भगवद्गीता 4.26

Jnana Karma Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 4.26 — "अन्य (योगीजन) श्रोत्रादिक सब इन्द्रियों को संयमरूप अग्नि में हवन करते हैं,  और अन्य (लोग) शब्दादिक व"
भगवद्गीता 4.26 — Jnana Karma Sanyasa Yoga
संस्कृत

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति | शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ||४-२६||

लिप्यंतरण

śrotrādīnīndriyāṇyanye saṃyamāgniṣu juhvati . śabdādīnviṣayānanya indriyāgniṣu juhvati ||4-26||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि दो प्रकार के संयमी लोग होते हैं। कुछ योगी अपने इन्द्रियों (कान, आँखें आदि) पर नियंत्रण करके उन्हें 'संयम की अग्नि' में हवन करते हैं और वस्तुओं का त्याग करते हैं। दूसरी ओर, अन्य व्यक्ति शब्द-स्पर्श जैसे विषयों को ही अपने इन्द्रियों के रूप में बनी अग्नि में नष्ट कर देते हैं। इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि कर्मयोगी अपनी संवेदनशीलता और वस्तुओं दोनों का त्याग करके आत्मज्ञान की ओर बढ़ता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक कर्मयोग के मुख्य सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है कि कैसे 'इन्द्रिय-संयम' (नियंत्रण) स्वयं एक यज्ञ या हवन बन जाता है। यह ज्ञान और संकल्प की जोड़ी को दर्शाता है, जहाँ कर्म करने वाले व्यक्ति अपने इन्द्रियों के द्वारा भोगों का त्याग करके परमात्मा में लीन हो जाते हैं। इसमें 'इन्द्रिय-अग्नि' (संयम) और 'विषयाग्नि' (भोगों की आशक्ति) के बीच अंतर स्पष्ट किया गया है जो ज्ञानयोग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

शब्दार्थ
श्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि organ of hearing and other senses, अन्ये others, संयमाग्निषु in the fire of restraint, जुह्वति sacrifice, शब्दादीन् विषयान् senseobjects such as sound, etc., अन्ये others, इन्द्रियाग्निषु in the fire of the senses, जुह्वति sacrifice
पारंपरिक भाष्य
Some Yogis are constantly engaged in restraining the senses. They gather their senses under the guidance of the Self and do not allow them to come in contact with the sensual objects. This is also an act of sacficie. Others direct their senses only to the pure and unforbidden objects of the senses. This is also a kind of sacrifice.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र पर भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश भाग है, जो चारवें अध्याय 'ज्ञानकर्मसंन्यास योग' का हिस्सा है। इससे पहले अर्जुन ने ज्ञान और कर्म के बीच भेद समझने की गुहार लगाई थी, जिस पर श्री कृष्ण अब उन्हें संन्यास (त्याग) और यज्ञ के सच्चे स्वरूप को समझा रहे हैं। युद्ध का तनाव अर्जुन में विषादन पैदा कर रहा था कि क्या उसे लड़ना चाहिए या त्याग देना, इसलिए कृष्ण अब 'इन्द्रिय-संयम' की बात करके उन्हें आत्मिक शक्ति प्रदान करते हैं।

आज के जीवन में

आज के तेज़ रफ़्तार जीवन में जब आप ऑनलाइन सोशल मीडिया या न्यूज़ फ़ीड्स देखकर तनावग्रस्त हो रहे हों, तो यह श्लोक आपको सिखाता है कि अपने कान और आँखों (श्रोत्रादिक इन्द्रियों) को एक 'संयम की अग्नि' में डुबो दें। इसके बजाए कि आप हर नई खबर या ध्वनि (विषयाणि) पर प्रतिक्रिया करें, अपनी दृष्टि और श्रवण शक्ति को नियंत्रित करके उस जानकारी के साथ अपने चेतना को जोड़ें जिसे आपने चुन लिया है। यह एक ठोस कदम है: जब भी आपको किसी विषय (शब्दादि) पर अत्यधिक आकर्षण या क्रोध महसूस हो, तो उसे अपनी इन्द्रियों की 'अग्नि' में जलाकर नष्ट कर दें और शांत रहें।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो जैसे कोई बड़ा भोजन बनाने वाला चूल्हे (अग्नि) में सब्जियां डालकर उन्हें पका देता है, वैसे ही हमें भी अपने मन और इन्द्रियों को संभालना होता है। कुछ लोग अपनी सुनने या देखने की शक्तियों पर तुरंत नियंत्रण कर लेते हैं ताकि वे गलत चीज़ों में न फंस जाएं; इसे 'संयम' कहते हैं। दूसरे लोग जब किसी अच्छी आवाज या रंग को बहुत प्यार करते हैं, तो उनका ध्यान वहीं लग जाता है और वे उसमें ही खो जाते हैं। कृष्ण जी बता रहे हैं कि सही रास्ता यह है कि हम अपनी इन्द्रियों का उपयोग करके बुराइयों को जलाकर साफ़ रहें, जैसे आग में लकड़ियां जल जाती हैं तो रॉख (राख) बाकी रहता है।

