भगवद्गीता 3.31

Karma Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 3.31 — "जो मनुष्य दोष बुद्धि से रहित (अनसूयन्त:) और श्रद्धा से युक्त हुए सदा मेरे इस मत (उपदेश) का अनुष्ठानप"
भगवद्गीता 3.31 — Karma Yoga
संस्कृत

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः | श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ||३-३१||

लिप्यंतरण

ye me matamidaṃ nityamanutiṣṭhanti mānavāḥ . śraddhāvanto.anasūyanto mucyante te.api karmabhiḥ ||3-31||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धा रखते हुए और बिना किसी दोष या शंका के उनके उपदेश का सदा पालन करते हैं, वे अपने कर्मों से बंधन मुक्त हो जाते हैं। यह श्लोक संघर्षरत मनुष्यों को आशा दिलाता है कि विश्वास और निष्काम भावना से कार्य करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसका मुख्य शिक्षण है कि कर्मों में फल की इच्छा न रखकर, केवल ईश्वरीय विधि का पालन करना ही मुक्ति का मार्ग है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक कर्म योग (Karma Yoga) के सिद्धांतों को गहराई से स्थापित करता है जहाँ भक्ति (Bhakti) और ज्ञान का संगम होता है। यह बताता है कि 'श्रद्धा' (विश्वास) और 'अनसूया' (कोई शंका न होना) कर्मों के बंधनों को तोड़ने वाले दो प्रमुख साधक हैं जो व्यक्ति को मोक्ष की ओर ले जाते हैं। यह संस्कृति दर्शाती है कि निष्काम भाव से किया गया कार्य स्वयं में पूजा बन जाता है और मुक्ति का कारण होता है।

शब्दार्थ
ये those who, मे My, मतम् teaching, इदम् this, नित्यम् constantly, अनुतिष्ठन्ति practise, मानवाः men, श्रद्धावन्तः full of faith, अनसूयन्तः not cavilling, मुच्यन्ते are freed, ते they, अपि also, कर्मभिः from actions
पारंपरिक भाष्य
Sraddha is a mental attitude. It means faith. It is faith in ones own Self, in the scriptures and in the teachings of the spiritual preceptor. It is compund of the higher emotion of faith, reverence and humility.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर स्थित है, जहाँ पांडवों और कौरवों के बीच भयानक संघर्ष की तैयारी चल रही थी। अर्जुन ने अपने ही रक्तसंबंधियों को मारने से इनकार कर दिया था और वे गहरे दुःख व विचार में थे, जिस पर श्री कृष्ण उन्हें भाग 3 के 'कर्म योग' का उपदेश दे रहे हैं। इससे पहले कि यह श्लोक आया हो, अर्जुन ने अपने संशयों को व्यक्त किया था और अब वह सुनिश्चित कर रहा है कि क्या ईश्वर की आज्ञा पालने से ही सच्ची मुक्ति मिल सकती है। कृष्ण इस समय उसे यह विश्वास दिला रहे हैं कि उनके मार्ग पर चलना सबसे आसान और सुरक्षित रास्ता है।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप एक बड़ी नौकरी में काम कर रहे हैं जहाँ आपको बहुत तनाव (anxiety) महसूस हो रहा है क्योंकि आपको लगता है कि दूसरे लोग आपके किये हुए कार्यों पर शिकायतें करते हैं या आपका विश्वास नहीं रखते। इस स्थिति में, यदि आप 'अनसूया' भावना अपनाकर बिना किसी दुश्मनी के काम करें और अपने उद्देश्य को ईश्वर की इच्छा समझकर पूर्ण श्रद्धा से निभाएं, तो नौकरी का बोध कम हो जाएगा। इस तरह आप कर्मों के फल (सफलता या असफलता) की चिंता छोड़ देंगे और अपने कार्य में संतुष्टि पाएंगे, जो आपको मानसिक शांति और मुक्ति प्रदान करेगी।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जैसे एक छोटा बच्चा अपनी माँ से कहता है 'मैं तुम्हें भरोसा करता हूँ और आपकी बात मान लूंगा', ठीक वैसे ही जो लोग ईश्वर की शिक्षाओं पर पूरा विश्वास करते हैं, वे हर समस्या का सामना बिना डरे कर सकते हैं। जब हम किसी अच्छे काम को बिल्कुल सही तरीके से और बिना नफरत या शिकायत के करते हैं, तो हमारी चिंताएं अपने आप दूर हो जाती हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि अगर तुम ईश्वर की बातों पर भरोसा करके अच्छे काम करोगे, तो दुनिया की सारी मुश्किलें हल हो जाएंगी और तुम खुश रहोगे।

