भगवद्गीता 17.25
Shraddhatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः | दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ||१७-२५||
tadityanabhisandhāya phalaṃ yajñatapaḥkriyāḥ . dānakriyāśca vividhāḥ kriyante mokṣakāṅkṣibhiḥ ||17-25||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया है, जहाँ वे बताते हैं कि 'तत्' (परम सत्य) के चिंतन में रहकर और फल की आस रखे बिना यज्ञ, तपस्या और दान जैसे कर्म किए जाने चाहिए। मुमुक्षु या मोक्ष चाहने वाले व्यक्ति इन विविध कर्मों को बिना किसी स्वार्थ के करते हैं ताकि वे बंधनों से मुक्त हो सकें। इसका मूल संदेश यह है कि सच्ची आस्था और निष्काम भाव में किए गए कार्य ही अंततः मोक्ष की ओर ले जाते हैं, न कि फल की इच्छा रखकर किए गए कर्म।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक कर्म योग (Karma Yoga) और ज्ञान योग (Jnana Yoga) का एक महत्वपूर्ण संगम है, जो 'निष्काम कर्म' के सिद्धांत को विकसित करता है। यह दर्शाता है कि जब व्यक्ति 'तत्' सत्य की चिंता में रहकर कार्य करे और परिणामों से मुक्त हो जाए (अनभिसन्धाय), तो वह कर्म ही मोक्ष का साधन बन जाता है, न कि बंधन।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेश देते समय बोला गया था, जब वे 'श्रद्दात्रय विभाग योग' (आस्था का तीनों प्रकार में वर्गीकरण) की चर्चा कर रहे थे। इससे ठीक पहले कृष्ण ने बताया कि कैसे लोगों के आस्था और स्वभाव के आधार पर उनके भोजन, तपस्या और दान अलग-अलग होते हैं। अर्जुन अभी भी युद्ध के भार से संघर्ष करते हुए विचार कर रहे थे कि उनका कर्म (युद्ध) सही है या नहीं, और इस श्लोक में कृष्ण उन्हें दिखाते हैं कि कैसे निस्वार्थ भाव से किया गया कार्य ही आत्मा को शुद्ध करता है।
आज के जीवन में
कल्पना करें कि आप किसी गंभीर प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं जो आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन आपका मानना है कि सफलता का परिणाम (जैसे बोनस या प्रमोशन) आपको नहीं चाहिए। अगर आप सिर्फ इस नज़रिए से काम करें कि 'यह मेरी कर्तव्य और दक्षता की परीक्षा है', तो तनाव कम होगा और कार्य गुणात्मक रूप से बेहतर होगा, ठीक वैसा ही जैसे मुमुक्षु व्यक्ति मोक्ष के लिए बिना फल की चिंता किए यज्ञ या दान करते हैं।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जैसे हम घर के बड़े लोग बिना किसी उपहार या तारीफ़ का इंतज़ार किए, दूसरों की मदद करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह सही काम है, वैसे ही 'तत्' (सत्य) को जानने वाले लोग कर्म करते हैं। वे यज्ञ, पढ़ाई (तप), या दान नहीं इसलिए करते ताकि कोई उनसे क्या देगा, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह सही और अच्छा काम है। जब हम बिना फल की चिंता किए किसी की मदद करते हैं, तो हमारा मन शांत होता है और हमें अंदर से एक खुशी मिलती है जो कभी नहीं जाती।
दैनिक चिंतन
आज आपके द्वारा किया गया वह छोटा या बड़ा कार्य क्या था जो आपने किसी विशेष परिणाम की उम्मीद के बिना, पूर्ण समर्पण भाव से पूरा करने का प्रयास किया? जब हम 'तत्' शब्द को स्मरण करके कर्म करते हैं, तो वह न केवल एक साधन बन जाता है बल्कि मुमुक्षु (मोक्ष की इच्छा रखने वाले) के लिए पवित्रता और आत्म-शोध का मार्ग भी। क्या आप महसूस करते हैं कि जब फल की चिंता हट जाती है, तो कर्म करने में जो गहराई और शांति आती है? आज से प्रत्येक कार्य को 'तत्' के साथ शुरू करके देखें और उस मुक्ति-दायक अनुभव का स्वागत करें।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के लिए 'तत्' शब्द का जप करें और प्रत्येक कर्म को फल की चिंता किए बिना, अर्थात किसी परिणाम की आशा छोड़कर, ईश्वर समर्पित भाव से संपन्न करने का संकल्प लें। जब भी कोई काम शुरू हो, मन में केवल 'यह कर्म पूर्ण करना है' और 'फल भगवान को अर्पित है', इस एक सूत्र पर ध्यान केंद्रित करें।
मुख्य शिक्षाएँ
- फल की इच्छा का त्याग (Nishkama Karma)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण बताते हैं कि साधक यज्ञ, तप और दान जैसे बड़े कर्म भी केवल 'तत्' स्मरण से करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि मुमुक्षुजन (जो मोक्ष चाहता है) कोई फल की आशा या प्रलोभन नहीं रखते हुए कार्य करता है। - 'तत्' का महत्वपूर्ण उच्चारण और स्मरण
'तत्' शब्द का जप करना कर्मों को पवित्रता प्रदान करने वाला एक अद्भुत साधन है जो ईश्वर की अनुगृहीत ऊर्जा से जुड़ाव बनाए रखता है। जब हम 'तत्' कहते हैं, तो यह मान्यता होती है कि कर्म स्वयं भगवान में ही समाहित हो जाता है और फल भी उनकी ओर से आने वाला होता है। - कर्मों की विविधता और एकरूप उद्देश्य
भले ही कर्म यज्ञ, तप या दान रूप में अलग-अलग दिखते हों (विविधाः), लेकिन मुमुक्षुजन के लिए उनका एकमात्र लक्ष्य आत्मिक मोक्ष है। यह समझना आवश्यक है कि बाहरी रूपांतरण से कर्म का मूल स्वरूप नहीं बदलता, बल्कि अंतर्निहित संकल्प ही उसे पवित्र बनाता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — यह श्लोक 'कर्म करने का अधिकार है' के सिद्धांत को स्पष्ट करता है जो इस अध्याय में फल की इच्छा त्यागने से सीधे जुड़ा हुआ है।
- 3.26 — इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि ज्ञान और योग के मार्ग पर चलकर कैसे पुरुषों को बंधन से मुक्त किया जा सकता है।
- 18.6 — यह श्लोक 'तत्' का पुष्टि करता है और बताता है कि यज्ञ, तप और दान के कर्म बिना फल की इच्छा किए कैसे करने चाहिए।
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