भगवद्गीता 4.24

Jnana Karma Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 4.24 — "अर्पण (अर्थात् अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्"
भगवद्गीता 4.24 — Jnana Karma Sanyasa Yoga
संस्कृत

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् | ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ||४-२४||

लिप्यंतरण

brahmārpaṇaṃ brahma havirbrahmāgnau brahmaṇā hutam . brahmaiva tena gantavyaṃ brahmakarmasamādhinā ||4-24||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि जब कोई व्यक्ति अपने सभी कार्यों का फल त्यागकर केवल ईश्वर की भक्ति में करता है, तो वह कार्य स्वयं ब्रह्म (परमात्मा) बन जाता है। इस श्लोक में कहा गया है कि हवन करने वाला पुरुष, अर्पित किया जाने वाला द्रव्य और जलाने वाली आग—सब कुछ प्रभु का ही स्वरूप हैं। इसलिए जो व्यक्ति कर्मों को ब्रह्म के रूप में देखकर समाधि अवस्था में रहता है, उसका गंतव्य भी वही अद्वितीय परमात्मा होता है। यह सिखाता है कि जब हम ईश्वर की दृष्टि से कार्य करते हैं, तो वह साधारण कर्म नहीं बल्कि एक पवित्र पूजा बन जाता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक भगवद्गीता के 'कर्म योग' का सबसे उच्च स्वरूप प्रस्तुत करता है, जहाँ कर्ता (कर्मी), कर्म और फल की अद्वितीय एकता को दिखाया गया है। यह 'अद्वैत वेदांत' की श्रृंखला में आता है जो सिखाती है कि सभी सृष्टि ब्रह्म का ही विस्तार है, इसलिए जब कर्म ईश्वर के लिए समर्पित हो जाता है तो वह मोक्ष या परमात्मा प्राप्ति का साधन बन जाता है। इसमें 'ब्रह्मकर्मसमाधि' की अवधारणा विकसित होती है जहाँ व्यक्ति कार्य करते हुए भी अपने में से अहंकार को विलीन कर देता है और स्वयं ब्रह्म के साथ एकरूप हो जाता है।

शब्दार्थ
ब्रह्म Brahman, अर्पणम् the oblation, ब्रह्म Brahman, हविः the clarified butter, ब्रह्माग्नौ in the fire of Brahman, ब्रह्मणा by Brahman, हुतम् is offered, ब्रह्म Brahman, एव only, तेन by him, गन्तव्यम् shall be reached, ब्रह्मकर्मसमाधिना by the man who is absorbed in action which is Brahman
पारंपरिक भाष्य
This is JnanaYajna or wisdomsacrifice wherein the idea of Brahman is substituted for the ideas of the instrument and other accessories of action, the idea of action itself and of its results. By entertaining such an idea the whole action melts away, as stated in the previous verse (No.23).When one attains to the knowledge of the Self or Selfrealisation his whole life becomes a wisdomsacrifice in which the oblation, the melted butter or the offering, the performer of the sacrifice, the action and the goal are all Brahman. He who meditates thus wholly upon Brahman shall verily attain to Brahman. The sage who has the knowledge of the Self knows that the oblation, the fire, the instrument by which the melted butter is poured into the fire and himself have no existence apart from that of Brahman. He who has realised through direct cognitio (Anubhava) that all is Brahman, does no action even if he performs actions. (Cf. III.15)

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेश देते समय कहा गया है, जब वे 'ज्ञान कर्म संन्यास योग' (अध्याय 4) में विस्तृत रूप से चर्चा कर रहे थे। इससे ठीक पहले, भगवान ने समझाया था कि कैसे अतीत के ज्ञानी लोग भी कर्म करते हैं और अब वे आगे बढ़कर 'ब्रह्मार्पण' का रहस्य बयान कर रहे हैं। युद्ध के मैदान में उदासीनता और संदेह से ग्रस्त अर्जुन को यह समझने की आवश्यकता थी कि कर्म त्यागना या छोड़ना नहीं, बल्कि उसे ईश्वरप्रेम से जोड़कर करना ही सच्चा संन्यास है। इस स्थिति में श्लोक 4.24 उस समय का महत्वपूर्ण मोड़ था जहाँ अर्जुन को यह विश्वास दिलाया गया कि कर्म करने वाला, कार्य और फल—सब ब्रह्म हैं।

