भगवद्गीता 2.18

Sankhya Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 2.18 — "इस नाशरहित अप्रमेय नित्य देही आत्मा के ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं। इसलिये हे भारत ! तुम युद्ध कर"
भगवद्गीता 2.18 — Sankhya Yoga
संस्कृत

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः | अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ||२-१८||

लिप्यंतरण

antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ . anāśino.aprameyasya tasmādyudhyasva bhārata ||2-18||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि ये शरीर नाशवान् और समय के साथ खत्म हो जाते हैं, लेकिन जिस आत्मा (देही) इनमें रहती है वह नित्य, अप्रमेय और सदा जीवित होती है। चूँकि आत्मा कभी नहीं मार सकती और न ही किसी द्वारा मार्जिना की जा सकती है, इसलिए शोक करना व्यर्थ है। इस ज्ञान के आधार पर अर्जुन को युद्ध में अपनी दायित्वनिष्ठा (कर्तव्य) का पालन करने के लिए प्रेरित किया गया है कि वे निडर होकर लड़ें।

इसके पीछे का सिद्धांत

इस श्लोक का मूल दर्शन 'ज्ञान योग' (Jnana Yoga) और 'सांख्य तत्व' पर आधारित है, जो अद्वैत वेदांत की बुनियादी समझ को स्पष्ट करता है। यह पांडुलिका (अनाशा) और शरीर के नाशवान होने के बीच का भेद बताकर आत्मा की 'नित्यता' (Eternity) सिद्ध करता है, जो कर्म योग में निष्काम भाव से कार्य करने की तैयारी करवाती है।

शब्दार्थ
अन्तवन्तः having an end, इमे these, देहाः bodies, नित्यस्य of the everlasting, उक्ताः are said, शरीरिणः of the embodied, अनाशिनः of the indestructible, अप्रमेयस्य of the immesaurable, तस्मात् therefore, युध्यस्व fight, भारत O Bharata
पारंपरिक भाष्य
-- Lord Krishna explains to Arjuna the nature of the allpervading, immortal Self in a variety of ways and thus induces him to fight by removing his delusion, grief and despondency which are born of ignorance.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महान युद्धभूमि कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन से कहा गया था, जब पांडवों की सेना और दुर्योधन के पुत्रों के बीच महासंघर्ष प्रारम्भ होने वाला था। इससे पहले अर्जुन ने अपने ही गुरुओं, भाइयों और मित्रों को मारने का विचार छोड़ दिया था और शोक व निराशा की अवस्था में युद्ध न करने के लिए बैठा हुआ था। कृष्ण ने 'सांख्य योग' (दार्शनिक ज्ञान) के माध्यम से अर्जुन के भ्रम को दूर करते हुए, उसकी आत्मा और शरीर की वास्तविक प्रकृति समझाई ताकि वह अपने कर्तव्य पर लौट सके।

आज के जीवन में

आज के समय में जब कोई व्यक्ति नोकरी खोने या बीमारी से निपटते हुए गहरे डर और चिंता का अनुभव करता है, तो यह श्लोक एक स्पष्ट दिशा देता है कि बाहरी परिस्थितियाँ (नौकरी, स्वास्थ्य) अस्थायी हैं। यदि आप अपने मूल्यवान कर्मों को निभाने में सक्षम हैं और अपनी आत्मिक शांति का ध्यान रखते हुए कार्य कर रहे हैं, तो बाहरी नुकसान से घबराकर हार नहीं माननी चाहिए। जैसे एक व्यापारी अस्थायी मुनाफ़े या नुकसान को देखकर अपना व्यवसाय बंद नहीं करता, वैसे ही आपको अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा बनाए रखनी चाहिए क्योंकि आपकी आत्मा इन बदलावों से प्रभावित नहीं होती।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

सोचिए जैसे आप अपने पुराने फटे हुए कपड़े बदल लेते हैं और नए पहन लेते हैं, वैसे ही हमारी आत्मा भी एक शरीर छोड़कर दूसरे में चली जाती है। ये शरीर ब्रह्मंडीय नियमों के अनुसार जन्म से लेकर मृत्यु तक होते रहते हैं और अंततः खत्म हो जाते हैं, लेकिन आपका असली 'आप' या आत्मा कभी नहीं मरती। इसलिए अगर कोई मुसीबत आए या आपको डर लगे, तो यह सोचें कि आपकी आत्मा सुरक्षित है और बस एक नया शरीर चुनने की प्रक्रिया चल रही है, इसीलिए हिम्मत रखकर अपने काम को पूरा करना चाहिए।

