भगवद्गीता 18.77
Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः | विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ||१८-७७||
tacca saṃsmṛtya saṃsmṛtya rūpamatyadbhutaṃ hareḥ . vismayo me mahān rājanhṛṣyāmi ca punaḥ punaḥ ||18-77||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवद् गीता के अंतिम श्लोक में धृतराष्ट्र की सभापुत्र और सूतजी (सूत पुरोहित) कहते हैं कि वे बार-बार भगवान श्री कृष्ण द्वारा दिखाए गए विश्वरूप का स्मरण करके आश्चर्यचकित हो रहे हैं। यह श्लोक महाभारत के युद्ध की समाप्ति पर हुआ एक दिव्य दर्शन और उससे उत्पन्न हुए अद्भुत चमत्कार को दर्शाता है। मुख्य शिक्षा यह है कि जब हम ईश्वर की महिमा और उनके रूप का बार-बार स्मरण करते हैं, तो मन में गहरा आश्चर्य और हर्ष (खुशी) उत्पन्न होता है जो सभी भयों को दूर कर देता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक भक्ति योग (Bhakti Yoga) के अंतर्गत आता है जो प्रेमपूर्ण समर्पण और ईश्वर में पूर्ण निष्ठा पर केंद्रित है, जबकि ज्ञान योग का यह भी एक परिणाम है कि ब्रह्म स्वरूप को जानने से उत्पन्न विस्मय। इसमें 'विस्मय' (चमत्कार) और 'हर्ष' (आनंद) के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार की भावना व्यक्त की गई है, जो अंततः मोक्ष (Moksha) का मार्ग प्रशस्त करती है। यह दर्शाता है कि ज्ञान और भक्ति का मिलन व्यक्ति को कर्मों के बंधनों से मुक्त करता है और उसे दिव्य आनंद में ले जाता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत युद्ध के समापन पर सत्यजित सूत जी द्वारा धृतराष्ट्र को गीता का वर्णन सुनाने की कहानी में आता है, जो पुराणी और शास्त्रीय दस्तावेज़ों में 'सूत-उवाच' से शुरू होता है। इससे ठीक पहले कुरुक्षेत्र के मैदान पर भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपना विश्वरूप (विविध रूप) दिखाया था, जो देखने वाले सभी सैनिकों और धर्मराष्ट्र में गहरा आश्चर्य पैदा कर चुका था। सूत जी इस क्षण पर हैं जब वे उस दिव्य दृश्य को बार-बार याद कर रहे हैं और धृतराष्ट्र (जिन्हें 'राजन' कहा गया है) के सामने उस अनुभव की पुनः स्मरण कराते हुए अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहे हैं।
आज के जीवन में
कल्पना करें कि आप एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट या नौकरी में कठिन निर्णय लेने के तनाव (anxiety) का सामना कर रहे हैं और आपको लग रहा है कि सब कुछ खत्म हो गया है। ऐसे में यदि आप अपने जीवन के मूल्यों, ईश्वर की उपस्थिति, या किसी विश्वास योग्य स्रोत को बार-बार स्मरण करते हैं जो आपके लिए 'अति अद्भुत' (miraculous) साबित हुआ है, तो वह डर धीरे-धीरे आश्चर्य और हर्ष में बदल जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब भी जीवन में कोई गहरी चुनौती आए, तो उस घटना को बार-बार याद करना जो आपको ईश्वर का अनुभव दिलाई हो, आपकी मानसिक शांति और आत्मविश्वास वापस ला सकता है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
सूतजी बता रहे थे कि जब उन्होंने कृष्ण के उस अद्भुत रूप को देखा, जैसे एक बहुत बड़े विशाल मंदिर में हजारों दीपक जलते हों, तो उन्हें इतनी खुशी और हैरानी हुई। वे ऐसे महसूस कर रहे हैं जैसे किसी ने आपको आपके सपनों का सबसे अच्छा खिलौना दिखा दिया हो और आप बार-बार उसे देखकर मुस्कुराने लगे हों। जब हम ईश्वर के रूप को याद करते हैं, तो मन में डर नहीं बल्कि बहुत ही अजीब सी खुशी और चमत्कार की भावना आती है जो कभी खत्म नहीं होती।
दैनिक चिंतन
प्रिय पाठक, क्या आपने कभी अपने जीवन में किसी ऐसी घटना या दृश्य का सामना किया है जिससे आपके भीतर गहरा आश्चर्य और खुशी की लहर उठी हो? अर्जुन ने जब भगवान के विशाल रूप को देखा था, तो उनका विस्मय (vismaya) इतना अधिक था कि वे बार-बार उसे स्मरण कर रहे थे। आज हमें भी इसी तरह ईश्वर की अनंत शक्ति और कृपा पर चिंतन करना चाहिए ताकि हमारा हृदय फिर से 'हर्षित' (hrishyami) हो सके। यह विस्मय केवल एक भाव नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान का द्वार है जो आपको बारम्बार ईश्वर की ओर खींचता है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपनी श्वासों के बीच उस दिव्य रूप को याद करें जो अर्जुन ने देखा था। अपने मन में बार-बार 'अति अद्भुत' (atyadbhuta) शब्द को दोहराते हुए, ईश्वर की महिमा पर विस्मय और आनंद के भाव को जगाएं।
मुख्य शिक्षाएँ
- विस्मय: ज्ञान की शुरुआत
जब हम ईश्वर के रूप या कर्मों को गहराई से सोचते हैं, तो एक महान विस्मय (vismaya) उत्पन्न होता है जो अज्ञानता को मिटा देता है। यह आश्चर्य भक्ति और ज्ञान का संगम है जो हमें ईश्वरीय सत्ता के प्रति समर्पण की ओर ले जाता है। - पुनः स्मरण: निरंतर अभ्यास
'Punaḥ punaḥ' (बारम्बार) शब्द बताता है कि ईश्वरीय रूप को केवल एक बार देखना या सुनना पर्याप्त नहीं, बल्कि इसे लगातार मन में धारण करना आवश्यक है। यह निरंतर स्मरण हमारे हृदय से डर और मोह को दूर करके आत्मविश्वास उत्पन्न करता है। - आनंद: कर्मों का परिणाम
ईश्वर के अद्भुत रूप की स्मृति से जो हर्ष (हर्षित होना) उत्पन्न होता है, वह बाहरी सफलताओं पर निर्भर नहीं करता। यह आंतरिक शांति और सुख का मार्ग है जो हमें जीवन की सभी परिस्थितियों में धैर्य और खुशी बनाए रखने में सहायक होता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 10.8 — इस अध्याय में भगवान स्वयं अपने दिव्य रूपों और महिमा का वर्णन करते हैं, जो इस अद्भुत स्वरूप को समझने की नींव रखता है।
- 18.62 — अंतिम अध्याय में भगवान शरण लेने का उपदेश देते हैं, जो अर्जुन के विस्मय और आत्मसमर्पण को पूर्ण करता है।
- 12.4 — ईश्वर की नित्य स्मृति (constant remembrance) का महत्व समझने के लिए यह श्लोक अत्यंत उपयुक्त है जो भक्ति और ज्ञान को जोड़ता है।
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