भगवद्गीता 18.17
Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते | हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ||१८-१७||
yasya nāhaṃkṛto bhāvo buddhiryasya na lipyate . hatvā.api sa imā.Nllokānna hanti na nibadhyate ||18-17||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि जब किसी व्यक्ति के मन से 'मैं यह हूँ' वाला अहंकार और अपनी बुद्धि का गुणों या परिणामों में लिप्त होना खत्म हो जाता है, तो वह सच्चा निष्कामी कर्मयोगी बन जाता है। ऐसा पुरुष यदि युद्ध जैसे भयानक कार्य भी करेगा, लेकिन उसे अपने अहंकार से नहीं मारता और न ही उसमें पाप या बंधन का अनुभव होता है। इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि कर्मों की प्रवृत्ति में 'मैं' भाव को त्यागना मुक्ति का एकमात्र मार्ग है, चाहे वह कार्य कितना भी कठिन क्यों न हो।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'ज्ञान योग' (Jnana Yoga) और 'कर्म योग' के संगम पर स्थित है, जहाँ यह स्पष्ट करता है कि निष्कर्मा कर्म करने की प्रक्रिया में अहंकार का अभाव ही सच्ची बुद्धि को विकसित करता है। इसमें अवधारणा तब होती है जब व्यक्ति 'अद्वैत' (Non-dualism) के स्तर पर कार्य करता है, जहाँ कर्ता और कर्म एक नहीं हैं बल्कि वे गुणों की क्रिया में निष्क्रिय रहते हैं। यह श्लोक पांचवें अध्याय के संख्य दर्शन को आगे बढ़ाकर बताता है कि अहंकार का अभाव ही मोक्ष (Moksha) की कुंजी है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध भूमि पर स्थित है जहाँ पांडवों और कौरवों के बीच निर्णायक संघर्ष चल रहा था। इस समय अर्जुन भीष्म पितामह आदि अपने ही रिश्तेदारों को मारने से इनकार कर रहे थे और वे उदासी में डूबे हुए थे, इसलिए भगवान कृष्ण ने उन्हें गीता का ज्ञान दिया। इस श्लोक के संदर्भ में अर्जुन अभी भी युद्ध की तैयारी करने वाले हैं लेकिन मन में घोर द्वंद्व और कर्मफल से डर रहे हैं।
आज के जीवन में
कल्पना करें कि आप एक प्रोजेक्ट मैनेजर हैं जिसे अपनी टीम के दो सदस्यों को निकालना पड़ रहा है, जो बहुत मुश्किल निर्णय है लेकिन कंपनी की जरूरतों के लिए अनिवार्य। यदि आपके मन में अहंकार हो या यह सोच कि 'मैं ही उन्हें हटा रहा हूँ और मेरा नाम खराब होगा', तो आप तनावग्रस्त रहेंगे और परिणाम से बंध जाएंगे। लेकिन अगर आप बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के, केवल दायित्व (dharma) को देखते हुए इस कठोर निर्णय पर कार्रवाई करते हैं, तो आप मानसिक रूप से मुक्त रहेंगे और न ही इसे अपने अहंकार या भविष्य की चिंता में बदल देंगे।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो जैसे तुम अपने कमरे से खेल के खिलौने साफ कर रहे हो। अगर तुम्हें लगता है कि 'यह मेरा काम है और मैं ही इसे कर रहा हूँ', तो थोड़ी थकावट या तनाव महसूस होता है, लेकिन यदि तुम बस कर्म करते रहो बिना इस सोच के कि 'काम किसका' या 'परिणाम क्या होगा', तो तुम्हें कोई झंझट नहीं होती। भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने अहंकार (अपने आप को सर्वश्रेष्ठ समझने) और परिणामों की चिंता से मुक्त हो जाता है, वह बड़े-से-बड़ा काम भी कर ले लेकिन उसे कोई बोझ या डर नहीं लगता।
दैनिक चिंतन
प्रेमयोगी मित्र, आज आपने जो भी कार्य किया होगा, क्या वह 'अहंकार' के कारण हुआ या स्वयं को एक नग्न सत्य के रूप में स्वीकार करके? जब हम कोई काम करते हैं और उसे अपने द्वारा ही किया गया मान लेते हैं, तो उसका फल चाहे सुख हो या दुःख, हमें बांध देता है। परंतु यदि आपकी बुद्धि इस बात से मुक्त हो जाए कि 'मैं' कर्ता हूँ, तो भले ही आपको हजारों कार्यों को करना पड़े, वह किसी भी पाप या बंधन में नहीं फंसतेगा। आज का दिन ऐसे प्रयास के लिए समर्पित करें जहाँ आप अपने अहंकार को त्याग करके निष्काम भाव से कार्य करने की शक्ति प्राप्त करेंगे।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन में 'मैं' और 'मेरा' की भावनाओं को देखें, जो आपको कर्मों का फल देने के लिए बांधती हैं। एक क्षण के लिए सोचिए कि यदि आप स्वयं कोई बड़ा कार्य भी कर लें, तो क्या वह आपके आत्मिक शांति को प्रभावित करता है? अपने बुद्धि को गुण-दोष से मुक्त रखकर कर्म करें और परिणामों में समता बनाए रखें।
मुख्य शिक्षाएँ
- अहंकार का परिहार (निःस्वाद)
यदि किसी पुरुष में 'मैं कर्ता हूँ' वाला अहंभाव नहीं है, तो वह अपने कार्यों के प्रति आसक्त होकर पापों या बंधनों से मुक्त रह जाता है। यह समझना आवश्यक है कि वास्तविक कर्ता ईश्वर हैं और हम केवल उनके साधन मात्र हैं। - बुद्धि का निर्लिप्त होना
एक स्थिर बुद्धि जो सत्व, रजस या तमोगुणों की प्रवृत्तियों से लिपटी नहीं होती, वह कर्म के फल में स्वयं को बांधने नहीं देती। ऐसी बुद्धि वाले व्यक्ति का हृदय हर परिस्थिति में शांत और स्थिर बना रहता है। - कर्माणुष्ठान में अमरत्व
जो पुरुष इन सिद्धांतों को अपना लेता है, वह भले ही शारीरिक रूप से हजारों कार्यों या युद्ध के मैदान में हत्यारा प्रतीत हो सकता है, वास्तविक आत्मिक स्तर पर न तो उसे पाप लगता है और न वह मृत्यु या बंधन का अनुभव करता है। यह गीता की सबसे ऊँची सिद्धि है कि कर्म से मुक्त होकर भी जीवन में सक्रिय रहना संभव है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — यह श्लोक 'कर्तव्य' और 'फल की इच्छा त्यागने' के सिद्धांत को स्थापित करता है जो इस अनुप्रयोग का आधार है।
- 5.13 — यह अर्जुन से कहता है कि जब कोई व्यक्ति सभी कार्यों में ईश्वर को देख लेता है, तो वह न कर्मों के लिए बंधित होता है और न ही पापग्रस्त होकर मृत्यु का डर रखता है।
- 12.5 — यह श्लोक उन मार्गदर्शियों को समझने में मदद करेगा जो 'अव्याज' और 'निर्लिप्त' मन के साथ चरणों पर चलते हैं, जो इस वचन की भावना का विस्तार है।
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