महान नियमों को सुनकर अपनी सीमाओं और संभावित विफलता से डरा हुआ था।
आज के जीवन में
आज के समय में, जब कोई व्यक्ति नई आदतें बनाने या किसी बड़े लक्ष्य (जैसे करियर बदलना या डिप्रेशन से निपटना) की ओर बढ़ते हुए बीच में थक जाता है, उसे लगता है कि उसने सब कुछ खो दिया। जैसे अर्जुन का भ्रम था कि 'अधूरा रह गया तो नष्ट हो जाएंगे', वैसे ही आज के लोग भी मान लेते हैं कि एक बार गलती करके वे आगे नहीं बढ़ सकते। इस श्लोक की शिक्षा यह है कि अगर आप ध्यान, कर्म या साधना में थोड़ा पीछे हट जाते हैं, तो आपके द्वारा किया गया प्रयास बरबाद नहीं होता और वह आपको एक दिन सफलता तक जरूर ले जाएगा।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
अर्जुन को डर लग रहा था कि अगर वह कृष्ण की बताई हुई ध्यान करने वाली आदत में बीच में ही हार मान लेगा, तो क्या वह बुरी तरह खराब हो जाएगा? जैसे कोई लड़का पहाड़ी से चढ़ने के लिए एक बार उठा और फिर थककर नीचे गिर गया, लेकिन उसकी मेहनत भी कभी नहीं जाती। अर्जुन सोच रहा था कि अगर उसे रास्ते में रुकना पड़ा तो क्या वह हमेशा के लिए खो जाएगा, ठीक जैसे बिखर गया बादल जो हवा में उड़ जाता है? असली बात यह है कि भगवान कृष्ण कहते हैं कि कोई भी अच्छा काम किया हुआ बुरे से नहीं मिटता।
दैनिक चिंतन
क्या आप भी कभी लगते हैं जैसे आपके प्रयासों में विफलता आई और अब आपको गलत रास्ते पर खड़ा पा रहे हैं? भगवान श्रीकृष्ण आज की यह बात आपको याद दिलाती है कि एक बार धर्म के मार्ग को अपनाने वाला कभी वास्तविक रूप से नष्ट नहीं होता। आपका आत्म-संघर्ष निराशा का कारण नहीं, बल्कि आपके उच्चतम विकास की ओर एक अनिवार्य चरण है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज की ध्यान में, अपने मन को उस टूटे हुए बादल जैसा न मानें जो रास्ते भटक कर गिर सकता है। जब भी विचारों का चक्र घुमाया जाए या अहंकार डराए, शांत होकर यह स्मरण करें कि ब्रह्म के मार्ग पर चलने वाला कभी पूरी तरह नहीं गुजरता; उसका सार संरक्षित रहता है।
मुख्य शिक्षाएँ
- अधूरे प्रयास का कभी अंत नहीं होता
यदि कोई व्यक्ति ब्रह्म के मार्ग पर चलते हुए गिर भी जाता है, तो उसका पतन स्थायी नहीं होता। वह भले ही दोषों से घिरा हो, लेकिन उसके पूर्व संस्कार (samskaras) उसे पुनः उठाकर सही रास्ते पर ले आएंगे। - आत्म-दृढ़ता और विश्वास
महाबाहो! जैसे टूटा हुआ बादल धरती पर गिरा नहीं जाता, वैसे ही एक सच्चा साधक कभी पूरी तरह विफल नहीं होता। इसका अर्थ है कि ईश्वरीय कृपा और अपने आत्म-विश्वास से कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती। - मोह में पड़ना एक परीक्षा है
विवेक (Buddhi) के बिहार का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति नष्ट हो गया, बल्कि वह अभी भी 'विमुक्त' होने की प्रक्रिया में है। यह मोह और विचलन हमें आत्म-ज्ञान प्राप्ति के लिए एक गहराई से खड़ा करने वाला अनुभव देते हैं।
विषय
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आगे पढ़ें
- 2.47 — यह श्लोक हमें 'कर्म' और परिणाम की चिंता न करने के महत्व को समझाएगा, जो इस अध्याय में ध्यान का आधार है।
- 3.30 — इसमें हमें 'ईश्वर को संपूर्ण अर्पित' करने की शक्ति मिलती है, जिससे मोह और भ्रम से मुक्ति होती है।
- 12.15 — यह हमें एक आदर्श साधक के गुणों का वर्णन करता है जो न तो गिरता है और न ही अन्य को डराता है, जिससे ध्यान की स्थिति स्पष्ट होती है।
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