भगवद्गीता 18.28
Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः | विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ||१८-२८||
ayuktaḥ prākṛtaḥ stabdhaḥ śaṭho naiṣkṛtiko.alasaḥ . viṣādī dīrghasūtrī ca kartā tāmasa ucyate ||18-28||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो व्यक्ति स्वभाव से अस्थिर, घमंडी और धोखा देने वाला हो, वह 'तामस' (अंधकारपूर्ण) गुणों का है। ऐसे कर्म करने वाले लोग आलसी होते हैं, निराश रहते हैं और काम को टालने की प्रवृत्ति रखते हैं। इस श्लोक का मुख्य सिद्धांत यह है कि हमारे कर्म और विचार कैसे हमारी चेतना के स्तर (गुणों) पर आधारित होते हैं।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक गीता की 'कर्म योग' और 'त्रि-गुण' (सात्विक, रजसिक, तामसिक) सिद्धांत पर आधारित है जो व्यक्ति के कर्तव्य को निष्पादित करने की प्रेरणा का विश्लेषण करता है। यह दर्शाता है कि जब मन अज्ञान और विकृति (अविद्या) से ग्रस्त होता है, तो उससे निकलने वाले कार्य ही 'तामस' कहलाते हैं, जो मोक्ष के मार्ग में बाधा बनते हैं।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेशों की श्रंखला में से एक है। इस समय तक कृष्ण ने आत्मा, दैवी और असुरी स्वभाव का वर्णन किया है और अब वे 'तामस' (अंधकार) प्रकृतिकर्म के विस्तृत चित्र को समाप्त कर रहे हैं। अर्जुन युद्ध में भ्रमित थे कि क्या उन्हें अपने गुरुओं और रिश्तेदारों पर बल्ले चलाना चाहिए, इस संदर्भ में कृष्ण उनसे स्पष्टता चाहते हैं कि सच्चे धर्म के लिए किस प्रकार की मानसिक स्थिति आवश्यक है।
आज के जीवन में
क्या आपने महसूस किया है जब किसी प्रोजेक्ट को टालना (दीर्घसूत्री) या काम शुरू करते ही निराश हो जाना (विषादी), आपको और अधिक तनाव में डाल देता है? इस श्लोक का उपयोग उस व्यक्ति के लिए करें जो कार्यस्थल पर आलसी व्यवहार करता है, जिम्मेदारियों से भागता है और दूसरों को धोखा देने की कसर नहीं छोड़ता। एक ठोस उपाय यह है कि आप अपने काम में 'अयुक्त' (बिना योजना) न होकर सूक्ष्म नियोजन करें, आलस्य त्यागें और निराशा के बजाय धैर्य का पालन करें ताकि तामसिक प्रभाव से मुक्ति मिल सके।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो एक ऐसा दोस्त जो हर काम में अटल नहीं रहता, झूठ बोलता है और अगर उसे कोई काम दे दिया जाए तो वह सोचता रहेगा कि 'बाद में कर लेंगे'। ऐसे व्यक्ति हमेशा उदास रहते हैं क्योंकि वे अपने कर्मों को पूरा करने की ताकत खो देते हैं। भगवान कृष्ण कहते हैं कि अगर आप ऐसा व्यवहार करें, तो यह आपके मन के अंधेरे हिस्से से आता है, इसलिए हमें ऐसे होने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
दैनिक चिंतन
देखिए, आपका कर्ता पक्ष (कर्ता का स्वभाव) आपके जीवन के फल को कैसे आकार दे रहा है। यदि आप 'स्तब्ध' या 'आलसी' होकर काम कर रहे हैं, तो वह कार्य आपको मोह और निराशा में ही डुबोएगा। Krishna जी हमें बताते हैं कि जब तक मन नया नहीं होता, कर्म सफल नहीं होते; इसलिए आज से प्रयत्न करें कि आप अपनी सोच को 'प्राकृत' (मूढ़) स्थितियों से ऊपर उठाएं और सात्विक निष्ठा के साथ कार्य करें।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के लिए, अपने मन और व्यवहार पर ध्यान दें कि क्या आपका कर्म करने का तरीका 'तामसिक' है या नहीं। स्वयं से पूछें: क्या मैं इस काम में निष्ठा रख रहा हूँ या बस आलस्य और विषाद के कारण कर रहा हूँ? जब भी लगभ्र, अस्थिर या ढीठ महसूस हो, तो क्षण भर रुककर उस तामसिक धर्म से मुक्त होने की प्रार्थना करें।
मुख्य शिक्षाएँ
- तामसिक कर्ता का परिचय
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में उन लोगों को 'तमोगुणी' बताते हैं जो काम करने के लिए अनुचित, अहंकारी या बेवक्त होते हैं। ये वे लोग हैं जिनमें सात्विक प्रकाश की कमी है और जो अपने कार्य में गंभीरता नहीं रखते। - आलस्य और दीर्घसूत्रिता का पाप
'दीर्घसूत्री' होने का अर्थ है कि व्यक्ति काम को टाल देना या उसे बिना किसी ठोस योजना के लंबा खींचना। यह आध्यात्मिक गतिरोध पैदा करता है क्योंकि समय की कद्र नहीं होती और कार्य अधुरे रह जाते हैं। - विषाद से मुक्ति का मार्ग
'विषादी' (निराश) होने वाला व्यक्ति न तो खुशी से काम करता है और न ही उसमें संतुष्टि पाता है। इस श्लोक के माध्यम से हमें यह सिखाया जाता है कि निष्ठा, उत्साह और सकारात्मक भावना के बिना किया गया कर्म तामसिक होता है जो मोक्ष में बाधा डालता है।
विषय
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आगे पढ़ें
- 2.47 — इस श्लोक के बाद यह देखना आवश्यक है कि तमोगुणी कर्म से अलग, 'कर्तव्य' का सही स्वरूप क्या है और उसमें फल की आकांक्षा क्यों नहीं होनी चाहिए।
- 3.30 — यह श्लोक बताता है कि कैसे अपने कर्मों को ईश्वर के समर्पण से करना तमोगुणी अवस्था से बाहर निकलने और सात्विक कर्म का मार्ग बनाने की कुंजी है।
- 12.15 — तामसिक गुणों के विपरीत, यह श्लोक 'सात्त्विक' व्यक्ति (जो दूसरों को दुख नहीं देते) की विशेषताओं का वर्णन करता है जो मोक्ष प्राप्ति में सहायक होते हैं।
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