भगवद्गीता 12.7

Bhakti Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 12.7 — "हे पार्थ ! जिनका चित्त मुझमें ही स्थिर हुआ है ऐसे भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार सागर से उद्"
भगवद्गीता 12.7 — Bhakti Yoga
संस्कृत

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् | भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ||१२-७||

लिप्यंतरण

teṣāmahaṃ samuddhartā mṛtyusaṃsārasāgarāt . bhavāmi nacirātpārtha mayyāveśitacetasām ||12-7||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को आश्वासन दे रहे हैं कि जो लोग उनके प्रति पूर्ण समर्पित होकर उनमें ही अपना मन स्थिर कर लेते हैं, वे दुनिया के संसार-सागर से जल्दी बच जाते हैं। यह श्लोक भक्ति योग की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा है कि ईश्वर पर अटूठ विश्वास रखने वालों का कल्याण स्वयं ईश्वर द्वारा किया जाता है। 'मृत्युसंसारसागर' से आशय जीवन-मरण के चक्र (जन्म और मृत्यु) को समझा गया है, जिससे मुक्ति पाने की दृढ़ प्रतिज्ञा कही गई है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक भगवद्गीता के 'भक्ति योग' का सार प्रस्तुत करता है, जहाँ कर्म औरज्ञान को एक उच्चतर स्तर पर 'समर्पण' (Surrender) द्वारा पार किया जाता है। इसमें यह सिद्धांत विकसित होता है कि जब भक्त का चेतना पूर्ण रूप से ईश्वर में लीन हो जाती है, तो व्यक्तिगत कर्मफल और जन्म-मृत्यु के चक्र (Samsara) की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। यह 'ईश्वरीय उपस्थिति' (Divine Grace) का सिद्धांत दर्शाता है जो अहंकार त्यागने वाले भक्तों को तुरंत उद्धार देती है।

शब्दार्थ
तेषाम् for them, अहम् I, समुद्धर्ता the saviour, मृत्युसंसारसागरात् out of the ocean of the mortal Samsara, भवामि (I) become, नचिरात् ere long, पार्थ O Arjuna, मयि in Me, आवेशितचेतसाम् of those whose minds are set
पारंपरिक भाष्य
Mortal Samsara The round of birth and death. The devotee who does total, unconditional, and ungrudging selfsurrender to the Lord, who places himself completely at the mercy of the Lord, and who fixes of actions by offering them to the Lord and who thus destroys any power in the actions to bear fruit, and who has abandoned even the idea of liberation, is soon lifted by the Lord from the mortal plane to the abode of Immortality. I redeem such persons who have become Macchitta i.e., mind united with Me, from the ocean of the mortal world or worldly life, without delay. (Cf. X.10.11XII.6and7)

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र में हुआ है, जहाँ अर्जुन ने अपने गुरु, भाइयों और रिश्तेदारों का वध करने से इनकार कर दिया था और वे विषाद (उदासी) में डूबे हुए थे। भगवान कृष्ण ने पहले कर्म योग और सांख्य दर्शन की शिक्षाएं दी थीं, लेकिन अर्जुन अभी भी निराश थे और ईश्वर के प्रति समर्पण का मार्ग अपनाकर शांत होना चाहते थे। इस संदर्भ में, जब अर्जुन ने भक्ति योग (प्रश्न 12) की ओर रुख किया था, तब कृष्ण ने 'मयि आवेशितचेतसाम्' श्लोक के माध्यम से उन्हें यह आशा दी कि वे जल्दी ही संसार के बंधनों से मुक्त हो जाएंगे।

आज के जीवन में

आज की भागदौड़ वाली दुनिया में जब आप करियर, पारिवारिक जिम्मेदारियों या भविष्य को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित (anxiety) होते हैं और लगातार घबराहट महसूस करते हैं। इस स्थिति में श्लोक की शिक्षा यह है कि अपने मन को केवल उद्देश्यों, डरों या परिणामों पर केंद्रित करने के बजाय एक ईश्वरीय चेतना (God consciousness) में समर्पित कर दें। जैसे ही आप अपनी चिंताओं का भार भगवान पर सौंपकर उनमें मन को स्थिर करते हैं, अंदर से एक गहरा शांत और समाधान की शक्ति आती है जो आपको तुरंत समस्या के घेरे (समुद्र) से बाहर निकाल देती है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम एक बहुत बड़े और डरावने महासागर में फंस गए हो जहाँ तूफ़ान चल रहा है, लेकिन तुम्हारे पास तुम्हारा सबसे प्यार करने वाला माता-पिता (जैसे भगवान कृष्ण) हैं। अगर तुम उन्हें पूरी तरह से अपने दिमाज़ और दिल में बसने दो, तो वे तुरंत आकर तुम्हें उस डरावने सागर से सुरक्षित बाहर निकाल लेंगे। इसका मतलब है कि जब हम भगवान पर पूरा विश्वास करते हैं, तो वे दुनिया की हर मुश्किल और डर को जल्दी दूर कर देते हैं।