दैनिक चिंतन

क्या आपने कभी सोचा है कि हमारा दिन कैसे गुजरता है? अक्सर हम बाहरी विषयों को देखते और सुनते हैं, जबकि असली साधना तो इन इंद्रियों को संतुलित रखना है। इस गीता के इस पंक्ति में कृष्ण आपको यह सिखा रहे हैं कि भोजन या अग्नि होम की तरह ही हमें अपने सभी इन्द्रिय-संपर्कों को ज्ञान की आहुति देनी चाहिए। जब आप अपनी दृष्टि और श्रवण को संयमित करेंगे, तो पाएंगे कि आपके भीतर का शांतिस्थल बहुत अधिक मजबूत हो गया है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के समय में अपने सभी इंद्रियों (कान, आँखें, नासिका) को संयम की अग्नि में समर्पित करें। जब भी कोई विषय आपके मन पर हावी हो, उसे इन्द्रिय-अग्नि में जलाकर शुद्धि प्राप्त करने का प्रयास करें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. इन्द्रियों की आहुति (Havan of Senses)
    यह श्लोक बताता है कि योगीजन अपने इन्द्रियों को ही अग्नि में डुबोते हैं, न कि केवल बाहर की वस्तुओं को। यह एक सक्रिय प्रक्रिया है जहाँ संवेदनाओं और विषयों का त्याग किया जाता है ताकि आत्म-ज्ञान जागे।
  2. संयम अग्नि (The Fire of Restraint)
    जब इन्द्रियों को संयम की अग्नि में समर्पित किया जाता है, तो वे बाहरी विषयों के आकर्षण से मुक्त हो जाती हैं। यह अग्नि कर्म का फल और दुःख दोनों को जलाकर शेष रखती नहीं है।
  3. दो प्रकार की साधना (Two Types of Practice)
    अन्य लोग विषयों को इन्द्रिय-अग्नि में डुबोते हैं जो संवेदनाओं को बढ़ाता है, जबकि ज्ञानी योगी इंद्रियों को ही अग्नि बनाकर उनमें आहुति देते हैं। यह भेद बताना कि कैसे एक व्यक्ति कर्मों से मुक्त हो सकता है और केवल 'हवन' का मार्ग अपना सकता है।

विषय

इन्द्रिय संयमकर्म योग का सारज्ञान और अज्ञानभोगों का त्यागआत्म नियंत्रणयज्ञ की भावना

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  1. 2.47 — यह पंक्ति कर्म के फल में लगे रहने से मुक्त होने का मूल सिद्धांत देती है, जो संयम की अग्नि के बिना अधूरा है।
  2. 3.6 — इस श्लोक में कृष्ण बताते हैं कि इंद्रियों को दबाए रखकर भी मन से विषयों पर रहने वाला व्यक्ति क्या कर रहा है, जो इस पंक्ति के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
  3. 12.8 — इस श्लोक का उद्देश्य मन को ईश्वर में स्थिर करना है, जो इंद्रियों को अग्नि में जलाने के बाद प्राप्त होने वाली एक उच्च अवस्था है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'अग्नि' से क्या तात्पर्य है?
यहाँ 'अग्नि' का अर्थ केवल भौतिक आग नहीं, बल्कि आत्म-नियंत्रण और संकल्प की तीव्रता है। पहली बार जहां योगी अपने इन्द्रियों को नियंत्रित करते हैं (संयमाग्नि), वहीं दूसरी बार विषयों का त्याग किया जाता है (इन्द्रियाग्नि)। यह एक शुद्धिकरण प्रक्रिया है जो आत्मा को पाप और मोह से मुक्त करती है।
क्या संयम करने वाले लोग दुनिया से पूरी तरह अलग हो जाते हैं?
नहीं, संयम का मतलब यह नहीं कि इन्द्रियों को नष्ट किया जाए या दुनिया से कट जाना है। इसका तात्पर्य यह है कि व्यक्ति अपने विषयों (ध्वनि, रूप आदि) पर नियंत्रण रखता है और उन्हें अपनी बुद्धि के अधीन करता है। वे भोग नहीं त्यागते, बल्कि उनमें लगी होड़ को जलाकर नष्ट कर देते हैं।
'शब्दादि विषय' से क्या समझा जाता है?
'शब्दादि विषय' से तात्पर्य ध्वनि (शब्द), रूप, रस, गंध और स्पर्श जैसे पांच ज्ञानेंद्रियों के वस्तुओं से है जो हमारे मन को बाहर खींचते हैं। जब कोई व्यक्ति इनसे मुक्त होता है या उन्हें संयम की अग्नि में डाल देता है, तो वह इन्हीं विषयों पर निर्भर नहीं रहता और आंतरिक शांति पाता है।
क्या यह श्लोक केवल साधुओं या संन्यासियों के लिए है?
बिल्कुल नहीं, कृष्ण का उपदेश सभी गृहस्थों और आशावस्था वालों के लिए है। चाहे आप कोई भी कार्य कर रहे हों, यदि आपके मन में इन्द्रिय-संयम की भावना होगी तो वह जीवन ही एक यज्ञ बन जाएगा। यह श्लोक बताता है कि कर्म करने वाले व्यक्ति को अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखकर आत्म-उन्नति का मार्ग अपनाना चाहिए, न कि केवल गृहस्थों या संन्यासियों तक सीमित होना चाहिए।
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