भगवद्गीता 2.5

Sankhya Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 2.5 — "इन महानुभाव गुरुजनों को मारने से इस लोक में भिक्षा का अन्न भी ग्रहण करना अधिक कल्याण कारक है, क्योंक"
भगवद्गीता 2.5 — Sankhya Yoga
संस्कृत

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके | हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ||२-५||

लिप्यंतरण

gurūnahatvā hi mahānubhāvān śreyo bhoktuṃ bhaikṣyamapīha loke . hatvārthakāmāṃstu gurūnihaiva bhuñjīya bhogān rudhirapradigdhān ||2-5||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण से संवाद कर रहे हैं और युद्ध के मैदान में अपने गुरुओं (पितामह भीषण, द्रोणाचार्य आदि) को मारने की अपनी इच्छा का विरोध करते हुए कहते हैं। वे मानते हैं कि यदि उन्होंने इन महानुभावों को वध कर दिया, तो भले ही वे इस लोक में राजसूय यज्ञ या सम्राट बनकर सभी सुख-सुविधाएं भोग लें, यह कार्य उनसे बेहतर है जो उन्हें मारने के बाद भीड़ की तरह जीवित रह जाएं। अर्जुन का कहना है कि रक्त से सने हुए धन और आनंद को भोगने में कोई कल्याण नहीं है; बल्कि ऐसे पापपूर्ण कार्य के बाद जीवन भर भिक्षा मांगकर चलना ही अधिक श्रेयस्कर (कल्याणकारी) माना जाएगा। इसका मुख्य शिक्षणा यह है कि अत्याचार और अधर्म से प्राप्त की गई संपत्ति या सुख कभी भी मनुष्य को आनंद नहीं दिला सकते, बल्कि वे उसे नरक में डाल देते हैं।

इसके पीछे का सिद्धांत

इस श्लोक को 'कर्म योग' के सिद्धांतों का परिचय देने वाले संदर्भ में रखा जा सकता है, विशेष रूप से उस भाग जहाँ अर्जुन की कृपा और भ्रमना (delusion) दिखाई देती है। यह 'संख्या योग' (Sankhya Yoga) के अध्याय 2 का प्रारंभिक हिस्सा है जो आत्मा, धर्म और कर्म के फल को समझने की तैयारी करता है। इसमें 'धर्म' (Dharma) की अवधारणा विकसित होती है कि क्या कार्य करना चाहिए (क्या न करें), और यह स्पष्ट करती है कि अत्याचार से प्राप्त सुख (bhoga) कभी भी आनंददायी नहीं हो सकता, क्योंकि वह पाप का फल होता है।

शब्दार्थ
गुरून् the Gurus (teachers), अहत्वा instead of slaying, हि indeed, महानुभावान् most noble, श्रेयः better, भोक्तुम् to eat, भैक्ष्यम् alms, अपि even, इह here, लोके in the world, हत्वा having slain, अर्थकामान् desirous of wealth, तु indeed, गुरून् Gurus, इह here, एव also, भुञ्जीय enjoy, भोगान् enjoyments, रुधिरप्रदिग्धान् stained with blood. No commentary.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेश दिए जाने से ठीक पहले का समय है, जब अर्जुन ने अपने गुरुओं और भाइयों को सामने देखा था। युद्ध शुरू होने वाले ही थे कि अर्जुन के मन में करुणा और धर्म की भ्रमना पैदा हो गई; वह अपनी सैन्य व्यवस्था (कौन्तेय) से कह रहा है कि उसे अपने गुरुओं का वध करना कल्याणकारी नहीं लगता। यह क्षण उसकी मानसिक संघर्ष की चरमावस्था को दर्शाता है जहाँ उसके लिए धर्म और प्रेम के बीच टकराव हुआ था, जिसके कारण वह शस्त्र फेंकने पर विचार करने लगा था, लेकिन तभी कृष्ण ने उसे सत्य का मार्ग दिखाने के लिए बोल्ड होना शुरू किया।

आज के जीवन में

आज की दुनिया में एक प्रबंधक (manager) को यह चुनौती मिल सकती है कि वह अपने कंपनी से जुड़े पुराने और वरिष्ठ कर्मचारियों या गुरुओं का अपमान करके, उन्हें नजरअंदाज करके अपनी बोनस बढ़ा सकता है। अर्जुन के इस श्लोक की तरह, यदि प्रबंधक ने इन लोगों को हटाने से अपने पद और धन (arthakama) को प्राप्त किया, तो भले ही वह महंगी कार और घर खरीदे, उसे उस सफलता में कोई सुख नहीं मिलेगा क्योंकि वह 'रुधिरप्रदिग्धान' यानी रक्त या दूसरों के दुःख से अर्जित धन का भोग कर रहा होगा। वास्तविक जीवन में, इसका मतलब है कि किसी भी कठिन निर्णय (hard decision) में यदि हमें अन्याय करना पड़ेगा, तो उसे टालना ही बेहतर है; बल्कि छोटी आय या साधारण जीवन जीने की स्थिति में रहकर अपना सत्य और नैतिकता बनाए रखना ही अधिक श्रेयस्कर (kalyan) माना जाता है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

