भगवद्गीता 13.33

Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 13.33 — "जिस प्रकार सर्वगत आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र देह में स्थित आत्मा "
भगवद्गीता 13.33 — Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga
संस्कृत

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते | सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ||१३-३३||

लिप्यंतरण

yathā sarvagataṃ saukṣmyādākāśaṃ nopalipyate . sarvatrāvasthito dehe tathātmā nopalipyate ||13-33||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि आत्मा का स्वभाव देह में स्थित होने के बावजूद किसी भी प्रकार से लिप्त या दूषित नहीं होता। जैसे सूर्य की रोशनी और वायु पूरी तरह फैली हुई होती हैं लेकिन धूल-मिट्टी से प्रभावित नहीं होतीं, वैसे ही आत्मा देह में रहते हुए भी कर्मों के परिणामों से मुक्त रहती है। इस श्लोक का मुख्य सिद्धांत यह है कि हमारी वास्तविक पहचान (आत्म) बाहर की घटनाओं या बुरे अनुभवों से नहीं लिपटी जाती, चाहे वे क्या भी हों।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक ज्ञान योग (Jnana Yoga) और सांख्य दर्शन के तत्वों पर आधारित है, जो 'ब्रह्म-अभिन्नता' और 'द्वैत-रहित स्वरूप' को स्पष्ट करता है। यह आत्मा की अविनाशी स्वभाव (सूक्ष्म) और देहाधारा से उसके पृथक होने के सिद्धांत का विस्तार करता है, जो भक्ति योग में भी एक महत्वपूर्ण आधारभूमि बनता है।

शब्दार्थ
यथा as, सर्वगतम् the allpervading, सौक्ष्म्यात् because of its subtlety, आकाशम् ether, न not, उपलिप्यते is tainted, सर्वत्र everywhere, अवस्थितः seated, देहे in the body, तथा so, आत्मा the Self, न not, उपलिप्यते is tainted
पारंपरिक भाष्य
Ether pervades everything. All are immersed in it. There is no point whereunto ether does not penetrate and pervade and yet it is not tainted by anything. Even so the Self pervades the whole body and the whole world. Being subtler than the body the Self is never tainted by it or anything else. It is unattached and actionless. It has no parts or limbs. So virtuous and vicious actions cannot contaminate the Self. It is ever pure and stainless.

यह कहाँ घटित होता है

यह उपदेश महाभारत युद्ध के मैदान कुर्क्षेत्र में होता है, जहाँ अर्जुन ने अपने ही रक्तसंबंधियों को मारने की विचारधारा से घबराकर हथियार फेंक दिए थे। कृष्ण ने पहले 'क्शेत्र-क्शेतज्ञ' योग (2.13-24) के माध्यम से आत्मा और शरीर में अंतर स्पष्ट किया था, जिस पर आधारित करके उन्होंने इस उपसर्ग की व्याख्या की है। अर्जुन मन को घबराहट और कर्मों का बोझ महसूस कर रहा था, इसलिए कृष्ण ने उसका साक्षात्कार आत्म-स्वरूप से जोड़कर उसे स्थिर करने के लिए यह उदाहरण दिया कि आत्मा किसी भी परिस्थिति में अछूती रहती है।

आज के जीवन में

कल्पना कीजिए आप एक महत्वपूर्ण कार्य या प्रोजेक्ट में विफल हो गए हैं और आपको लगा है कि अब आपकी प्रतिष्ठा हमेशा के लिए खत्म होगी और आप 'दुष्ट' बन जाएंगे। इस श्लोक का उपयोग करते हुए, यह समझें कि आत्मा (आपका सच्चा स्वभाव) उस विफलता से लिप्त नहीं होती; वह बस एक अनुभव पार कर रही है जैसे वायु धूल को छूती नहीं है। आप अपनी नकारात्मक भावनाओं या परिणामों में अटके रहने के बजाय, 'मैं वही हूं जो इस काम की सफलता-विफलता से स्वतंत्र' होने का अनुभव करें और आगे बढ़ें।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम एक बहुत साफ़ खिड़की के पीछे हो और उस पर धूल जमा हुई है। वह धूल तुम्हें छू नहीं सकती या तुम्हारे अंदर घुस नहीं सकती, बल्कि सिर्फ कांच (देह) पर होती है। ठीक वैसे ही, हमारी आत्मा एक बहुत कोमल और साफ़ रोशनी की तरह है जो शरीर के भीतर रहती है लेकिन दुनिया की नकारात्मकता या गंदगी से कभी नहीं लिपटती।

