भगवद्गीता 2.71
Sankhya Yoga · हिन्दी अनुवाद
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः | निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ||२-७१||
vihāya kāmānyaḥ sarvānpumāṃścarati niḥspṛhaḥ . nirmamo nirahaṅkāraḥ sa śāntimadhigacchati ||2-71||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो व्यक्ति सभी कामनाओं को त्याग देता है, न तो किसी वस्तु के मालिक होने का भाव रखता है और न ही अपनी ईश्वरिता या अहंकार में फंसता है, वह स्वयं चलने-फिरने पर भी शान्ति पा लेता है। यह श्लोक बताता है कि बाहर की चीजों से जुड़ाव तोड़ना ही आंतरिक शांति का मुख्य मार्ग है। जब मन 'ये मेरा है' और 'मुझे ये चाहिए' के संकल्पों से मुक्त हो जाता है, तभी सच्चा निश्चलता प्राप्त होती है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक मुख्य रूप से 'कर्म योग' और 'ज्ञान योग' के सिद्धांतों का संयोग है, जहाँ कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि कैसे निष्काम भाव (बिना फल की इच्छा) और वैराग्य से काम करने पर आत्मा स्वतंत्र होती है। यह 'मिमंसा' (दार्शनिक विश्लेषण) के तहत 'अहंकार' और 'स्पर्श' को त्यागकर ब्रह्मानंद या शान्ति की अवस्था तक पहुँचने का मार्ग प्रस्तुत करता है। यह बताता है कि वास्तविक ज्ञान (ज्ञान योग) केवल पढ़ना नहीं, बल्कि मन से 'ममत्व' और 'अहंकार' को हटाना ही सच्चा कर्मयोग है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत युद्ध की पूर्व संध्या पर कुरुक्षेत्र के मैदान में हुआ एक संवाद का हिस्सा है, जहाँ पांडवों के पक्ष से अर्जुन और कौरवों के पक्ष से भीष्म पितामह ने लड़ना शुरू किया था। इससे ठीक पहले, युद्ध के भय और अपने धर्म (कर्तव्य) को लेकर उलझाव में फंसा हुआ अर्जुन हथियार नीचे रखकर रोने लगा था और कृष्ण से मार्गदर्शन माँगा था। श्री कृष्ण ने 'संक्या योग' का उपदेश देते हुए आत्मा की अमरता और संसार के निरंतर चलते रहने पर बात करके उसे समझाया है, जिसका परिपक्व रूप इस श्लोक में दिखाई दे रहा है।
आज के जीवन में
मान लीजिए आप एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और आपको लगता है कि सफलता मिलने पर वह 'आपका' होगा या असफल होने से बचाना आपके अहंकार को ठेस पहुंचाएगा। इस स्थिति में, आप कार्य के लिए पूरी तरह समर्पित हो सकते हैं (निष्काम कर्म), लेकिन परिणाम की चिंता नहीं कर सकते और न ही इसे 'मेरी उपलब्धि' या 'मेरा अपमान' मान सकते हैं। जब आप ऐसे काम करते हैं कि सफल-असफल दोनों स्थिति में भी मन का संतुलन बना रहे, तो आपको तनाव मुक्त शान्ति मिलती है जो बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
क्या आपने कभी देखा है कि अगर आपको बहुत सारी खिलौनों की जरूरत लगती है और हर चीज़ को 'मेरा' कहते हैं, तो मन शांत नहीं रह पाता? ठीक वैसा ही श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं। वे बताते हैं कि अगर आप किसी चीज़ के लालची नहीं होंगे, न सोचेंगे कि ये सब 'मेरा' है और न ही खुद को बहुत बड़ा समझेंगे, तो आपको हमेशा सुकून मिलेगा। जैसे एक बादल बिना किसी बोझ के आसमान में उड़ता रहता है, वैसे ही यह व्यक्ति भी दुनिया में चलकर भी मन से पूरी तरह स्वतंत्र और शांत रहता है।
दैनिक चिंतन
क्या आप कभी महसूस करते हैं कि आंतरिक शांति तब मिलती है जब हमारे पास कुछ नहीं होना चाहिए? भगवान श्रीकृष्ण आज के श्लोक में बताते हैं कि वास्तविक मुक्ति कामनाओं को त्यागने और 'ममता' का अभाव होने से ही संभव होती है। जब आप प्रत्येक कार्य में स्वार्थ और हंकार छोड़ देते हैं, तो आपके भीतर एक गहरी शांति अपने आप जाग्रत हो उठती है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपनी इच्छाओं और आसक्ति को देखकर उन पर एक शांत दृष्टि रखें। स्वयं से पूछें कि क्या मैं 'मैं' या 'मेरा' कहने के बजाय, निस्वार्थ भाव से कार्य कर रहा हूँ? इस क्षण में अपने मन को स्पृहारहित और अहंकार रहित होने की अनुमति दें।
मुख्य शिक्षाएँ
- कामनाओं का त्याग (Tyaga of Kama)
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि मानव दुख की जड़ें असीम इच्छाओं और लालसाओं में निहित हैं। जब पुरुष सभी वांछनीय वस्तुओं के लिए आसक्ति छोड़ देता है, तो वह मोक्ष की ओर पहला कदम उठा लेता है। - निर्ममत्व और निराहंकार (Nirmamo Nirahankara)
शांति तभी प्राप्त होती है जब 'यह मेरी' या 'मैं' वाली भावना समाप्त हो जाती है। अहंकार को त्यागकर व्यक्ति अपने कर्तव्य में लीन होता है, न कि फल की आकांक्षा में। - प्राप्ति शान्ति (Prapti Shanti)
श्लोक का अंत बताता है कि इन सभी गुणों के साथ विचरण करने वाला पुरुष निश्चित रूप से 'शांति' को प्राप्त करता है। यह शांति बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं, बल्कि आंतरिक स्थिरता की दृष्टि है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — इस श्लोक का मुख्य आधार और 'कर्म योग' की मूल सिद्धांत को समझने के लिए पहले यह पढ़ें।
- 3.30 — 'ममत्व' और अहंकार से मुक्त होकर कर्तव्य निभाने की विधि (नियोग) को समझने के लिए यह श्लोक महत्वपूर्ण है।
- 12.15 — 'शांति' प्राप्त करने वाले पुरुष के गुणों और भगवान की प्रेमभावना का विस्तृत वर्णन इसके बाद आता है।
अनुशंसित पुस्तकें
GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.