भगवद्गीता 5.25
Karma Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः | छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ||५-२५||
labhante brahmanirvāṇamṛṣayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ . chinnadvaidhā yatātmānaḥ sarvabhūtahite ratāḥ ||5-25||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे ऋषिजन (संत) ब्रह्मनिर्वाण, या आत्मिक शांति और मोक्ष की स्थिति प्राप्त कर लेते हैं। ये लोग उन लोगों के समान होते हैं जिनके सभी कर्मों का फल ख़त्म हो गया है, वे मन में द्वैत (दो विपरीत भाव) को मिटा चुकें हैं और अपने इन्द्रियों पर पूर्ण संयम रखते हैं। इनका सबसे महत्वपूर्ण गुण यह होता है कि वे केवल अपनी नहीं बल्कि संपूर्ण भूतमात्र, अर्थात् सभी जीवों की कल्याण में रत रहते हैं।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'कर्म योग' (Karma Yoga) और 'ज्ञान योग' का समन्वय दर्शाता है, जहाँ कर्मों के फल को त्यागने के बाद आत्मा की शुद्धि (क्षीणकल्मषाः) होती है। यह 'अद्वैत वेदांत' की अवधारणा पर आधारित है कि जब द्वैतिभाव (सुख-दुख, लाभ-हानि का भेद) मिट जाता है और आत्मा शुद्ध हो जाती है, तो वह ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त कर लेती है। यह सिखाता है कि पूर्ण निस्वार्थ कर्म (सेवा भावना) ही ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर घटित हुआ था जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे थे। इस समय तक कृष्ण ने कर्म योग, ज्ञान और भक्ति की विस्तृत चर्चा कर दी है और अब वे उस पुरुष के लक्षण बता रहे हैं जो सफल रूप से मार्ग पर चल चुका है। अर्जुन अभी भी संशय में थे कि क्या त्याग करना (कर्म छोड़ना) ही श्रेष्ठ है, इसलिए कृष्ण कहते हैं कि वास्तविक मोक्ष तभी मिलता है जब आत्मा शुद्ध हो और द्वैत का नाश हो जाए।
आज के जीवन में
मान लीजिए आप एक बड़े ऑफिस में काम कर रहे हैं जहाँ ट्रेड (दुश्मनी) या प्रोजेक्ट की विफलता से तनाव है। उस समय, यदि आप केवल अपने पुराने डरों या दोषों को भूलकर (क्षीणकल्मषाः), बिना किसी पूर्वग्रह के (छिन्नद्वैधाः) आगे बढ़ते हैं और पूरी टीम की सफलता पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो आपका तनाव अपने आप कम हो जाएगा। यही 'सर्वभूतहित' का अनुभव है: जब हम अपनी चिंताओं को छोड़कर दूसरों के भलाई में लगे रहते हैं, तो मन की शांति और सफलता स्वाभाविक रूप से प्राप्त होती है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो जैसे आप एक पहाड़ पर खड़े होकर देख रहे हैं और नीचे का सब कुछ साफ दिख रहा है। जब हम डर या गुस्से से नहीं, बल्कि दूसरों की मदद करने में खुश होते हैं, तो हमारे मन के सारे 'गुल्लक' (पाप) खत्म हो जाते हैं और हमें अंदर बहुत शांति मिलती है। जैसे पानी साफ़ होने पर तला हुआ दिखता है, वैसे ही जब हमारा दिल दूसरों की भलाई से भर जाता है, तो हमें ईश्वरीय प्रेम का अनुभव होता है जो कभी खत्म नहीं होता।
दैनिक चिंतन
आज आप जिन संघर्षों से गुजर रहे हैं, उनसे बाहर निकलने के लिए अपने मन को शुद्ध करने का समय लें जब आपके पाप नष्ट हो चुके हों और संदेह मिट गया हो। याद रखें कि सच्चा शांति तभी मिलती है जब आप स्वयं पर नियंत्रण बनाए रखते हैं और दूसरों की भलाई के लिए काम करते हैं। जैसे ऋषिगण मोक्ष को प्राप्त होते हैं, वैसे ही आप भी अपने कर्मों में निस्वार्थ भाव से रमकर उस शांत अवस्था का अनुभव कर सकते हैं जो सबके प्रति प्रेमपूर्ण है।
आज के लिए एक अभ्यास
अपने मन की स्थिति को देखें और सोचें कि क्या आप किसी संदेह या द्वंद्व में फंसे हैं? स्वयं से प्रश्न करें कि आपके कर्म भूतमात्र के हित के लिए हैं या केवल अपने स्वार्थ के लिए। इस क्षण, अपने मन का आसक्ति-रहित और शांत होने की ओर ध्यान लगाएं जो सभी प्राणियों में खुशियाँ देखता है।
मुख्य शिक्षाएँ
- कर्म और पाप का नाश: शुद्धता की नींव
जब व्यक्ति निस्वार्थ कर्म करता है, तो उसके संचित कर्मों (पाप) नष्ट हो जाते हैं जो मोक्ष के मार्ग में बाधा बनती थीं। यह पवित्रता आत्मा को उस उच्च स्तर पर ले जाती है जहाँ वह ब्रह्मनिर्वाण की स्थिति प्राप्त कर सकती है। - संदेह का विनाश: निश्चित ज्ञान
द्वैत या संदेह (dvaiddha) से मुक्त होकर आत्मा को पूर्ण विश्वास और एकाग्रता प्राप्त होती है। यह अंतर्मुखी स्थिरता ही ऋषियों की पहचान है जो भ्रम के बंधनों से छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। - सर्वभूतहित: परम उद्देश्य
युद्ध या सत्य, ज्ञानी व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य केवल स्वयं की मुक्ति नहीं बल्कि सभी प्राणियों (sarvabhuta) की भलाई है। जब आत्मा संयमी होती है और दूसरों के हित में रमती है, तो वह पराकाष्ठा को प्राप्त कर लेती है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — यदि आप इस अध्याय में कर्म के सिद्धांत और फल की आसक्ति से मुक्त रहने पर विचार कर रहे हैं, तो यह मूल श्लोक सबसे उपयुक्त है।
- 3.30 — इसमें कर्मों को ईश्वर के समर्पण के रूप में अर्पित करने का विस्तृत वर्णन है जो पाप नाश और संयम की ओर ले जाता है।
- 12.15 — वह व्यक्ति जिससे सभी प्रसन्न होते हैं, वह भी भूतमात्र के हित में रमने वाले ऋषि का उदाहरण है जिसे श्री कृष्ण सबसे प्यारे बताते हैं।
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