आज के जीवन में

कल्पना करें कि आप एक बहुत व्यस्त आधिकारिक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं जो आपको तनाव में डाल रहा है। अगर आप इस श्लोक को अपनाते हैं, तो आप केवल 'कार्य' नहीं देखेंगे बल्कि इसे ईश्वर की सेवा या अपने कर्तव्य का अंग मान लेंगे; यानी वह दस्तावेज़ (हवि), आपके हाथ जो उसे संभाल रहे हैं और उस प्रोजेक्ट को पूरा करने वाली ऊर्जा (अग्नि)—सब एक ही उद्देश्य के लिए है। इस सोच से आपका तनाव कम हो जाएगा क्योंकि अब यह काम 'मेरी' जिम्मेदारी नहीं, बल्कि ईश्वर की इच्छा का पालन बन गया है। जब आप परिणाम (फल) को चिंता किए बिना पूरी निष्ठा के साथ कार्य करते हैं, तो मन में एक गहरी शांति और समाधि आती है जो आपको अंततः उस लक्ष्य तक ले जाती है जहाँ सच्चा सुख है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो जैसे तुम अपने पिता को बहुत प्रेम करने के लिए उनके लिए किसी खास दीये में घी जलाते हो। जब तुम्हारा मन पूरी तरह से उनसे जुड़ा होता है, तो तुम्हें लगता है कि वह दीया भी तुम्हारे प्यार की बात कर रहा है और आग भी वही प्रेम बन गई है। भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि अगर हम अपने सभी कामों को इसी तरह ईश्वर के लिए करते हैं, तो हर छोटा-बड़ा कार्य ही उनकी पूजा बन जाता है। जब तुम किसी चीज को प्यार से और समर्पित भाव से करोगे, तो वह तुम्हें सीधे उस प्रेम का स्रोत (ईश्वर) तक ले जाएगा।

दैनिक चिंतन

क्या आपने कभी सोचा है कि आपके द्वारा किए जाने वाले हर छोटे-बड़े काम में ईश्वर का वास है? जब हम यह समझ लेते हैं कि अग्नि, द्रव्य और यज्ञकर्ता सब एक ही ब्रह्म के रूप हैं, तो कार्य करने की थकान मिट जाती है। आज से आप अपने हर कर्म को न केवल एक अनुष्ठान मानें, बल्कि उसे ईश्वर का स्वरूप समझकर पूर्ण श्रद्धा और प्रेम के साथ करें। ऐसा करके आप इस संसार में रहते हुए भी आध्यात्मिक समाधि की स्थिति प्राप्त करेंगे।

आज के लिए एक अभ्यास

अपने अहंकार को विसर्जित करते हुए, अपने कर्मों का फल ईश्वर के चरणों में समर्पित करें। जब आप कोई कार्य करते हैं, तो यह दृढ़ता से ध्यान रखें कि करने वाला भी ब्रह्म है और किया जा रहा कार्य भी ब्रह्म ही है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. सर्वत्र ब्रह्म का सार्वभौमिक स्वरूप (Non-duality of Action)
    युद्ध के मैदान में अर्जुन को सिखाया जाता है कि यज्ञ, हवि और कर्ता सभी एक ही परमात्मा 'ब्रह्म' हैं। यह दर्शन हमें बताता है कि भौतिक रूपों की विभेद-भावना त्यागकर सबमें ईश्वर का अस्तित्व देखना चाहिए।
  2. कर्म में समाधि (Absorption in Action)
    जब कर्ता अपना 'अहं' छोड़ देता है और कार्य को ब्रह्म के लिए समर्पित कर देता है, तो वह कर्म ही साधन बन जाता है। ऐसे व्यक्ति का अंत भी उसी परमात्मा की प्राप्ति में होता है जो उसे जन्म से पहले भी था।
  3. संपूर्ण समर्पण (Total Surrender)
    यज्ञ करने वाला, यज्ञ का सामग्री और अग्नि तीनों को ब्रह्म मानना ही सच्चा तत्वज्ञान है। यह ज्ञान कर्म के बांधन को तोड़ता है और मुक्ति पथ पर ले जाता है।

