भगवद्गीता 4.7

Jnana Karma Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 4.7 — "हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है,  तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।।"
भगवद्गीता 4.7 — Jnana Karma Sanyasa Yoga
संस्कृत

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ||४-७||

लिप्यंतरण

yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati bhārata . abhyutthānamadharmasya tadātmānaṃ sṛjāmyaham ||4-7||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि जब भी धर्म या सच्चाई में गिरावट आती है और अधर्म का विस्तार होता है, तो वे स्वयं प्रकट होकर संतुलन बनाते हैं। यह श्लोक यह बताता है कि ईश्वर केवल दर्शक नहीं बल्कि समय-समय पर हस्तक्षेप करके अच्छाई को पुनः स्थापित करने वाले होते हैं। इसका मुख्य शिक्षण यह है कि अंधकार कभी भी हमेशा के लिए जीतता नहीं है क्योंकि सत्य की रक्षा का प्रबंध स्वयं ईश्वर करते हैं।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'ज्ज्ञान कर्म संन्यास योग' (अध्याय 4) की मूलभूत शिक्षा को स्थापित करता है जो भक्ति और ईश्वरीय प्रकटता (वतसरण) के सिद्धांत पर आधारित है। यह 'लोक-संग्रह' का अवधारणा विकसित करता है, जहाँ कर्म योग और नैतिक दायित्व को बनाए रखने के लिए ईश्वर की सक्रिय भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

शब्दार्थ
यदा यदा whenever, हि surely, धर्मस्य of righteousness, ग्लानिः decline, भवति is, भारत O Bharata, अभ्युत्थानम् rise, अधर्मस्य of unrighteousness, तदा then, आत्मानम् Myself, सृजामि manifest, अहम् I
पारंपरिक भाष्य
Dharma is that which sustains and holds together. There is no proper eivalen for this term in the English language. That which helps a man to attain to Moksha or salvation is Dharma. That which makes a man irreligious or unrighteous is Adharma. That which elevates a man and helps him reach the goal of life and attain knowledge is Dharma that which drags him and hurls him down in the abyss of worldliness and ignorance is Adharma.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुर्कुक्षेत्र पर स्थित है जहाँ पांडवों और कौरवों के बीच भयानक संघर्ष की तैयारी चल रही थी। अर्जुन ने अपने ही वंशजों, गुरुओं और पितामह को मारने से इनकार कर दिया था क्योंकि वे युद्ध करने में असमर्थ थे और नैतिक दुविधा (विकल) का शिकार हो गए थे। इस संकट की घड़ी में भगवान कृष्ण ने अर्जुन के मनोदशा को सुधारने के लिए गीता उपदेश देना शुरू किया था, जिसमें यह आश्वासन दिया गया कि जब भी बुराई का बढ़ना होगा तो ईश्वर स्वयं अवतरित होंगे।

आज के जीवन में

कल्पना कीजिए कि आप किसी संगठन में एक ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं जहाँ भ्रष्टाचार या अन्याय फैल रहा है और लोग निराश होकर छोड़ने का विचार कर रहे हैं। इस स्थिति में, कृष्ण के उपदेश आपको यह शक्ति देता है कि आप अकेले नहीं लड़ रहे हैं; सत्य की रक्षा करने वाले बड़े सिद्धांत (धर्म) को बनाए रखना एक दिव्य प्रयास माना जाता है। इसके लिए आप घबराहट छोड़कर अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करें, यह समझते हुए कि सही समय पर उचित कार्रवाई या मदद अवश्य मिलेगी और परिस्थितियाँ सुधरेंगी।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

मान लो एक बड़े खेल में कुछ लोग गलत नियम तोड़ रहे हैं और सब बेचैन हो गए, तब वहां एक बहुत शक्तिशाली न्यायाधीश आते हैं जो सही बात करवा देता है। ठीक वैसा ही कृष्ण भगवान कहते हैं कि जब दुनिया में लोग बुराई करना शुरू करते हैं और अच्छे काम छोड़ देते हैं, तो वे स्वयं प्रकट होकर सबको राह दिखाते हैं। यह एक आशा की बात है क्योंकि हमें डरने की नहीं चाहिए कि अंधकार कभी भी जीत जाएगा; सूरज जैसे ईश्वर फिर से रोशन कर देंगे।

दैनिक चिंतन

प्रिय मित्र, क्या आपने कभी सोचा है कि जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण और अंधेरे क्षणों में भी ईश्वर की उपस्थिति हमेशा मौजूद होती है? जब आपको लगता है कि अधर्म जीत रहा है और धर्म गिर गया है, तो याद रखें कि यह समय भगवान के स्वयं प्रकट होने का संकेत है। आप अकेले नहीं हैं; कृष्ण स्वयं उसी क्षण आपके साथ खड़े होते हैं ताकि मार्ग को फिर से स्पष्ट किया जा सके और नई ऊर्जा मिल सके।

