भगवद्गीता 18.43

Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 18.43 — "शौर्य, तेज, धृति, दाक्ष्य (दक्षता), युद्ध से पलायन न करना, दान और ईश्वर भाव (स्वामी भाव) - ये सब क्ष"
भगवद्गीता 18.43 — Moksha Sanyasa Yoga
संस्कृत

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् | दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ||१८-४३||

लिप्यंतरण

śauryaṃ tejo dhṛtirdākṣyaṃ yuddhe cāpyapalāyanam . dānamīśvarabhāvaśca kṣātraṃ karma svabhāvajam ||18-43||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को क्षत्रिय वर्ग के स्वाभाविक धर्मों की व्याख्या कर रहे हैं। इस श्लोक में बताया गया है कि बहादुरी, तेजस्विता, दृढ़ संकल्प, युद्ध में पीछे न हटना और दूसरों पर दान देना क्षत्रियों का मूल कर्तव्य है। ये सभी गुण उस व्यक्ति की प्रकृति से उत्पन्न होते हैं जिसे वह अपने स्वभाव के अनुसार सही कार्य कर रहा हो।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह उपदेश 'कर्मा योग' (Karma Yoga) के तहत आता है, जहाँ प्रकृति के गुणों का पालन करके कर्म करने की सिखाई गई है। यह संख्या दर्शन और स्वभाव-अनुष्ठान के सिद्धांत पर आधारित है कि हर व्यक्ति को अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति (Svabhava) के अनुसार कार्य करना चाहिए, न कि दूसरों के गुणों में उलझकर। इसका मुख्य विषय 'स्वधर्म' की पूर्णाकंक्षा और कर्तव्य-निष्ठा है जो आत्मज्ञान की ओर ले जाती है।

शब्दार्थ
शौर्यम् prowess, तेजः splendour, धृतः firmness, दाक्ष्यम् dexterity, युद्धे in battle, च and, अपि also, अपलायनम् not fleeing, दानम् generosity, ईश्वरभावः lordliness, च and, क्षात्रम् of Kshatriyas, कर्म action, स्वभावजम् born of nature
पारंपरिक भाष्य
It is the first duty of Kshatriya (man of the warrior class or of royal blood) to be brave and chivalrous. Bravery is that sublime virtue through which one is naturally strong, vigorous and courageous. In the face of the most terrible calamity the mind will not be in the least perturbed. The Kshatriya is firm under any unfavourable or trying conditions or circumstances. He does not get the least depression of spirit even when he is in adverse circumstances. It is the skill by which the reason finds out its path amidst all untoward circumstances and eventually attains its goal. This is firmness, fortitude or courage. Dakshya Promptness He is able to decide rightly on the spot in matters that deman prompt attention doing without confusion, of duties which present themselves all of a sudden and demand prompt action. As the sunflower always turns its face towards the sun so does he always face his enemies. He will ever avoid turning his back to them on the field of battle. He is absolutely fearless. Just as a tree gives away its flowers and fruits freely to whoever desires them, as the jasmine sends out its sweet fragrace in every direction, so will a Kshatriya generously give to another whatever may be asked of him. His charity is boundless. Lordliness A Kshatriya king enjoys sovereignty over his subjects owing to the sure protection he grants them, exercises ruling power over his subjects who are to be ruled, and raises the rod of chastisement to punish the unrighteous or the wicked.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है, जब वे विचारों की उलझनों और हद से गुजरने वाले सैनिकों के सामने खड़े थे। इससे ठीक पहले कृष्ण ने 'स्वभाव' (प्रकृति) के आधार पर वर्णाश्रम धर्म का विस्तार किया था ताकि अर्जुन को अपनी भूमिका समझाई जा सके। युद्ध की तैयारी और शोक से उबरते हुए, कृष्ण अब स्पष्ट कर रहे हैं कि क्षत्रिय के लिए संघर्ष में भागना नहीं बल्कि धर्म का पालन करना ही उसकी पहचान है।

आज के जीवन में

एक आधुनिक परिदृश्य में यह श्लोक एक टीम लीडर या पुलिस अधिकारी पर लागू होता है जो मुश्किल निर्णय लेने के दबाव में हो और घबराहट न महसूस करे। जब कोई कर्मचारी अपने काम की जवादेही को छोड़कर 'पलायन' (भागना) या शिकायत करने के बजाय समस्या का सामना करता है, तो वह क्षत्रिय गुणों जैसे 'धृति' और 'शौर्य' का प्रदर्शन कर रहा होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें हिंसक होना चाहिए, बल्कि कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखकर अपने कर्तव्यों को निभाना ही असली योद्धात्व है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जैसे एक गार्ड (रक्षक) अपनी ड्यूटी पर बहुत साहसी और तेजस्वी होता है, ठीक वैसे ही क्षत्रिय की प्रकृति में भी यही गुण होते हैं। अगर कोई बच्चा खेल के मैदान में घबराता नहीं है और दूसरे बच्चों को मदद करने (दान) या गिड़गिड़ाकर भागने की जगह अपनी बात पर डट कर खड़ा होता है, तो वह क्षत्रिय का स्वभाव दिखा रहा है। यह सीखती है कि हर किसी के पास कुछ खास गुण होते हैं जो उन्हें उसका काम बेहतरीन करने में मदद करते हैं।