दैनिक चिंतन

प्रिय मित्र, क्या आपको लगता है कि संसार के तूफानों में अकेलापन महसूस हो रहा है? कृष्ण का यह वादा याद रखें कि जिनका चित्त उन्हें समर्पित करता है, वे स्वयं उनका रक्षक और निर्माता बन जाते हैं। आपकी श्रद्धा ही वह नाव है जो आपको इस जीवन के भयावह सागर से पार करवाती है। आज का दिन इसे पहचानने में बिताएं कि आप अकेले नहीं हैं, बल्कि ईश्वर आपके कर्मों और चित्त को देख रहा है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने चित्त को भगवान श्रीकृष्ण में स्थिर करें। जब भी मन दुविधा या डर के सागर की ओर जाए, तुरंत उनके नाम और स्वरूप का ध्यान करके उसे वापस लाने का अभ्यास करें। यह कल्पना करें कि वे स्वयं आपका हाथ पकड़कर इस मृत्यु-सागर से उतार रहे हैं।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. चित्त की स्थिरता ही श्रद्धा का मूल
    यह आयात बताता है कि भगवान के प्रति समर्पण तभी पूर्ण होता है जब चित् (मन) उनकी ओर पूरी तरह से अभिव्यक्त हो जाए। बिना स्थिरचित्त के, बाहरी अनुष्ठान या कर्म अक्सर अपूर्ण रह जाते हैं और मृत्यु-सागर का डर बना रहता है।
  2. ईश्वर स्वयं उद्धारकर्ता बनते हैं
    भगवान केवल मार्गदर्शन करने वाले नहीं, बल्कि जिनके चित्त में वे निवास करते हैं, उनके लिए 'मृत्युसंसारसागर' से मुक्ति का सीधा कारण बन जाते हैं। यह दैवीय कृपा है कि भक्त की आवश्यकता पर स्वयं ही प्रकट होकर उसे उबार लेते हैं।
  3. शीघ्र पारित होने का आश्वासन
    'अचिरात्' (शिघ्र) शब्द संकेत देता है कि ईश्वर भक्त की उद्धार के लिए समय नहीं बर्बाद करते। जब चित्त पूरी तरह समर्पण में डूब जाता है, तो मोक्ष या शांति का मार्ग तुरंत प्रकट हो जाता है।

विषय

भक्ति योग (Bhakti Yoga)ईश्वर का समर्थन (Divine Support)मोक्ष और मुक्ति (Liberation from Samsara)चित्त स्थिरता (Steadiness of Mind)संसार सागर से उद्धार (Salvation from the Ocean of Life)भक्त की सुरक्षा (Protection of the Devotee)

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  1. 2.47 — इस आयात में कर्मयोग और फल की चिंता न करने का सिद्धांत दिया गया है जो भगवान के प्रति समर्पण का आधार बनाता है।
  2. 3.30 — सभी कर्मों को ईश्वर में अर्पित कर देने की विधि बताती है, जो चित्त को स्थिर करने और उद्धार पाने के लिए आवश्यक पहला कदम है।
  3. 12.15 — यह आयात उन भक्तों का वर्णन करता है जो ईश्वर को प्रिय हैं और वही गुण चित्त को स्थिर करने में मदद करते हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्लोक में 'मृत्युसंसारसागर' से क्या तात्पर्य है?
'मृत्युसंसारसागर' का अर्थ जीवन-मरण के अनंत चक्र (Samsara) को समझा गया है, जो दुख और जन्म-मृत्यु की प्रक्रियाओं से घिरा एक विस्तृत सागर जैसा है। यह श्लोक कहता है कि भगवान कृष्ण उन लोगों का उद्धार करते हैं जिन्होंने अपने मन को पूरी तरह उनकी शरण में समर्पित कर दिया है, उन्हें इस चक्र से मुक्त कराते हैं।
'नचिरात्' (शीघ्र) शब्द का क्या महत्व है?
'नचिरात्' का अर्थ 'जल्दी' या 'अतिशय शीघ्र' होता है, जो भगवान कृष्ण की वाणी में उनकी त्वरित प्रतिक्रिया को दर्शाता है। यह बताता है कि ईश्वरीय दया और उद्धार के लिए इंतजार करने की कोई आवश्यकता नहीं है; जैसे ही मन स्थिर हो जाता है, संकट से मुक्ति तुरंत मिलती है।
क्या यह श्लोक सभी धर्मों या लोगों पर लागू होता है?
यह श्लोक मुख्य रूप से उन 'भक्तों' के लिए है जो ईश्वर में पूर्ण समर्पण (मयि आवेशितचेतसाम्) करते हैं, चाहे वे किसी भी धर्म की अनुसरण करें। भगवान कृष्ण का यह वादा विशाल और निस्वार्थ प्रेम पर आधारित है जो हर उस व्यक्ति के लिए उपलब्ध है जो ईश्वर को अपना सर्वोच्च लक्ष्य मानता है।
'मयि आवेशितचेतसाम्' का अर्थ और महत्व क्या है?
'मयि आवेशितचेतसाम्' का शाब्दिक अर्थ है 'जिनका चेतना (मानस) मुझमें पूरी तरह से समाहित या केंद्रित हो गया है। इसका तात्पर्य केवल पूजा करना नहीं, बल्कि अपने सभी विचारों और इच्छाओं को भगवान में समर्पित कर देना है। जब मन का ध्यान किसी बाहरी वस्तु पर नहीं रहकर ईश्वर पर ही स्थिर हो जाता है, तो वह उद्धार के योग्य बन जाता है।
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