भगवद्गीता 5.23
Karma Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् | कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ||५-२३||
śaknotīhaiva yaḥ soḍhuṃ prākśarīravimokṣaṇāt . kāmakrodhodbhavaṃ vegaṃ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ ||5-23||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि जो व्यक्ति इसी जीवन में, शरीर छोड़ने से पहले ही काम और क्रोध के तीव्र आवेगों (वेग) को सहन कर लेता है, वही सच्चा योगी कहलाता है। यह श्लोक बताता है कि वास्तविक शांति बाहरी दुनिया की परिस्थितियों में नहीं, बल्कि आंतरिक इच्छाओं और गुस्से पर काबू पाने में निहित है। कृष्ण के अनुसार, जो इन तीव्र भावनाओं को नियंत्रित कर लेता है, वही जीवन भर सुखी रहने वाला 'युक्त' (योग्य) व्यक्ति बन जाता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'कर्म्म योग' (Karma Yoga) की गहराई को स्थापित करता है जो यह बताता है कि कर्म का फल त्यागना केवल बाहरी कार्यों में नहीं, बल्कि आंतरिक भावनाओं पर नियंत्रण करने से भी जुड़ा है। इसमें 'ब्रह्म' (परमात्मा) और 'आत्मन' की अनुभूति को प्राप्त करने वाले योगी की क्षमता का वर्णन किया गया है कि वह काम-क्रोध के प्रभावों से मुक्त होकर स्थिर मन रख सकता है। यह सिद्धांत बताता है कि आत्म-साक्षात्कार और सुख अर्जित करना बाहरी विलासिता में नहीं, बल्कि संसार की परीक्षाओं को सहने वाली शक्ति में निहित है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान में, जब अर्जुन ने हथियार फेंकने का फैसला किया था तब भगवान कृष्ण द्वारा उन्हें समझाते हुए कहा गया। इससे ठीक पहले, कृष्ण ने 'कर्म्म संन्यास योग' की चर्चा करके अर्जुन को यह बताया कि केवल शारीरिक कार्य छोड़ने से नहीं, बल्कि मन में लगे बंधनों को तोड़कर ही मुक्ति मिलती है। अर्जुन अभी भी युद्ध का भार और अपनी इच्छाओं (काम) व क्रोध के प्रभाव से परेशान थे, इसलिए कृष्ण ने इस श्लोक के माध्यम से उन्हें आंतरिक शांति की राह दिखाई कि कैसे वे वर्तमान में ही मुक्ति पा सकते हैं।
आज के जीवन में
आज के समय जब कोई व्यक्ति ऑफिस में अचानक किसी सहकर्मी या ग्राहक द्वारा अप्रत्याशित व्यवहार पर गुस्सा करके जवाब देने की स्थिति में हो, वह इस श्लोक का अनुसरण कर सकता है। काम और क्रोध से उत्पन्न होने वाले उस तुरंत प्रतिक्रिया (वेग) को रोककर शांति बनाए रखना ही वास्तविक 'सुख' की ओर पहला कदम है। इसका अभ्यास करने वाला व्यक्ति न तो अत्यधिक उतावलेपन से निर्णय लेगा और न ही पछताने के बाद, बल्कि वह एक संतुलित मन के साथ तुरंत सही कार्य कर पाएगा।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जानते हो अर्जुन जैसे बच्चे कभी-कभी बहुत गुस्से में आ जाते हैं या उन्हें जो चीज़ें चाहिए, वे तुरंत मांग लेना चाहते हैं? अगर कोई बड़ा दोस्त ऐसा होता कि वह जब भी गुस्सा आए तो गहरी सांस लेता और अपनी इच्छाओं को धीरे-धीरे संभाल लेता, तो क्या वह सबसे शांत और खुश रहने वाला होगा? भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने मन के इस 'जुआर' (काम) या गुस्से पर नियंत्रण पा लेता है, वही असली नायक होता है। यह बात समझो जैसे किसी ने अपनी पानी की बाल्टी को लंबे समय तक संभाल कर रखा हो ताकि वह कभी गिरकर टूटे नहीं; ऐसा करने वाला व्यक्ति ही सबसे ज्यादा सुरक्षित और खुश रहता है।
दैनिक चिंतन
क्या आपने कभी सोचा है कि असली सुख शारीरिक त्याग या दुनिया से दूर जाने में नहीं, बल्कि इसी वक्त काम और क्रोध के वेग को सहन करने की क्षमता में निहित है? जब भी गुस्सा आए या कोई इच्छा आपके मन पर हावी हो जाए, तो यह समझें कि आप अपने अंदर छिपे 'योगी' को जागरूक कर रहे हैं। सच्चा सुख तब मिलता है जब आप उस वेग के बहाव में नहीं बहते, बल्कि उसे अपनी स्थिर बुद्धि से संतुलित करते हैं।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के लिए, अपने मन में उठने वाले क्रोध या वासना की लहरों को देखें। कल्पना करें कि आप उस वेग (ताकत) को एक पत्थर जैसी स्थिरता से सहन कर रहे हैं और उसे जाने देते बिना रोक रख रहे हैं। यह अभ्यास आपको इसी जीवन में शांति का अनुभव कराएगा, भले ही बाहरी परिस्थितियाँ कैसी भी हों।
मुख्य शिक्षाएँ
- इसी जीवन का योग और सुख (Ihaiva Yoga)
भगवान कृष्ण बताते हैं कि मोक्ष या शरीर त्यागने के बाद नहीं, बल्कि इसी जन्म में यदि हम आत्म-संयमित हों तो ही वास्तविक योग और सुख प्राप्त होता है। यह शिक्षा हमें भविष्य की प्रतीक्षा छोड़कर वर्तमान क्षण में साधना करने का संदेश देती है। - काम-क्रोध के वेग पर विजय (Vega par Vijay)
वैशेषिक रूप से काम और क्रोध एक ही मुद्रा की दो ओर हैं जो मन को भ्रमित करते हैं; इसी 'वेग' या तीव्र इच्छा-विरोध शक्ति को सहन करना ही कठिनतम साधना है। इसे अस्वीकार करने के बजाय उसे समझकर और उस पर विजय पाकर मनुष्य आत्म-रूप में स्थिर होता है। - योगी की परिभासा (Definition of a Yogi)
इस श्लोक के अनुसार, एक योगी वह नहीं जो बस जंगल में बैठा हो, बल्कि वह व्यक्ति है जिसने अपने संस्कारों और इच्छाओं पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लिया है। ऐसे मनुष्य को 'युक्त' (योगान्वित) कहा गया है क्योंकि उनका मन स्थिर है और वे सच्चे सुखी हैं।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.64 — इसे पढ़ें क्योंकि यह बताती है कि काम और क्रोध को कैसे नियंत्रित करके बुद्धिमान व्यक्ति परम गति प्राप्त करता है, जो इस श्लोक का विस्तार है।
- 3.41 — इसे पढ़ें क्योंकि यह हमें काम और क्रोध के स्रोत (इंद्रियों) को ज्ञान से कैसे जीता जाए, इसका व्यावहारिक मार्ग दिखाती है।
- 12.15 — इसे पढ़ें क्योंकि यह उन गुणों का वर्णन करती हैं जो एक सुखी और स्थिर मनुष्य को बनाते हैं, जिन्हें कृष्ण प्रिय मानते हैं।
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