भगवद्गीता 18.58
Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि | अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ||१८-५८||
maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāttariṣyasi . atha cettvamahaṃkārānna śroṣyasi vinaṅkṣyasi ||18-58||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यदि तुम मेरे चित्त में स्थिर होकर और मेरी कृपा पर भरोसा करके चलोगे, तो जीवन की सभी बाधाओं को आसानी से पार कर जाओगे। इसके विपरीत, यदि अहंकार के कारण मेरी इस वाणी का अनुसरण नहीं किया, तो तुम्हारा नाश निश्चित है। यह श्लोक भक्ति और समर्पण की महत्ता पर जोर देते हुए बताता है कि ईश्वर की सहायता से कोई भी कठिनाई अटूत नहीं हो सकती।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक भगवद गीता के 'भक्तियोग' (Bhakti Yoga) का एक केंद्रबिंदु है, जो ईश्वर-समर्पण को मोक्ष की कुंजी मानता है। यह सिद्धांत बताता है कि ज्ञान और कर्म तभी पूर्ण होते हैं जब वे 'अहंकार' के बिना किए जाते हों और फल का भोगी न बनकर ईश्वर में समर्पित हो जाएं। अतः, यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि मानव कर्मयोग या ज्ञानयोग को भी तभी सफल बना सकता है जब वह 'मत्प्रसाद' (ईश्वरीय अनुग्रह) पर निर्भर करता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक भगवद गीता के अंतिम अध्याय, 'मोक्ष संन्यास योग' का है, जो कुरुक्षेत्र के युद्ध میدان पर स्थित है। इससे पहले कृष्ण ने अर्जुन को विस्तार से आत्मज्ञान और भक्ति के मार्गों की व्याख्या कर दी थी ताकि वह अपने पापबोध और उदासी में छिड़कर न रहे। अब संवाद का समाप्ति बिंदु है, जहाँ कृष्ण अर्जुन को अपना निर्णय लेने से पहले एक अंतिम चेतावनी देते हैं कि युद्ध के लिए तैयार होना या नहीं, यह पूरी तरह आपकी अपनी बुद्धि और भक्ति पर निर्भर करता है।
आज के जीवन में
मान लीजिए आप किसी बड़े प्रोजेक्ट की अहम जिम्मेदारी संभाल रहे हैं जिसमें बहुत अधिक तनाव (stress) और अनिश्चितता है, जैसे कंपनी में कोई नया उत्पात लॉन्च करना। इस स्थिति में 'मच्चित्त' होकर काम करने का मतलब यह नहीं कि आप मेहनत बंद कर देंगे, बल्कि सफलता के लिए अपने अहंकार (मुझे ही सब कुछ पता है) को हटाकर ईश्वर पर भरोसा करें और पूरे मन से कार्य में लीन रहें। यदि आपके पास डर या घमंड का प्रभाव ज्यादा होगा, तो आप निर्णय लेने में असफल हो सकते हैं, लेकिन विश्वास के साथ चलने पर आपको हर चुनौती को पार करने की शक्ति मिलेगी और परिस्थितियां अपने आप सुलझ जाएंगी।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जैसे एक छोटा बच्चा अपनी माँ के हाथ को पकड़कर गहरी खाइयां या रास्ते की बाधाएं आसानी से पार कर लेता है, वैसे ही जब हम भगवान कृष्ण पर पूरा विश्वास करते हैं और उनका साथी बन जाते हैं, तो जीवन के सारे डर खत्म हो जाते हैं। लेकिन अगर बच्चा अपनी इच्छा में आकर माँ की बात नहीं मानता या उन्हें अंधेरे में छोड़ देता है, तो उसे दुर्घटना का खतरा रह सकता है। कृष्ण कह रहे हैं कि हमें अपने आप को महान समझने (अहंकार) के बजाय उनके सहारे पर चलना चाहिए ताकि हम हर मुश्किल से सुरक्षित निकल सकें।
दैनिक चिंतन
क्या आप कभी महसूस करते हैं कि जीवन की चुनौतियाँ आपको घेर रही हैं? याद रखें, जब हम अपना अहंकार छोड़कर ईश्वर में विश्वास कर लेते हैं, तो सबसे मुश्किल बाधाएं भी सहजता से पार हो जाती हैं। यह वचन आपसे कहता है कि आपके पास हृदय की शुद्धि और भगवान के साथ जुड़ाव का वह साधन है जिसकी आपको सदैव आवश्यकता थी। आज, अपने हर कष्ट को एक अवसर बनाएं जो आपको ईश्वर में अधिक निकट लाए।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन को भगवान कृष्ण के चरणों में समर्पित करके बैठें। यह सोचते हुए कि आपकी सभी बाधाएं उनकी कृपा से पार की जा सकती हैं, एक गहरी सांस लें और आत्मविश्वास का अनुभव करें। यदि मन अहंकार में फंसने की कोशिश करता है, तो उसे धीरे-धीरे वापस भक्ति के द्वारे पर लाएं।
मुख्य शिक्षाएँ
- मच्चित्त: भक्ति का मूल स्तंभ
यह शिक्षा बताती है कि 'मच्चित्त' या ईश्वर में मन लगाने से ही आध्यात्मिक प्रगति संभव होती है। जब व्यक्ति अपने अहंकार को त्यागकर पूर्ण रूप से भगवान की चेतना में स्थिर हो जाता है, तो वह स्वतः ही शुद्ध होता है। - मात्र कृपा: दुर्गाणि का नाश
समस्त 'दुर्ग' या बाधाएं केवल भगवान की कृपा से ही दूर हो सकती हैं, न कि केवल मानवीय प्रयासों से। यह विश्वास रखना आवश्यक है कि ईश्वर का आशीर्वाद किसी भी असाध्य समस्या को हल करने में सक्षम है। - अहंकार: विनाश की जड़
यदि व्यक्ति गुरु के उपदेश या ईश्वर का मार्गदर्शन 'अहंकार' (माया) के कारण न सुने, तो वह अनिवार्य रूप से पतन को स्वीकार करता है। अहंकार बुद्धि की बाधा बनकर हमें सत्य और मुक्ति से दूर ले जाता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 18.62 — यह श्लोक भगवान कृष्ण द्वारा आश्रित मनुष्य को 'सर्वदुर्गाणि' पार करने का अंतिम मार्ग (संधान) और उनके लिए स्थिति प्रदान करने की पुष्टि करता है।
- 18.73 — अर्जुन के द्वारा कृष्ण के उपदेश को स्वीकार करना, जो इस अध्याय में 'अहंकार' से मुक्ति और ज्ञान की प्राप्ति का परिणाम है।
- 9.26 — भगवान कृष्ण द्वारा भक्तों को आशा प्रदान करने वाले एक सरल श्लोक जो 'मच्चित्त' और समर्पण की महत्ता को दर्शाते हैं।
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