भगवद्गीता 11.42
Vishvarupa Darshana Yoga · हिन्दी अनुवाद
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु | एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ||११-४२||
yaccāvahāsārthamasatkṛto.asi vihāraśayyāsanabhojaneṣu . eko.athavāpyacyuta tatsamakṣaṃ tatkṣāmaye tvāmahamaprameyam ||11-42||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण से क्षमा याचना कर रहे हैं कि उन्होंने युद्ध के मैदान में उन्हें हँसी और मज़ाक के लिए बिहार, सोने, बैठने और खाने जैसे सामान्य कार्यों पर अपमानित किया था। वे 'अच्युत' (जो कभी विफल नहीं होते) को संबोधित करते हुए कहते हैं कि चाहे अर्जुन एकल थे या दूसरों की उपस्थिति में, उन्होंने भगवान के साथ अनुरूप व्यवहार नहीं किया। यह श्लोक ईश्वरीय सत्ता के सामने मानवीय गतिशीलता और अपमान का स्वीकार करके पूर्ण समर्पण (नम्रता) को दर्शाता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक भक्ति योग (Bhakti Yoga) और ज्ञान योग के समागम को दर्शाता है, विशेष रूप से ईश्वर की अप्रमेय प्रकृति पर पूर्ण आत्मसमर्पण। यह 'अच्युत' स्वरूप की असीमित शक्ति के सामने मानवीय सीमाओं और हठधरमी का नष्ट होना, जिसे 'नम्रता' या विनम्रता कहा जाता है, को प्रदर्शित करता है। भगवान कृष्ण द्वारा दिखाए गए विश्वरूप ने अर्जुन के ज्ञान (ज्ञान योग) और करुणा (भक्ति योग) दोनों का संतुलन स्थापित किया है कि ईश्वर न तो सीमित है न ही मानवीय व्यवहारों से प्रभावित होता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान में कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को 'विराट रूप' (विश्वरूप) प्रदर्शित करने के तुरंत बाद कहा गया है। जब अर्जुन ने देखा कि ईश्वर का वह विशाल, डरावना और अनंत स्वरूप सारे भूतों और कर्मियों को निगल रहा था, तो वे अभिभूत हो गए और गहरे संघर्ष में फंस गए। अपने इस भय और श्रद्धा के कारण अर्जुन ने पहले अपनी हठधरमीता और अपमानजनक व्यवहार (जैसे उन्हें 'मित्र' कहना, या मज़ाक करना) को स्वीकार करते हुए क्षमा मांगी है कि उन्होंने ईश्वर की अनंत शक्ति का सही आदर नहीं किया।
आज के जीवन में
आज के जीवन में जब हम किसी बड़े नेतृत्व (boss), शिक्षक, या विचारों के प्रति गलतफहमी से व्यवहार करते हैं और बाद को अंदाजा होता है कि वे बहुत अधिक महान थे, तो हमें तुरंत अपनी नज़र बदलनी चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी वृद्ध सदस्य या अनुभवी मार्गदर्शक की सलाह का मज़ाक बनाते हैं और बाद में उन्हें असली गहराई से समझ पाते हैं, तो आपको विनम्रतापूर्वक क्षमा मांगनी चाहिए। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब भी किसी ऊर्जावान या महान व्यक्ति के सामने अपनी अहंकार की सीमाएं टूटती हैं, तब 'क्षमायाचना' ही एक सच्चे विकास का पहला कदम है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जैसे जब कोई बच्चा अपने प्यारे दोस्त या परिवार के सदस्य की मज़ाक उड़ा देता है और फिर उसे गलत लगने पर माफ़ी मांग लेता है, वैसे ही अर्जुन कृष्ण से कह रहे हैं। उन्होंने सोच लिया था कि कृष्ण को वे हँसी-मज़ाक के लिए भी बुला सकते थे या उनके साथ सामान्य बातें कर सकते थे, लेकिन अब उन्हें समझ आया है कि वह भगवान का विश्वरूप (सब कुछ देखने वाला) हैं। अर्जुन कह रहे हैं, 'हे कृष्ण! मुझे माफ़ करें अगर मैंने आपको बिस्तर पर लेटते या खाने में देखा और सोचा कि आप भी मेरे जैसे इंसान हैं; अब मैं जानता हूँ कि आप सबके बीच ब्रह्मांड की तरह विशाल हैं।'
दैनिक चिंतन
आज जब भी आप किसी काम में गलती करते हैं या अहंकार से घिर जाते हैं, तो इसी श्लोक को स्मरण कीजिए। आपको यह समझने की जरूरत है कि ईश्वर हमारी नन्ही-सी हल्की सी लापरवाहियों और अपमानों के बावजूद भी आपसे प्रेम करते हैं। अपनी निस्संख्यता को पहचानकर अपने अति-बड़े भगवान से क्षमा मांगना ही एक गहरा पवित्र कर्म है जो आपको आंतरिक शांति दिलाएगा।
आज के लिए एक अभ्यास
कृष्ण के इस विशाल स्वरूप के सामने अपनी नन्ही सी पवित्रता को झुकाने का अभ्यास करें। मन में आती सभी गलतियाँ या अहंकारपूर्ण सोचों को उनके चरणों में समर्पित करके, 'अप्रमेय' की कृपा के लिए प्रार्थना करें कि वे हमें क्षमा दें और शुद्धि प्रदान करें।
मुख्य शिक्षाएँ
- क्षमा की अप्रमेयता (Limitless Mercy)
भगवान अर्जुन द्वारा किए गए संयोग और अनिच्छा से हुए व्यवहारों के लिए भी क्षमा मांगने को तैयार हैं। यह दर्शाता है कि भक्त का छोटा-सा अपराध भी ईश्वर की विशाल कृपा में समाहित हो जाता है, क्योंकि उनका स्वरूप 'अप्रमेय' अर्थात गणना से परे है। - नम्रता का महत्व (The Power of Humility)
व्याख्यान में दिखाया गया है कि भगवान के सामने अपने आप को नन्हा मानना और गलतियों की स्वीकार करना ही सच्ची उपासना है। अहंकार टूटने पर ही हम ईश्वर का वास्तविक रूप देख पाते हैं, जो प्रेम से भरपूर होता है। - दैनिक जीवन में पवित्रता (Purity in Daily Life)
यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि भगवान के साथ संबंध बिहार, आसन और भोजन जैसे साधारण कार्यों में भी बनाए जा सकते हैं। यदि ये कार्य अनजाने में अपमानजनक हो गए हों, तो ईश्वर की कृपा से वे पुनः पवित्र बन जाते हैं।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 10.20 — इस श्लोक के बाद यह समझने के लिए पढ़ें कि भगवान स्वयं कैसे 'प्राणियों में प्राण' और 'विश्व का आधार' हैं।
- 18.62 — इस श्लोक की भावना को पूरा करने के लिए, जहाँ भगवान अर्जुन से सभी कर्म त्यागकर उनकी शरण लेने का आदेश दिया गया है।
- 12.8 — अंत में, इस दृष्टिकोण को स्थिर करने के लिए पढ़ें कि कैसे मन को भगवान पर ही केंद्रित रखकर शांति प्राप्त की जा सकती है।
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