भगवद्गीता 3.18
Karma Yoga · हिन्दी अनुवाद
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन | न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ||३-१८||
naiva tasya kṛtenārtho nākṛteneha kaścana . na cāsya sarvabhūteṣu kaścidarthavyapāśrayaḥ ||3-18||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि परम आत्मा या पूर्ण ज्ञानी पुरुष के लिए न तो किसी कार्य को करने में और न ही न करने में कोई लाभ-हानि है। वह व्यक्ति अपनी सफलता के लिये बाहर की दुनिया या दूसरों पर निर्भर नहीं रहता क्योंकि उसे यह समझ आ चुकी है कि उसका स्वभाव ही पूर्ण है। इस श्लोक का मुख्य सिद्धांत यह है कि कर्म करने से पहले उसके फल की चिंता करना त्याग देना चाहिए, न कि कर्म को छोड़ देना चाहिए।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'कर्म योग' (Karma Yoga) के सिद्धांतों को गहराई से समझाने वाला है, जो कि कृष्ण द्वारा प्रस्तुत किया गया एक मुख्य मार्ग है जहाँ फल की इच्छा छोड़कर कार्य करने पर बल दिया जाता है। यह 'ज्ञान' (Jnana) और 'वैराग्य' (Detachment) के बीच का सेतु बनाता है, जो दर्शाता है कि आत्म-साक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति को बाहरी कार्यों या दूसरों की सहायता की आवश्यकता नहीं होती।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत की युद्ध भूमि कुरुक्षेत्र में हुआ एक संवाद का हिस्सा है जहाँ अर्जुन ने भीम, द्रोण जैसे अपने ही गुरुओं और भाइयों को मारने से इनकार कर दिया था। कृष्ण ने अपनी दिव्य उपदेश की श्रृंखला के दौरान अर्जुन को यह समझाया कि आत्मा न तो जन्म लेती है और न ही मरती है, इसलिए युद्ध में कोई हानि नहीं होगी। तब तक कृष्ण ने 'सात्विक बुद्धि' (ज्ञान) के मार्ग पर चर्चा की थी और अब वे अर्जुन को यह बता रहे हैं कि पूर्ण ज्ञानी व्यक्ति का मन फल की आस से मुक्त क्यों होना चाहिए, ताकि वह युद्ध में अपनी कर्तव्यनिष्ठा बनाए रख सके।
आज के जीवन में
मान लीजिए आप एक प्रोजेक्ट के लिए बहुत मेहनत कर रहे हैं और आपके मन में यह है कि अगर बॉस आपको तारीफ न करें या बढ़ोत्तरी नहीं मिलती, तो क्या काम करना बेकार हो जाएगा? इस श्लोक का उपयोग करते हुए, आप ऐसा सोचेंगे: 'मेरा कर्म मुझे पूरा करने के लिए किया गया है, चाहे परिणाम कुछ भी हो।' जब आपको पता चल जाता है कि आपके मन की शांति दूसरों या बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती, तो आप तनाव और चिंतन से मुक्त होकर अपने काम में पूरी एकाग्रता लगा सकते हैं।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि तुम अपने घर के बगीचे में पौधे लगा रहे हो और उनका ख्याल रख रहे हो। क्या यह जरूरी है कि तुम्हें फूल तुरंत देखने को मिल जाएं या बाद में कुछ पैसा मिलता है? नहीं, ना! क्योंकि तुम सिर्फ अच्छा काम करना चाहते हो। भगवान कृष्ण कहते हैं जैसे बगीचा लगाने का मकसद केवल पौधों की देखभाल करती है, वैसे ही हमें भी बिना किसी इनाम या डर के अपने सही काम करने चाहिए। जब तुम सिर्फ अच्छाई के लिये कुछ करते हो, तो तुम्हारा मन सुखी और शांत रहता है।
दैनिक चिंतन
आज आप शायद इस बात से डरे हुए हैं कि अगर आपने कुछ नहीं किया तो क्या होगा या यदि गलतियां हुईं तो भविष्य कैसे सुधरेंगा? कृष्ण आपको यह आश्वासन देते हैं कि आपकी वास्तविक पहचान में न करने वाले और करने वाले दोनों से कोई प्रयोजन है, क्योंकि आपका अस्तित्व ही पर्याप्त है। जब आप अपने कार्यों को ईश्वर की ओर समर्पित करते हैं और फल की चिंता छोड़ देते हैं, तो मन का भार हल्का हो जाता है और आप सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त करते हैं।
आज के लिए एक अभ्यास
अपने मन में विचार करें कि आपकी आत्मा की प्रकृति स्वयं पूर्ण है और उसे बाहरी कार्यों या फलों से कोई लाभ नहीं मिलता। जब भी किसी कार्य के परिणाम को लेकर चिंतित हों, तो यह स्मरण करें कि ईश्वर में स्थित होने पर आपको कर्म करने का ही आदेश दिया गया है, न कि उसके फल की अपेक्षा।
मुख्य शिक्षाएँ
- आत्म-सम्पूर्णता (Self-Sufficiency)
जो पुरुष अपने को आत्मा के रूप में जान लेता है, उसके लिए कर्म करने या न करने से कोई लाभ हानि नहीं होता। यह सिद्धांत बताता है कि हमारी वास्तविक संपदा बाहरी कार्यों पर निर्भर नहीं बल्कि अंतर्यामी ईश्वर की उपस्थिति में निहित होती है। - सर्वत्र समत्व (Equanimity)
कर्म के फल को लेकर चिंता करना और उससे आशा रखना, मन का कष्ट ही बढ़ाता है; इसलिए साधु पुरुष किसी भी वस्तु या भूतमात्र पर निर्भर नहीं होते। यह समझना आवश्यक है कि हमारा कार्य स्वयं में पूर्ण है यदि उसे निष्काम भाव से किया जाए। - निःस्वाद कर्म (Selfless Action)
इस श्लोक का सार यह नहीं है कि हमें कुछ न करना चाहिए, बल्कि यह है कि हमारा अर्थपूर्ण होना 'कृत' या 'अकृत' पर आश्रित नहीं है। वास्तविक कर्म योग में व्यक्ति अपने कार्य को ईश्वर के लिए समर्पित कर देता है और फल की इच्छा त्याग देता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — यह श्लोक 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' का मूल आधार है जो इस अध्याय की नींव रखता है और कर्म योग के सिद्धांत को स्पष्ट करता है।
- 3.30 — कृष्ण से यह श्लोक सीखें कि कैसे सभी कार्यों का त्याग करके उन्हें ईश्वर में समर्पित करना चाहिए, जो इस अध्याय के निष्कर्ष की ओर ले जाता है।
- 12.15 — इस श्लोक से आप यह सीखेंगे कि भगवान किस प्रकार ऐसे व्यक्ति को प्रिय समझते हैं जो किसी भी वस्तु के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं होता, जैसे कि इस गीता में वर्णित है।
अनुशंसित पुस्तकें
GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.