आज के लिए एक अभ्यास

अपने मन को शांत करके यह सोचें कि जब भी आप जीवन में अराजकता या अन्याय देखते हैं, तो वह भगवान कृष्ण के आगे की एक निमंत्रणा है। अपने हृदय में स्थिर भाव रखें और विश्वास करें कि ईश्वर स्वयं उस समय प्रकट होते हैं जब धर्म का पतन होता है ताकि पुनरावृत्ति को रोक सकें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. धर्म की रक्षा का कालचक्र
    यह श्लोक बताता है कि धर्म के पतन पर भगवान स्वयं अवतरित होते हैं, जो प्रकृति और समय के चक्कर में एक अनिवार्य नियम है। यह हमें सिखाता है कि अराजकता स्थायी नहीं है बल्कि ईश्वरीय हस्तक्षेप की ओर संकेत करता है।
  2. ईश्वर का स्व-प्रकाशन
    भगवान कृष्ण कहते हैं कि वे 'स्वयं' (आत्मानम्) को प्रकट करते हैं, न कि केवल संकेत भेजते हैं। इसका अर्थ है कि जब धर्म की रक्षा आवश्यक होती है, तो सत्य स्वयं द्रष्टा बनकर मानवीय रूप में सामने आता है।
  3. आशा और विश्वास का संदेश
    भारत (अर्जुन) को संबोधित करते हुए, यह श्लोक हमें बताता है कि भगवान कभी भी धर्म की हानि पर उपेक्षा नहीं करते। इसके माध्यम से हमें निराशा के समय में आशा और विश्वास का संदेश मिलता है।

विषय

धर्म और अधर्म की संतुलनईश्वर का अवतरण (Avatara)कर्म योगसमय के चक्रभक्ति भावनाआशा और विश्वास

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  1. 2.47 — इस श्लोक में 'कर्माणि करे' (कर्म करने) पर जोर दिया गया है, जो कृष्ण के अवतरण का उद्देश्य और कैसे व्यक्तिगत कार्य करना चाहिए इसे समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
  2. 3.21 — यह श्लोक बताता है कि भगवान भी अपनी गतिविधियों से लोगों को प्रेरित करते हैं, जो अवतरण (प्रकट होने) के बाद किए जाने वाले कार्य का विवरण देता है।
  3. 18.73 — अर्जुन की इस श्लोक में अपनी भूलों को स्वीकार करना और कृष्ण के वचनों पर पूर्ण समर्पण का प्रकट होना, जो पूरे गीता संवाद की समाप्ति है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या भगवान कृष्ण का कहना है कि वे हर समय प्रत्यक्ष रूप से आते हैं?
नहीं, यह श्लोक बताता है कि ईश्वर केवल तब अवतरित होते हैं जब धर्म की गंभीर हानि होती है और अधर्म व्यापक स्तर पर बढ़ जाता है। उनके प्रकट होने का उद्देश्य नैतिक संतुलन को पुनः स्थापित करना है, न कि हर छोटी-छोड़ी समस्या में मध्यस्थता करना।
'भारत' शब्द से अर्जुन का क्या तात्पर्य है?
यहाँ 'भारत' एक संबोधन है जिसका उपयोग भगवान कृष्ण ने अर्जुन के लिए किया है, जो भारत (बharat) वंश के वीर थे। यह शब्द गौरव और बंधनों को दर्शाता है कि वे इस पवित्र युद्ध में भागीदार हैं और ईश्वरीय योजना का हिस्सा बनने योग्य हैं।
क्या हमें भगवान के प्रतीक्षा करनी चाहिए जब भी बुराई देखी जाए?
नहीं, गीता सिखाती है कि व्यक्ति को अपने कर्तव्य (धर्म) का पालन करना चाहिए और निष्ठापूर्वक कार्य करना चाहिए। भगवान के प्रकट होने की आशा में बैठे रहने के बजाय हमें स्वयं सत्य की रक्षा करने वाले साधनों बनना चाहिए, क्योंकि यह कर्म योग है।
इस श्लोक का 'जन्म-मरण चक्र' से क्या संबंध है?
हालाँकि सीधा संबंध नहीं है, लेकिन भगवान के बार-बार प्रकट होने (अवतार) का उद्देश्य धर्म की रक्षा और अधर्मीयों का विनाश करके लोक को संतुलित करना होता है। यह चक्र तब तक चलता रहता है जब तक मानव जाति में नैतिक गिरावट होती है, जो अंततः मुक्ति के मार्ग को खोलती है।
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