भगवद्गीता 2.2

Sankhya Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 2.2 — "श्री भगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! तुमको इस विषम स्थल में यह मोह कहाँ से उत्पन्न हुआ?  यह आर्य आचरण क"
भगवद्गीता 2.2 — Sankhya Yoga
संस्कृत

श्रीभगवानुवाच | कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् | अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ||२-२||

लिप्यंतरण

śrībhagavānuvāca . kutastvā kaśmalamidaṃ viṣame samupasthitam . anāryajuṣṭamasvargyamakīrtikaramarjuna ||2-2||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि युद्ध के मैदान जैसे विषम स्थान पर दुख और संदेह (कश्मल) का प्रदर्शन करना उचित नहीं है। यह व्यवहार आर्य पुरुषों की शोभा को नष्ट करता है, स्वर्ग प्राप्ति में बाधा डालता है और कलंक या अपकीर्ति का कारण बनता है। मूल शिक्षा यही है कि संकट के समय भी बुद्धिमान होना चाहिए और भावनाओं पर नियंत्रण रखकर धर्म की ओर बढ़ना चाहिए, न कि निराशा में डूब जाना चाहिए।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'संख्या योग' की मूल अवधारणाओं का परिचय देता है, जहाँ कर्म और बुद्धि (ज्ञान) के बीच संघर्ष को स्पष्ट किया जाता है। यह भावनात्मक अस्थिरता (मोह/अविद्या) पर नियंत्रण पाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है जो आत्मा के स्वरूप और कर्मयोग के मार्ग में बाधा बनती है, जिससे विवेक का उपयोग करके संघर्ष करने वाला व्यक्ति स्वयं को उच्च स्थिति प्राप्त हो सकती है।

शब्दार्थ
कुतः whence, त्वा upon thee, कश्मलम् dejection, इदम् this, विषमे in perilous strait, समुपस्थितम् comes, अनार्यजुष्टम् unworthy (unaryanlike), अस्वर्ग्यम् heavenexcluding, अकीर्तिकरम् disgraceful, अर्जुन O Arjuna. No commentary.

यह कहाँ घटित होता है

यह घटना महाभारत की युद्ध भूमि कुरुक्षेत्र में हुई थी जहाँ अर्जुन और कृष्ण दोनों ने अपनी सेनाओं को खड़ी किया था। युद्ध शुरू होने से ठीक पहले, जब अर्जुन अपने ही बंधुओं और गुरुओं को देखकर संघर्ष करने के लिए तैयार नहीं हुए थे, वे दौड़ते हुए रथ में बैठ गए थे और शोक में डूब गए थे। इस स्थिति का सामना करते हुए भगवान कृष्ण ने अर्जुन की ओर मुड़े और उन्हें 'विषम' (कठिन) समय पर होने वाले उनके मोह के लिए सलाह दी कि यह व्यवहार आर्य नहीं है।

आज के जीवन में

आज के जीवन में जब किसी व्यक्ति को प्रोजेक्ट डैडलाईन या बड़ी जिम्मेदारी मिलती है और वह तनाव, भ्रम या असफलता की चिंता से परेशान होकर काम करना छोड़ देता है, तो कृष्ण का यह संदेश लागू होता है। ऐसे समय में भावनात्मक ढलन (dejection) न केवल स्थिति को बेहतर बनाने वाले अवसरों की हानि करती है बल्कि व्यक्ति और उनके परिवार पर भी सकारात्मक प्रभाव डालने वाली असफलता का कारण बन सकती है। इसे समझकर हमें कठिन निर्णय लेते समय भावनाओं को नहीं, लेकिन बुद्धि और धर्म (कर्तव्य) के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए ताकि भविष्य में पछतावा न हो।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जैसे एक बहादुर खिलाड़ी मैदान में हार नहीं मानता या रोता नहीं है, वैसे ही अर्जुन को कृष्ण कहते हैं कि युद्ध जैसे मुश्किल समय पर डरना और रूठ जाना सही नहीं है। अगर कोई बड़ा काम करने की जगह सिर्फ शर्मिंदगी महसूस करे या रोने लगे, तो वह न अपने लिए अच्छा कर पाएगा और न ही दूसरे लोग उसकी प्रशंसा करेंगे। इसलिए कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हिम्मत रखो और अपनी बात को पूरा करने के लिए आगे बढ़ो, क्योंकि यह तुम पर शर्म का कारण बन सकता है अगर तुम डर गए।

