भगवद्गीता 18.51

Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 18.51 — "विशुद्ध बुद्धि से युक्त, धृति से आत्मसंयम कर, शब्दादि विषयों को त्याग कर और राग-द्वेष का परित्याग कर"
भगवद्गीता 18.51 — Moksha Sanyasa Yoga
संस्कृत

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च | शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ||१८-५१||

लिप्यंतरण

buddhyā viśuddhayā yukto dhṛtyātmānaṃ niyamya ca . śabdādīnviṣayāṃstyaktvā rāgadveṣau vyudasya ca ||18-51||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि मोक्ष या आत्म-निर्वाण की प्राप्ति के लिए बुद्धि का शुद्ध होना अनिवार्य है। इस श्लोक में कहा गया है कि मनुष्य को धैर्य और दृढ़ता से अपने मन पर नियंत्रण रखते हुए, शब्द और स्पर्श जैसे इंद्रियों के विषयों (सुख-दुःख) का त्याग करना चाहिए। साथ ही, राग (लगाव) और द्वेष (नफरत) नामक दो मुख्य बाधाओं को हटाकर मना स्थिर होना है। कृष्ण यह सिखा रहे हैं कि जब तक बुद्धि शुद्ध नहीं होती और मन इन आकर्षकों से मुक्त नहीं होता, तब तक सच्ची शांति प्राप्त करना असम्भव है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक वेदांत की 'ज्ञान योग' (Jnana Yoga) और 'संख्या दर्शन' की अवधारणाओं पर आधारित है, जहाँ बुद्धि का शुद्ध होना मोक्ष के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है। यह कर्मयोग में निष्काम भाव को विकसित करने वाले सिद्धांतों से जुड़ा हुआ है कि कार्य करते समय इन्द्रियों और मन को विषय-विषयकों (रुचि/अन्योन्य) से मुक्त रखना चाहिए। यहाँ 'धृत्यात्मं नियम्य' का उल्लेख ध्यान योग के लिए तैयारी की एक प्रमुख शर्त है, जहाँ मन को इंद्रियों और राग-द्वेष से अलग करके आत्मा में स्थिर किया जाता है।

शब्दार्थ
बुद्ध्या with an intellect, विशुद्धया pure, युक्तः endowed, धृत्या by firmness, आत्मानम् the self, नियम्य controlling, च and, शब्दादीन् sound and other, विषयान् senseobjects, त्यक्त्वा relinishing, रागद्वेषौ attraction and hatred, व्युदस्य abandoning, च and
पारंपरिक भाष्य
The lower self should be controlled with firmness by the Self of pure intellect. The turbulent senses and the mind should be subdued with the help of the pure intellect or reason. Pure reason is a great power. Whenever the senses raise their heads and hiss, they should be hammered by the powerful rod of pure intellect or reason. Reason is the faculty of determination. Pure intellect The intellect that is free from lust, anger, greed, pride, doubt, misconception, etc. It is like a clear mirror. A pure intellect is Brahman Itself. It can be easily merged in Brahman. When the pure intellect is merged in Brahman, the reflected intelligence? Chidabhasa or Jiva, is also absorbed in Brahman. The Jiva becomes identical with Brahman, just as the ether in the pot becomes one with the universal ether when the pot is broken. The self The aggregate of the body and the senses. The aspirant withdraws the senses from their respective objects again and again through the repeated practice of Pratyahara (abstraction) and Dama (selfrestraint). Gradually the senses are fixed in the Self. Their outgoing tendencies are totally curbed. The aspirant attains supreme control of the senses by constant meditation, by the practice of dispassion he coners Raga (attachment), and through the practice of pure love or cosmic love or divine Preme he coners hatred. He abandons all luxuries. He keeps only those objects which are necessary for the bare maintenance of the body. He has neither attachment nor hatred even for those objects which are necessary for that purpose.