दैनिक चिंतन

जब आप जीवन की किसी कठिन चुनौती का सामना करते हैं या भय से घिरे होते हैं, तो यह स्मरण करें कि जो वास्तविक रूप से जी रहा है वह आपके शरीर नहीं बल्कि उस अविनाशी आत्मा है। इस देह के नाश को देखकर डरने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आपका सच्चा स्वयं कभी नष्ट होने वाला नहीं है। इसलिए, हे प्रिय पाठक, अपने भर्तव्य और संघर्ष में निडर होकर आगे बढ़ें, जानते हुए कि यह केवल एक शरीर का खेल है जो आपके चरित्र को परिष्कारित कर रहा है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के संघर्ष में, अपने शरीर को केवल एक अस्थायी वाहन मानें जो काल-चक्र का हिस्सा है। मन को स्थिर करके उस नित्य और अनंत देही आत्मा पर ध्यान दें जिसमें कोई जन्म नहीं और मृत्यु भी नहीं होती, फिर अपनेकर्तव्य में पूर्ण निष्ठा के साथ जुटें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. शरीर और देही का अंतरज्ञान
    इस आत्मा के लिए यह स्पष्ट करता है कि शरीर नाशवान् है जबकि उसका स्वामी (आत्मा) नित्य, सनातन और कभी नहीं मरने वाला है। इस भेद को समझना हमें देह-बंधन से मुक्त करके अज्ञानता के बंधनों को तोड़ता है।
  2. अविनाशी आत्मा की प्रकृति
    आत्मा न केवल कभी नहीं मरती, बल्कि वह अप्रमेय भी है जिसे कोई नाप-तोल या सीमित करके नहीं समझा जा सकता। यह निश्चित सत्य हमें देह की उपलब्धियों और हानियों पर मोहित होने से रोकता है।
  3. युद्ध के लिए प्रेरणा (निडरता)
    शरीरों की नाशवंतता को जानने का अर्थ यह नहीं कि हमें कर्म छोड़ देना चाहिए, बल्कि इसके विपरीत हे भारत! आपको अपने धर्मात्मक कर्त्तव्य में निडर होकर युद्ध (संघर्ष) करना है। यह समझ करके ही मनुष्य भय और शोक से मुक्त होकर अपना कार्य पूर्ण करता है।

विषय

आत्मा की अमरता (Eternity of the Soul)शरीर और आत्मा का भेद (Distinction between Body and Self)कर्तव्य और युद्ध कर्मअभय और निडरता (Fearlessness)कर्मयोग की तैयारीवेदांतिक ज्ञान

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  1. 2.47 — इसके बाद 'कर्म फल की इच्छा न रखें' का सिद्धांत समझना महत्वपूर्ण है जो इस आत्म-ज्ञान पर आधारित कर्तव्य पथ को परिपक्व करता है।
  2. 3.30 — यह श्लोक बताता है कि अपने सभी कर्मों का समर्पण कैसे करें, जो इस आत्म-ज्ञान के बाद प्राकृतिक अगला चरण है।
  3. 12.15 — इसके बाद भक्त को यह श्लोक पढ़ना चाहिए जो बताता है कि एक ऐसे व्यक्ति की क्या प्रतीक्षा होती है जो इस ज्ञान और समर्पण का मार्ग अपना लेता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह श्लोक कौन कह रहा है और अर्जुन को क्या समझा रहे हैं?
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण, जो एक देवता और मार्गदर्शक के रूप में कार्य कर रहे थे, युद्धभूमि पर बैचेनी से घबराए अर्जुन को समझा रहे हैं। वे बता रहे हैं कि ये शरीर समय के साथ नष्ट हो जाते हैं लेकिन जिस आत्मा (देही) इनमें रहती है वह कभी नहीं मरती और हमेशा सदाचारित होती है।
"अनाशिं" और "नित्य" शब्दों का इस संदर्भ में क्या अर्थ है?
'नित्य' (Nitya) का अर्थ है सदा से विद्यमान, जो न शुरू हुआ है और न ही कभी समाप्त होगा। 'अनाशिं' (Anashin) का तात्पर्य उस आत्मा की ओर है जो किसी भी प्रकार के नाश या क्षय को सहन नहीं कर सकती; यह हमेशा अटल और सुरक्षित रहती है, चाहे शरीर कुछ भी हो।
क्या इसका मतलब है कि युद्ध करना ही सही कर्म था?
इसका सीधा तात्पर्य केवल 'युद्ध' से नहीं, बल्कि अपने धार्मिक और नैतिक दायित्व (Dharma) को निभाने की आवश्यकता है। चूँकि आत्मा अमर है और शरीर का नाश एक सामान्य प्रक्रिया है, इसलिए डर या मोह के कारण कर्तव्य से हटना नहीं चाहिए; यही 'युध्यस्व' (लड़ो/संघर्ष करो) की वास्तविक शिक्षा है।
आज के जीवन में इस श्लोक का क्या प्रयोग किया जा सकता है?
आज के समय में यह श्लोक उन लोगों को जो भी कठिन निर्णय लेने या बड़े संघर्ष से जूझ रहे हैं, वह मानसिक शांति देता है। जब हम समझते हैं कि बाहरी परिस्थितियाँ (नौकरी, रिश्तों का टूटना, बीमारी) अस्थायी हैं और हमारा असली स्वभाव शक्तिशाली और सुरक्षित है, तो हम निडर होकर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर सकते हैं।
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