दैनिक चिंतन

क्या आपने आज किसी मुश्किल स्थिति में झिझक महसूस की? Krishna जी आपको याद दिलाते हैं कि जब हम संघर्ष के समय भी सच्चे आचरण और धर्म से हटकर दुखी होते हैं, तो वह न स्वर्ग का मार्ग है और न ही समाज में गौरव। अपने आप को क्षमा करें और समझें कि यह मोह अस्थायी है; जब तक हम कर्तव्य पर आसक्त नहीं रहते, तब तक जीवन की विषम स्थितियां भी हल्की हो जाती हैं।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने मन में उठने वाले किसी भी मोह या संकट की अनुभूति को स्वीकार करें। स्वयं से पूछें कि यह दुख मेरे सच्चे धर्म के विपरीत तो नहीं है? शांत होकर सोचें कि अर्जुन जैसे युद्ध में खड़े होने पर भी, जब हम अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, तो मोह स्वयं विलीन हो जाता है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. आर्य आचरण का महत्व (Noble Conduct)
    श्री कृष्ण बताते हैं कि संकट के समय दुखी या निराश होना सच्चे मनुष्यों की प्रवृत्ति नहीं है, बल्कि यह 'आर्य' आचरण के विपरीत है। एक उच्च चेतन व्यक्ति को हर परिस्थिति में धैर्य और साहस का अनुसरण करना चाहिए।
  2. कर्तव्य की पवित्रता (Purity of Duty)
    युद्ध के मैदान जैसे 'विषम' स्थल पर भी कर्तव्य से हटना स्वार्थी है और यह न तो आत्मीय सुख देता है और न ही समाज में कीर्ति। हमें इस बात को समझना होगा कि धर्म का पालन करने वाले के लिए कोई परिस्थिति वास्तविक बाधा नहीं बन सकती।
  3. मोह का स्रोत (Source of Delusion)
    दुख और मोह तब उत्पन्न होता है जब हम अपनी पहचान शरीर या परिस्थितियों से जोड़ लेते हैं, न कि आत्मा के साथ। कृष्ण अर्जुन को यह समझाकर कह रहे हैं कि उनके मन में उठा यह संकट उनकी वास्तविक प्रकृति का हिस्सा नहीं है।

विषय

कर्म और कर्तव्य (Action and Duty)मोह और संदेह (Attachment and Doubt)संघर्ष के समय धैर्य (Courage in Crisis)आत्म-नियंत्रण (Self-Control)कीर्ति और पवित्रता (Reputation and Purity)ज्ञान योग की शुरुआत (Beginning of Knowledge Yoga)

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  1. 2.47 — अब यह समझने के लिए कि कृष्ण ने अर्जुन को मोह से मुक्त करने और फल की चिंता छोड़कर केवल कर्म पर ध्यान केंद्रित करने का निर्देश कैसे दिया।
  2. 3.30 — इसके बाद यह पढ़ना महत्वपूर्ण है कि संपूर्ण कर्तव्य को ईश्वर के समर्पण के रूप में करके हम मोह से कैसे स्वतंत्र हो सकते हैं।
  3. 12.15 — अंत में यह देखना चाहिए कि एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन किया गया है जो सभी को दुख नहीं देता और दूसरों के लिए सुकून की ओर काम करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्लोक में 'विषम' शब्द का क्या तात्पर्य है?
'विषम' का अर्थ है कठिन, खतरनाक या असुविधाजनक स्थिति। यहाँ भगवान कृष्ण युद्ध के मैदान को विषम मानते हैं क्योंकि यह जीवन-मृत्यु की लड़ाई है और इसमें भावनाओं पर नियंत्रण न होना घातक साबित हो सकता है।
'अनार्यजुष्ट' का अर्थ क्या है और क्यों यह महत्वपूर्ण है?
"अनार्यजुष्ट" का मतलब है 'आर्यों द्वारा नहीं किए जाने वाले कार्य' या 'उच्च नैतिक मानकों के विपरीत व्यवहार'। कृष्ण कहते हैं कि संघर्ष की स्थिति में डरना और शोक करना एक आर्य (नoble) व्यक्ति का गुण नहीं है, जो उसकी पवित्रता को प्रभावित करता है।
क्या यह श्लोक केवल युद्ध से संबंधित है या जीवन की अन्य स्थिति में भी लागू होता है?
यह न केवल कुरुक्षेत्र के युद्ध, बल्कि जीवन के किसी भी 'विषम' परिस्थिति पर लागू होता है। चाहे वह करियर का संकट हो, पारिवारिक समस्या या कोई गंभीर निर्णय, इसका मूल सिद्धांत यह है कि कठिन समय में भावनात्मक ढलन नहीं बल्कि बुद्धिमानी और धैर्य से काम लेना चाहिए।
"अस्वर्ग्य" शब्द का क्या अर्थ है और यह कैसे संबंधित है?
"अस्वर्ग्य" का अर्थ है 'जो स्वर्ग या उच्च फल की प्राप्ति में सहायक नहीं है'। कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि यदि आप अपने दायित्वों को छोड़कर शोक में डूबे रहेंगे, तो न केवल वर्तमान समस्या का हल निकलेगा बल्कि भविष्य की उच्च आत्मिक प्राप्ति (स्वर्ग) भी बाधित हो जाएगी।
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