यह कहाँ घटित होता है

इह महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद चल रहा था, जो 'मोक्ष संयस योग' अध्याय (अध्याय 18) की चरम सीमा है। इससे पहले कृष्ण ने अर्जुन को आत्म-ज्ञान, धर्म और त्याग के बारे में विस्तार से समझाया था ताकि वह अपने संकटग्रस्त मन का भार हटा सकें। युद्ध शुरू होने वाला है और अर्जुन अब निश्चित रूप से तैयार हैं कि वे कौशल्य को छोड़कर अपना धर्म पालन करें, लेकिन उन्हें आंतरिक शांति की गहराई अभी भी प्रक्रिया करनी है। यह श्लोक उस परिपक्व अवस्था का वर्णन करता है जहाँ युद्ध के लिए तैयार होने वाले योद्धा को मन और इंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की आवश्यकता होती है।

आज के जीवन में

कल्पना करें कि आप एक महत्वपूर्ण कार्यस्थल पर हैं, जहाँ कोई बड़ा वार्तालाप या निर्णय लेने का समय आया है, लेकिन आपको बहुत ज्यादा तनाव और चिंता हो रही है। इस श्लोक के अनुसार, आपको अपने मन को 'विशुद्ध बुद्धि' (स्पष्ट विवेक) की स्थिति में लाना होगा और धैर्य से अपनी प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। यदि आप उस कार्य या व्यक्ति के प्रति लगाव (राग) या नफरत (द्वेष) महसूस कर रहे हैं, तो उन भावनाओं को पहचानकर उन्हें अलग करना होगा ताकि निर्णय बिना किसी पूर्वाग्रह के लिया जा सके। यह दृष्टिकोण आपको इस स्थिति से बाहर निकाल देगा और आप एक शांत, स्पष्ट दिमाग के साथ कार्य कर सकेंगे जो दीर्घकालिक रूप से सबसे बेहतर परिणाम देता है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम्हारा दिमाग एक साफ़ शीशा (आइने) की तरह होना चाहिए जो धूल या मिट्टी से साफ़ हो, ताकि वह सच को ठीक दिखा सके। जब हम बहुत ज्यादा किसी चीज़ के पीछे भागते हैं या किसी से नफरत करते हैं, तो यह शीसा गंदा हो जाता है और हमें दुनिया का सही चित्र नहीं दिखता। इस कृष्ण भैया तुम्हारे मन को साफ़ करने की बात कह रहे हैं कि जब तक तुम अपने आप पर नियंत्रण रखोगे और नफरत या बहुत ज्यादा चाहने (लगाव) से दूर रहोगे, तब तक तुम सही निर्णय नहीं ले पाओगे। जैसे एक शांत पानी में ही आसमान का प्रतिबिंब दिखता है, वैसे ही साफ़ मन वाले इंसान को जीवन की सच्चाई दिखाई देती है।

दैनिक चिंतन

क्या आपने कभी महसूस किया है कि आपके शब्दों और विचारों की स्वतंत्रता अक्सर बाहरी दुनिया के प्रति आपके राग-द्वेष से कैसे प्रभावित होती है? इस पवित्र ज्ञान को समझना आपको यह याद दिलाता है कि एक विशुद्ध बुद्धि और मजबूत धृति ही आपकी आत्मा की सच्ची स्वतंत्रता का मार्ग है। जब हम शब्दादि विषयों के झंकार से मुक्त हो जाते हैं, तो राग-द्वेष के बंधन टूटते हैं और मन को गहरी शांति मिलती है। आइए, आज अपने भीतर एक नई दृढ़ता जगाएं जो आपको बाहरी शोर में भी अचल बनाए रखे।

आज के लिए एक अभ्यास

आज की साधना में अपनी बुद्धि को शुद्ध करने का प्रयास करें और मन के उतार-चढ़ावों पर धृति (अदम्य शक्ति) से नियंत्रण रखें। बाहरी संसार, विशेषकर शब्दों और स्पर्श जैसे विषयों की ओर आकर्षित होने वाले राग या द्वेष को मन में स्थान न दें, बल्कि उन्हें दूर करके आंतरिक शांति का अनुभव करें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. बुद्धि की पवित्रता (Buddhi Vishuddha)
    यह शिक्षा बताती है कि साधना का आधार केवल कर्म नहीं, बल्कि बुद्धि को अज्ञान और संदेह से मुक्त कर शुद्ध करना है। जब मन स्पष्ट होता है, तो ही आत्मसंयम और सच्चा ज्ञान ممکن बनता है।
  2. धृति का महत्व (Power of Dhrity)
    आत्म-नियंत्रण केवल इच्छाशक्ति से नहीं, बल्कि 'धृति' या अदम्य धैर्य और दृढ़ता की उपस्थिति में संभव है। यह धृति आपको विपरीत परिस्थितियों में भी आत्मा को स्थिर रखने की शक्ति देती है।
  3. राग-द्वेष का त्याग (Renunciation of Attachment)
    शब्दादि जैसे बाह्य विषयों से जुड़े हुए प्रेम (राग) और घृणा (द्वेष) को मन में ही दबाने या खत्म करने की आवश्यकता है। ये द्वंद्व आत्मा को बंधन में रखते हैं, इसलिए उनका परित्याग मुक्ति का मुख्य मार्ग है।