दैनिक चिंतन

प्रिय पाठक, क्या आपने कभी सोचा है कि आपके अहंकार और नाराजगी आपको क्यों बांधे हुए हैं? भगवान श्रीकृष्ण का संदेश स्पष्ट है: जब हम बिना किसी ईर्ष्या या दोष के उनके मार्ग पर चलते हैं, तो वही कार्य हमें बन्धनों से मुक्त कर देता है। आज की शुरुआत में यह निश्चय करें कि आप अपने हर कर्म को 'श्रद्धा' और 'अनसूया' (निर्दोष भाव) के साथ करेंगे, क्योंकि यही सच्ची आध्यात्मिक स्वतंत्रता का द्वार है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के समय में, मन को स्थिर करके सोचें कि क्या आप अपने कर्मों पर दोष देखने की बजाय श्रद्धा से दृष्टि रखते हैं। स्वस्थ बुद्धि और निष्काम भाव के साथ किए गए हर कार्य आपको बांधन मुक्त करने का मार्ग दिखाता है, इसलिए आज किसी भी काम को बिना कटुता या आलोचना के पूरा करें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. श्रद्धा और अनुष्ठान की शक्ति
    कर्मयोगी को केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि गहरी श्रद्धा (विश्वास) पर चलने वाले कर्मों द्वारा मुक्तता मिलती है। जब यह विश्वास पूर्ण होता है और अनुष्ठान नियमित रूप से किया जाता है, तो वह व्यक्ति स्वतः ही पवित्र हो उठता है।
  2. अनसूया: निर्दोष भाव का महत्व
    'अनसूयन्त:' (बिना ईर्ष्या या दोष के) होने से कर्मों की शुद्धता बनी रहती है और व्यक्ति में आलोचनात्मक चेतना नहीं होती। यह निर्दोष भाव मनुष्य को दूसरों पर दया रखने और स्वयं सुधार करने का मार्ग प्रशस्त करता है, जिससे कर्म बांधते नहीं हैं।
  3. कर्म से मुक्ति: विलक्षण सिद्धांत
    सामान्य तौर पर कर्म हमें बंधन में डालता है, लेकिन यहाँ भगवान कहते हैं कि श्रद्धा और निर्दोष भाव वाले कर्म स्वयं ही मुक्ति का कारण बन जाते हैं। यह सिद्ध करता है कि कार्य की प्रकृति नहीं, बल्कि उसकी दिशा और आंतरिक दृष्टि (मन) मायने रखती है।

विषय

कर्म योग (Karma Yoga)श्रद्धा और विश्वास (Faith and Belief)मुक्ति का मार्ग (Path to Liberation)निरपेक्षता (Detachment)अनसूया भावना (Non-cavilling nature)ईश्वर की आज्ञा पालन

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  1. 2.47 — यह वर्ग आपको 'कर्म फल की अपेक्षा' के सिद्धांत को समझने में मदद करेगा, जो इस अध्याय का आधार है।
  2. 3.21 — इसमें वर्णित 'उत्तम पुरुषों' द्वारा आचरण के महत्व को समझने के लिए यह अनुशंसित है, जो श्रद्धा से जुड़ा हुआ है।
  3. 18.65 — अंतिम संदेश में भगवान का पुनरावर्तन 'सदा मुझे याद रखो' और कर्मों को त्यागने की विधि है, जो इस अध्याय के निष्कर्ष के रूप में आती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रद्धा और अनसूया क्या अर्थ हैं?
श्रद्धा का शाब्दिक अर्थ पूर्ण विश्वास या आस्था होना है, जबकि 'अनसूयन्तः' का अर्थ है बिना किसी शंका, ईर्ष्या या कटुता के। यह दोनों गुण मिलकर एक ऐसे व्यक्ति को बनाते हैं जो ईश्वर के मार्ग पर पूरी निष्ठा और प्यार से चलता है।
कर्मों से मुक्ति का क्या अर्थ है?
यहाँ 'मुक्ति' का अर्थ कर्म न करने या दुनिया छोड़ने से नहीं, बल्कि कर्मों के फल (सफलता/विफलता) की चिंता और बंधन से आजाद होना है। जब व्यक्ति ईश्वर को समर्पित होकर कार्य करता है, तो वह कर्म का बोझ नहीं उठाता क्योंकि उसे परिणाम की फिक्र नहीं रहती।
क्या केवल भगवद गीता पढ़ने से मुक्ति मिल जाती है?
नहीं, श्लोक कहता है कि मनुष्यों को 'अनुतिष्ठन्तः' यानी सदा का अनुशीलन या व्यवहार में लागू करना चाहिए। केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है; इसे जीवित करके और बिना किसी दोष बुद्धि (शंका) के अपनाकर ही वास्तविक परिवर्तन संभव है।
आज की दुनिया में इस श्लोक का क्या महत्व है?
आजकल लोग अक्सर नौकरी, रिश्ते या जीवन के निर्णयों पर शंका और दोष देखने वाले होते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि यदि हम बिना किसी द्वेष या संदेह के अपने कर्तव्य को ईश्वर की इच्छा मानकर निभाएँ, तो तनाव समाप्त हो जाएगा और मन शांत रहेगा।
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