भगवद्गीता 18.35
Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च | न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ||१८-३५||
yayā svapnaṃ bhayaṃ śokaṃ viṣādaṃ madameva ca . na vimuñcati durmedhā dhṛtiḥ sā pārtha tāmasī ||18-35||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो व्यक्ति स्वप्न, भय, शोक, विषाद और गर्व जैसे पाखंडी भावों से मुक्त नहीं हो पाता, उसका धैर्य या 'धृति' तामसी (अंधकारमयी) कहलाती है। यह श्लोक उन लोगों का वर्णन करता है जिनकी बुद्धि कमजोर होती है और जो अज्ञान के कारण इन नकारात्मक भावनाओं को त्याग नहीं पाते। इसका मुख्य शिक्षा यह है कि सच्चा धैर्य तभी होता है जब हम अपने डर, दुख और घमंड से मुक्त होकर आगे बढ़ सकें।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक गीता के 'संख्या' (Sankhya) और 'भक्ति योग' (Bhakti Yoga) के अंतर्गत आने वाले गुणों (गुणात्मक विश्लेषण) की शिक्षा का हिस्सा है। यह तामसी प्रकृति के तीन गुणों में से एक, जो ज्ञान और बुद्धि को ढंके रखता है, उसे स्पष्ट करता है कि कैसे अज्ञान व्यक्ति नकारात्मक भावनाओं में फंस कर रह जाता है। इसका उद्देश्य यह समझाना है कि केवल कठोरता या जिद धैर्य नहीं है, बल्कि विवेक और ज्ञान से मुक्त होकर आगे बढ़ना ही सच्चा धृति है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र पर भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता का उपदेश देते समय कहा गया है, जो अध्याय 18 'मोक्ष संन्यास योग' में आता है। इससे ठीक पहले कृष्ण ने धैर्य (धृति) के तीन प्रकारों का वर्णन किया था और अब वे तीनों रूपों में से सबसे निचले स्तर, अर्थात तामसी धैर्य की व्याख्या कर रहे हैं। युद्ध के मैदान में भयभीत होकर भागने या स्वप्न-दुनिया में खोए रहने वाले अर्जुन को कृष्ण यह समझा रहे हैं कि नकारात्मक भावनाओं से मुक्त होने की शक्ति ही सच्चा धैर्य है।
आज के जीवन में
आज के समय में एक प्रबंधक मान लेता है कि उसका डर या घमंड उसे काम में बाधा नहीं बन रहा, और वह अपनी गलतियों को स्वीकार करने से इनकार कर देता है; यही 'दुर्बुद्धि' का लक्षण है। जब किसी व्यक्ति को नौकरी जाने की चिंता (भय) या पिछली असफलताओं पर दुख (शोक) इतना सताए कि वह आगे बढ़ने में अक्षम हो जाए, तो उसका धैर्य तामसी माना जाएगा। इस स्थिति में व्यक्ति को यह समझना होगा कि इन भावनों से मुक्त होने के लिए प्रार्थना या ज्ञान की आवश्यकता है, न कि उनसे जुड़कर रहने का।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
माँ-पापा कब कहते हैं तुम्हें सोने का समय हो गया? लेकिन अगर तुम बहुत ज्यादा डरे हुए या क्रोधित होते हो तो नींद नहीं आएगी, ना ही तुम खेल पाओगे। भगवान कृष्ण कहते हैं कि जैसे एक बच्चा जो अपने खिलौनों से बांटना नहीं चाहता और रोने में लगा रहता है वह सही तरीके से आराम नहीं कर सकता, वैसे ही जिस इंसान के मन में डर या घमंड होकर उसे शांति नहीं मिलती, उसका धैर्य ठीक काम नहीं करता। असली ताकत तभी होती है जब हम अपने दिमाग को चिंताओं से हटा कर खुश रहना सीखें।
दैनिक चिंतन
प्रिय मित्र, क्या आपने कभी notice किया है कि हमारे डर या उदासी के कारण जीवन में रुकावट आ जाती हैं? इस श्लोक कहता है कि जब तक हम इन भावनाओं को त्याग नहीं पाते, तब तक हमारी धारणा (धृति) अज्ञान की अवस्था में होती है। लेकिन यह एक नकारात्मक बात नहीं है; यह आपको याद दिलाता है कि आपकी वास्तविक शक्ति इन्हें छोड़ने और उज्ज्वल बुद्धि के साथ आगे बढ़ने में निहित है। आज, इन भारी भावनाओं को त्यागकर एक हल्का महसूस करने का प्रयास करें।
आज के लिए एक अभ्यास
आज की इस ध्यान में, अपने मन को उन तीन चीज़ों पर रोकें जिनसे आप अभी तक मुक्त नहीं हुए: डर, उदासी और अहंकार। कृपया इन भावनाओं के पीछे छिपी 'तमोगुणी' चेतना की पहचान करें और भगवान श्रीकृष्ण से उनका त्याग करने का साहस मांगें।
मुख्य शिक्षाएँ
- तमोगुणी धृति की पहचान
यह श्लोक उन व्यक्तियों को संदर्भित करता है जिनकी बुद्धि दुर्बल (durmedha) होने के कारण वे स्वप्न, भय और अहंकार जैसे ऋणों से मुक्त नहीं हो पाते। यह एक ऐसी स्थिरता है जो वास्तव में प्रगति को रोकती है क्योंकि यह कर्म या भावनाओं के गंदे पदार्थों पर आधारित होती है। - मन की बंधनों से मुक्ति
श्रीकृष्ण बताते हैं कि जब तक हम स्वप्न (आत्म-भ्रम), भय, शोक और विषाद को त्याग नहीं देते, तब तक आत्मा का उद्धार संभव नहीं है। यह धारणा मानती है कि ये दुखों के भावनाएँ जीवन का अटूट हिस्सा हैं, जबकि वास्तव में वे मोह की वजह से बंधन बनाते हैं। - अज्ञान और बुद्धि का विरोध
'दुर्बुद्धि' शब्द इस बात को इंगित करता है कि अज्ञान (तम) के कारण व्यक्ति अपनी वास्तविक प्रकृति से अनजान रहता है। जब तक हमारे पास सही ज्ञान नहीं आ जाता, तब तक ये भावनाएँ हमें नकारात्मक दिशा में धकेलती हैं और मोक्ष मार्ग को अवरुद्ध करती हैं।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 18.29 — यह श्लोक पहले धृति के तीन प्रकार (सात्विक, राजस, तामस) का वर्णन करता है जो इस संदर्भ को समझने की नींव रखता है।
- 2.63 — यह श्लोक बताता है कि क्रोध कैसे आलस्य और अज्ञान में बदल जाता है, जो भय और उदासी के मूल कारण हैं।
- 18.72 — अंतिम श्लोक यह सुनिश्चित करता है कि इन सभी भावनाओं को त्यागकर प्राप्त की गई मुक्ति (Moksha) का सारा फल समझा जा सके।
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