विषय

मन की शुद्धि (Purification of Mind)इंद्रिय संयम (Sense Control)राग-द्वेष का त्याग (Renunciation of Attachment and Aversion)बुद्धि योग (Yoga of Intellect)आत्म-नियंत्रण (Self-Discipline)मोक्ष मार्ग (Path to Liberation)

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — कर्म का फल न छोड़ने और धृति के महत्व पर यह श्लोक सीधे इस अध्याय की चर्चा को पूरा करता है।
  2. 3.6 — इंद्रियों से संघर्ष करते हुए भी विषयों का त्याग करने और ज्ञान में स्थिर रहने के महत्व पर यह श्लोक आगे की समझ देता है।
  3. 12.15 — जो राग-द्वेष से मुक्त होते हैं, वे ईश्वर को सबसे प्यारे लगते हैं; यह श्लोक इस विषय की दैवीक प्रकृति का वर्णन करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शब्दादि विषयों का त्याग करने से क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ केवल शरीरिक इंद्रियों (कान, त्वचा आदि) को बंद करना नहीं है, बल्कि यह कि हमें उन वस्तुओं या अनुभवों पर ध्यान न देना चाहिए जो केवल सुख-दुःख उत्पन्न करने वाले हैं। जब मन शब्द, स्पर्श, रस और गंध जैसे विषयों में डूबा रहता है, तो वह बाहरी दुनिया की ओर आकर्षित होता है; त्याग का अर्थ है इनकी ओर से ध्यान हटाकर भीतर स्थिर होना।
राग और द्वेष क्या हैं और वे क्यों छोड़ने योग्य हैं?
राग (लगाव) और द्वेष (नफरत) मन की दो मुख्य अवस्थाएं हैं जो व्यक्ति को बाहरी वस्तुओं या स्थितियों से बांध देती हैं। जब हम किसी चीज़ से बहुत ज्यादा जुड़ जाते हैं, तो उसकी हानि का डर रहता है; और नफरत करने पर क्रोध उत्पन्न होता है। दोनों ही मन की शांति को भंग करते हैं इसलिए वे त्यागने योग्य माने गए हैं ताकि आत्मा स्वयं में स्थिर हो सके।
क्या यह श्लोक केवल संन्यासी या धर्मियों के लिए है?
नहीं, यह श्लोक सभी मनुष्यों के लिए प्रासंगिक है क्योंकि मन की शुद्धि और इंद्रिय नियंत्रण जीवन का एक सामान्य सार्वभौमिक सिद्धांत है। चाहे कोई गृहस्थ हो या संन्यासी, जब तक बुद्धि शुद्ध नहीं होती और राग-द्वेष मुक्त नहीं होता, तब तक आंतरिक शांति प्राप्त करना कठिन रहता है। यह ज्ञान हर उस व्यक्ति के लिए उपयोगी है जो जीवन में स्थिरता और मोक्ष की चाह रखता है।
'धृत्यात्मन नियम्य' का क्या अर्थ है?
इसका शाब्दिक अर्थ है 'धीरता या दृढ़ता (धृति) से अपने आत्मा को संयत करना'। इसमें ताकत और साहस की आवश्यकता होती है कि व्यक्ति अपनी इच्छाओं, क्रोधों और भय के बावजूद मन को नियंत्रण में रखे। यह एक सक्रिय प्रक्रिया है जहाँ धैर्य से आत्मा को उसकी वास्तविक स्वभाव (आत्म-स्वरूप) की ओर ले जाया जाता है।
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