दैनिक चिंतन

क्या आप कभी सोचते हैं कि आपके शरीर में आ रही थकान या दुःख वास्तविक है, जबकि वह केवल एक अनुभव मात्र है? जैसे बिना किसी गंदगी को सोंधे हुए भी हवा सभी जगह फैली रहती है, वैसे ही आपकी अंतर्माता (आत्मा) शरीर में भले स्थित हो लेकिन उससे कभी प्रभावित नहीं होती। आज के दिन जब कोई समस्या आए या दुःख महसूस हो तो खुद को यह सुविचार दें कि 'मैं' वह आकाश की तरह हूँ जो हर घटना से शुद्ध बना रहता है।

आज के लिए एक अभ्यास

अपनी आत्मा को उस स्थूल और सूक्ष्म संसार से अलग समझें, ठीक जैसे न्यास का विशालता में बिखरा होना। अपने भीतर की चेतना को देखें जो शरीर के सुख-दुःख या बदलावों पर लिप्त नहीं होती और उसे वैसे ही शांत रहने दें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. आत्मा का सर्वगामी स्वभाव
    यह श्लोक बताता है कि आत्मा (Brahman) सभी जगह मौजूद होने के बावजूद कोई वस्तु नहीं बनती और न ही किसी चीज़ से चिपकती है। यह सूक्ष्म स्वरूप की प्रकृति का सबसे बड़ा उदाहरण है जो द्रव्यमान या सीमाओं में कैद नहीं हो सकती।
  2. अलिप्तता (Non-attachment) की शिक्षा
    जैसे आकाश धूल से संपर्क करते हुए भी स्वयं गंदगी का हिस्सा नहीं बनता, वैसे ही ज्ञानी पुरुष संसार के सुख और दुःख में लिप्त होकर अपने मूल स्वरूप को नहीं खोते। यह हमें सिखाता है कि शारीरिक अनुभवों से अलग रहना (Kshetra Kshetrajna Vibhaga) ही सच्ची मुक्ति का मार्ग है।
  3. शरीर और आत्मा में भेदभाव
    देह (शरीर) कर्म, गुणों और समय के प्रवाह से लिप्त होती रहती है, लेकिन उसमें स्थित आत्मा (Kshetrajna) शुद्ध और अप्रभूत बनी रहती है। यह अंतर समझना ही 'कौटिल्य' या भेद-ज्ञान की नींव है जो हमें मोक्ष की ओर ले जाता है।

विषय

आत्मा की प्रकृतिविवेक और भ्रमअलिप्ता भाव (निष्काम)देह-आत्म विवेचनसूक्ष्म तत्वज्ञानमानसिक शांति

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  1. 2.47 — यह श्लोक कर्म की प्रकृति को समझने का आधार देता है, जो 'लिप्त नहीं होना' के सिद्धांत से सीधा जुड़ा हुआ है।
  2. 3.30 — यहाँ भगवान कृष्ण आत्मा को समर्पित करके कर्म करने की विधि बताते हैं, जो अलिप्तता का व्यावहारिक अभ्यास है।
  3. 12.15 — यह श्लोक उन गुणों को वर्णित करता है जो एक योगी में होते हैं और आत्मा के उस निष्काम, अलिप्त स्वरूप का प्रतिबिंब हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्यों कृष्ण ने आकाश का उदाहरण दिया है?
कृष्ण ने यह कारण बताया कि जैसे सार्वभौमिक और सूक्ष्म होने के बावजूद आकाश धूल या किसी भी वस्तु से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा की प्रकृति भी अविनाशी और शुद्ध है। यह उदाहरण अर्जुन को समझने में मदद करता है कि कैसे एक सूक्ष्म तत्व बड़े-बड़े परिवेशों (देह) के बावजूद अपने स्वभाव से नहीं बदलता या लिप्त होता है।
इस श्लोक का व्यावहारिक जीवन में क्या उपयोग है?
यह हमें यह समझने में मदद करता है कि सफलता या विफलता, प्रशंसा या निंदा जैसे बाहरी कारक हमारे वास्तविक स्वभाव को नहीं बदल सकते। जब भी कोई बड़ा तनाव हो या नकारात्मक परिणाम आए, तो यह ज्ञान आपको उस घटना से अलग होने और अपनी आंतरिक शांति को बनाए रखने में सक्षम बनाता है।
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