विषय

ब्रह्मार्पण (ईश्वर को समर्पित करना)कर्म योग की पूर्णताअद्वैत वेदांत का सिद्धांतकर्त्ता, कर्म और फल का एकत्वसमाधि अवस्था में जीवन जीनामोक्ष प्राप्ति का मार्ग

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — इस पद के बाद यह श्लोक अवश्य पढ़ें जो कर्मफल का त्याग और ध्यान में स्थिर रहने की शिक्षा देता है।
  2. 3.30 — यह अध्याय हमें सिखाता है कि कैसे सभी कार्यों को ईश्वर के लिए समर्पित करके कर्मयोग का पालन किया जाए।
  3. 12.15 — जिन्होंने इस प्रकार ब्रह्म में लीन होकर कार्य करते हैं, उनसे प्रिय भक्तों के गुणों को जानने के लिए यह पद आदर्श है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक के अनुसार 'ब्रह्माग्नि' से क्या तात्पर्य है?
'ब्रह्माग्नि' का अर्थ है वह आग जो स्वयं ब्रह्म (ईश्वर) की प्रकृति में जलती है। यह केवल भौतिक हवन कुंड की आग नहीं है, बल्कि उस कर्म की ऊर्जा को संदर्भित करती है जिसे ईश्वर के समर्पण भाव से किया जाता है। जब हमारा कार्य पूर्ण रूप से पवित्र और ईश्वर-केन्द्रित होता है, तो वह आग भी 'ब्रह्म' बन जाती है जो कर्मों की राख को जलाकर मुक्ति देती है।
क्या इसका अर्थ यह है कि हमें किसी और तरह के कार्यों से बचना चाहिए?
नहीं, गीता का मूल संदेश कर्म त्यागने या घर-संसार छोड़ने की नहीं है। इसके विपरीत, श्लोक 4.24 सिखाता है कि हमें अपने सभी कार्यों (कामकाज, पारिवारिक दायित्व आदि) को एक समर्पण के रूप में करना चाहिए और परिणामों पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए। जब तक अहंकार 'मैं कर रहा हूँ' का भाव हो, तब तक कार्य बंधन पैदा करता है; लेकिन ईश्वर की दृष्टि से किया गया कोई भी कार्य मुक्ति का कारण बनता है।
'ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं' (उसका गंतव्य ब्रह्म ही होना चाहिए) में क्या अंतर है?
यह वाक्यांश बताता है कि जिस व्यक्ति ने कर्मों को ईश्वर के समर्पण से किया, उसके लिए जीवन का परम लक्ष्य या गंतव्य 'ब्रह्म' (परमात्मा) ही होता है। आम तौर पर लोग धन, पद या सुख को अपने अंतिम गंतव्य मानते हैं, लेकिन यह श्लोक कहता है कि जब कर्म योग की समाधि में रहकर कार्य किया जाता है, तो उसका परिणाम स्वयं ब्रह्मात्मक होता है। इससे आत्मा का परब्रह्म के साथ एकीकरण (मोक्ष) सुनिश्चित हो जाता है।
इस श्लोक की शिक्षा आज के समय में कैसे लागू होती है?
आज के तनावपूर्ण जीवन में, जब हम किसी काम को 'नौकरी' या 'अनिच्छुक कर्तव्य' के रूप में करते हैं, तो यह इस श्लोक का विपरीत प्रभाव देता है। यदि हम अपने कार्य को ईश्वर की सेवा या एक उच्चतर लक्ष्य के लिए समर्पित मानें (जैसे कि डॉक्टर मरीज़ों की देखभाल करना भगवान की पूजा), तो तनाव खत्म हो जाता है और काम में प्रसन्नता आती है। यह दृष्टिकोण हमें परिणामों से मुक्त करके वर्तमान क्षण में पूर्ण कौशल के साथ कार्य करने की अनुमति देता है, जो कि सच्ची शांति का मार्ग है।
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