अर्जुन नाम का एक राजकुमार था जो युद्ध के मैदान में खड़ा अपने सभी गुरुओं (उनके शिक्षकों) को मारने की तैयारी कर रहा है, लेकिन वह बहुत दुखी और भ्रमित है। उसकी कहानी से हम सीखते हैं कि अगर कोई बुरा काम करता है, जैसे किसी अच्छे इंसान या उसके प्यारे गुरुओं पर हाथ उठाता है, तो उसे मिलने वाला सारा पैसा और खिलौने भी खुशी नहीं दिला सकते। अर्जुन कहता है कि ऐसे पाप के बाद अगर वह भगवान की तरह सब कुछ भोग लेगा, तो उसका मन कभी शांत नहीं होगा; बल्कि शायद उसे गरीब बनकर भिक्षा मांगनी पड़ेगी और फिर भी वह आराम से सो न सकेगा। इसलिए, हमें हमेशा अच्छे लोगों का सम्मान करना चाहिए और किसी की मदद या रक्षा करनी चाहिए, उन्हें कभी नहीं मारना चाहिए।

दैनिक चिंतन

जब हम गुरुओं या मूल्यों को हानि पहुँचाने से भी अपनी स्वार्थी खुशी को चुनते हैं, तो वह भोग रक्त से प्रदूषित हो जाता है और अंततः आत्मविनाश का कारण बनता है। इस सच्चाई को स्वीकार करें कि कर्तव्य के प्रति समर्पण ही वास्तविक शांति देता है, न कि निष्काम भोग। आज अपने जीवन में उन निर्णयों की पहचान करें जहाँ आपने 'आसानी' या 'लाभ' को धर्म पर तरजीह दी हो, और उसे सुधारने का साहस करें।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के अभ्यास में, अपने मन से यह पूछें कि क्या मैं किसी की मान्यताओं या गुरुत्व को नकारकर अपनी स्वार्थी इच्छाओं पर चल रहा हूँ? इस दृष्टिकोण को त्याग करके, यदि मुझे कठिन परिस्थितियों में भी विनम्रता और निष्काम भाव से जीना पड़े, तो क्या यह अधिक श्रेयस्कर है? अपने अहंकार की तुलना में धर्म के प्रति समर्पण को प्राथमिकता देने का संकल्प लें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. अहिंसा और कर्तव्य की गहराई
    कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि धर्म के विरुद्ध संघर्ष करना, भले ही वह अपने ही लोगों के प्रति हो, सबसे बड़ा पाप है। यह बताता है कि कभी भी स्वार्थी लाभ या डर से सत्य का मार्ग छोड़ना नहीं चाहिए।
  2. भोगों की प्रकृति और परिणाम
    जो भोग दूसरों के दुःख या हानि पर आधारित होते हैं, वे 'रक्तरंजित' होते हैं और आत्मा को कभी शांत नहीं करते। यह सिखाता है कि असली सुख निष्काम कर्म में ही है, न कि पापपूर्ण उपलब्धियों में।
  3. भिक्षा का मानसिक समर्पण
    यह श्लोक बताता है कि भिक्षु की तरह विनम्र जीवन जीना, बड़े पापी कर्मों से भी अधिक पवित्र और उच्चतर है। यह अर्थ-काम के मोह को त्यागकर आत्म-शोधन का मार्ग दिखाता है।

विषय

धर्म और अधर्म (Dharma and Adharma)कर्म का फल (Fruits of Action)गुरु की महत्ता (Glorification of Teachers)नैतिक संघर्ष (Moral Conflict)सत्य का मार्ग (Path of Truth)वैराग्य और त्याग (Detachment and Renunciation)

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — यह श्लोक इस आगे की चर्चा को जोड़ता है कि कर्म के फल में लीन न रहकर, अपने धर्म का पालन कैसे किया जाए।
  2. 3.25 — यह श्लोक समझाता है कि बुद्धिमान लोग भी कर्तव्य के लिए ही संघर्ष करते हैं, न कि स्वार्थी भोगों के लिए।
  3. 18.67 — यह श्लोक बताता है कि गुरु को कैसे चुना जाए और उसकी शिक्षाओं का पालन करने से आत्मा की शुद्धि होती है, जो इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'रुधिरप्रदिग्धान' शब्द का क्या अर्थ है?
'रुधिर' का शास्त्रीय अर्थ रक्त होता है और 'प्रदिग्धां' का अर्थ लिपटा हुआ या संतृप्त होना है। इसलिए, यह शब्दावली उन भोगों (संपत्ति और सुख) की ओर इशारा करती है जो गुरुओं के रक्त से सने हुए हैं, यानी अन्याय और पापपूर्ण कार्य द्वारा अर्जित धन को दर्शाते हैं।
कृष्ण ने इस श्लोक में क्या उत्तर दिया था?
इस श्लोक के तुरंत बाद, भगवान कृष्ण अर्जुन की इस मानसिकता को 'अज्ञान' (ignorance) और 'पाप-भय' से मुक्त करते हैं। वे समझाते हैं कि आत्मा न मरती है और गुरुओं का वध करने के डर में धर्म छोड़ना नहीं चाहिए, बल्कि अपना कर्तव्य निर्विघ्न करना ही सच्चा योग है।
इस श्लोक से हमें जीवन में क्या सीख मिलती है?
हमें इससे यह सीख मिलती है कि कभी भी अपने लक्ष्यों या धन की प्राप्ति के लिए नैतिकता (Dharma) का त्याग नहीं करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति पापपूर्ण कार्य करके सफल होता है, तो उसे प्राप्त सुख में कभी पूरा आत्म-संतोष नहीं मिलेगा; इसलिए हमें अपने कर्मों को शुद्ध रखना और धर्म के मार्ग पर चलना ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य मानना चाहिए।
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