दैनिक चिंतन

क्या आप आज किसी चुनौती का सामना करने में हिचकिचा रहे हैं? याद रखें कि शौर्य और धृति केवल युद्ध में नहीं, बल्कि जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी काम आते हैं। जब आप अपने स्वभाव के अनुसार सत्य और साहस से कार्य करते हैं, तो वह ईश्वर को प्रसन्न करता है। अपना 'ईश्वर भाव' बनाए रखें और देखिए कि कैसे आपके डर और संदेह का स्थान एक गहरा आत्मविश्वास ले लेता है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने भीतर के 'क्षत्रिय' गुणों को पहचानें—साहस, तेज और धृति। इन शक्तियों का उपयोग किसी संघर्ष में न हटने या दूसरों की मदद करने (दान) के लिए करें, न कि स्वार्थ के लिए। जब आप ईश्वरीय भाव से कार्य करते हैं, तो आपके कर्म स्वतः पवित्र हो जाते हैं और मन को शांति मिलती है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. स्वाभाविक कर्म की महत्ता (Karma according to Nature)
    यह श्लोक बताता है कि प्रत्येक वर्ण का अपना एक स्वाभाविक धर्म होता है, जिसे त्यागना या नजरअंदाज करना नहीं चाहिए। क्षत्रिय के लिए संघर्ष और रक्षा करना उसका स्वतःस्फूर्त कर्म है, जो उसे ईश्वर से जोड़ता है।
  2. युद्ध में पलायन का विरोध (Courage in Action)
    'अपालायनम्' या युद्ध से न भागना केवल शारीरिक साहस नहीं, बल्कि आत्म-साक्षी बनकर कर्तव्य को निभाने की मानसिक दृढ़ता है। ईश्वर प्रार्थना में हमें भयभीत होने या हार मानने का नहीं, बल्कि स्थिर रहने के लिए कहते हैं।
  3. ईश्वर भाव और दाक्ष्य (Divine Attitude and Skill)
    सच्चा कर्म 'दान' और ईश्वर को स्वामी मानकर किया जाने वाला कार्य है, जिसमें व्यक्तिगत लालच नहीं होता। दक्षता या कुशलता के साथ किए गए इस प्रकार का कार्य ही मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाता है।

विषय

क्षत्रिय धर्म (Kshatriya Dharma)स्वभाव और कर्तव्य (Nature and Duty)सामाजिक न्याय (Social Justice)आत्म-विश्वास (Self-Confidence)कर्मा योग (Action Yoga)दृढ़ संकल्प (Firmness)

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — इस श्लोक से पहले कर्म का सिद्धांत और फल की आशा छोड़ना सीखें, जो इस विषय की नींव है।
  2. 3.30 — कर्मों को ईश्वर को समर्पित करने का यह श्लोक क्षत्रिय धर्म में 'ईश्वर भाव' की गहराई और अधिक स्पष्टता से व्याख्या करता है।
  3. 12.15 — इसके बाद ईश्वर भक्तों के गुणों का वर्णन करें जो क्षत्रिय धर्म (दया, दान और स्थिरता) से मेल खाते हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्षत्रिय धर्म केवल युद्ध तक सीमित है या इसमें अन्य गुण भी शामिल हैं?
नहीं, क्षत्रिय धर्म केवल युद्ध तक नहीं बल्कि 'ईश्वर भाव' (नेतृत्व) और 'दान' जैसे सामाजिक कर्तव्यों को भी शामिल करता है। यह श्लोक बताता है कि दान देना और दूसरों की रक्षा करना, साथ ही स्वयं पर आत्म-विश्वास रखना क्षत्रिय के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
'अपलायन' शब्द का अर्थ क्या है और यह गीता में क्यों निषेधित है?
'अपलायन' का शाब्दिक अर्थ 'भाग जाना' या 'पीछे हटना' है। गीता में इसे इसलिए निषेध किया गया क्योंकि कर्तव्य के समय डर या भय से भागना आत्मा की उन्नति और धर्म की रक्षा में बाधा बनती है, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें इसका संघर्ष करना होता है।
क्या यह श्लोक आज के समय भी कामचोरों या डरपोक व्यक्तियों पर लागू होता है?
हाँ, यह श्लोक किसी विशेष वर्ग तक सीमित नहीं है बल्कि सभी मनुष्यों को अपने स्वभाव और कर्तव्य में निष्ठा रखने की शिक्षा देता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमिका (चाहे वह नौकरी हो या परिवार का सदस्य) से डरकर भाग रहा है, तो यह श्लोक उसे धैर्य और बहादुरी के साथ सामना करने के लिए प्रेरित करता है।
'स्वभावज' कर्मों को समझने का महत्व क्या है?
'स्वभावज' का अर्थ है कि कर्तव्य व्यक्ति की अपनी प्रकृति और स्वभाव से उत्पन्न होते हैं, न कि बाहर से थोपा गया होता है। जब कोई व्यक्ति अपने स्वाभाविक गुणों के अनुसार कार्य करता है, तो उसे काम में संतोष मिलता है और वह आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) की ओर बढ़ता है, जो गीता का मुख्य उद्देश्य है।
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