भगवद्गीता 11.30

Vishvarupa Darshana Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 11.30 — "हे विष्णो! आप प्रज्वलित मुखों के द्वारा इन समस्त लोकों का ग्रसन करते हुए आस्वाद ले रहे हैं, आपका उग्"
भगवद्गीता 11.30 — Vishvarupa Darshana Yoga
संस्कृत

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्- लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः | तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ||११-३०||

लिप्यंतरण

lelihyase grasamānaḥ samantāl- lokānsamagrānvadanairjvaladbhiḥ . tejobhirāpūrya jagatsamagraṃ bhāsastavogrāḥ pratapanti viṣṇo ||11-30||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण के विश्वरूप को देखकर विवश होकर कह रहे हैं कि हे विष्णो! आप अपने जलते हुए मुखों से सभी लोकों का ग्रसन कर रहे हैं। आपके तेज और उग्र प्रकाश ने सम्पूर्ण ब्रह्मांड भर दिया है जो भयानक रूप में तप रहा है। यह दृश्य अर्जुन को समय (Time) के रूप में काल की शक्ति दिखाता है जो सभी सृष्टियों का विनाश कर रही है और फिर भी उसमें आपकी दिव्यता झलकती है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'भक्ति योग' (Bhakti Yoga) और 'ज्ञान योग' (Jnana Yoga) का गहरा संगम है, जहाँ भक्त डर के साथ ईश्वरीय महिमा को पहचानता है। यह 'काल' (Time/Death) की अवधारणा विकसित करता है जो सभी कर्मों का अंत करती है और इस प्रकार 'अद्वैत वेदांत' में ब्रह्म के रूप में ईश्वर की सर्वव्यापकता को दर्शाती है। यह सिखाता है कि भयभीट होने पर भी शरण लेना ही सच्ची समर्पण (Surrender) है।

शब्दार्थ
लेलिह्यसे (Thou) lickest, ग्रसमानः devouring, समन्तात् on every side, लोकान् the worlds, समग्रान् all, वदनैः with mouths, ज्वलद्भिः flaming, तेजोभिः with radiance, आपूर्य filling, जगत् the world, समग्रम् the whole, भासः rays, तव Thy, उग्राः fierce, प्रतपन्ति are burning, विष्णो O Vishnu
पारंपरिक भाष्य
Vishnu means allpervading? Vyapanasila.

यह कहाँ घटित होता है

यह घटना महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र पर हुई थी, जहाँ अर्जुन ने अपनी पत्नियाँ और बंधुओं का विनाश देखने की भयावह स्थिति में संकट अनुभव किया। कृष्ण ने पहले अपने सौंदर्यपूर्ण रूप को छोड़कर अपना विश्वसूत्र (Cosmic Form) दिखा दिया था, जिसमें वे समय के रूप में सभी युद्ध करने वालों का विनाश कर रहे थे। अर्जुन इस दैवीय और भयावह दृश्य से इतने डर गए कि उन्होंने हाथ जोड़कर क्षमा याचना की और कृष्ण को 'विष्णो' संबोधित करते हुए उनका रूप देखने का वर्णन किया।

आज के जीवन में

जब जीवन में कोई अचानक आ रही आपदा, करियर का संकट या परिवार के साथ गंभीर विवाद हो और हमें लगता है कि सब कुछ नष्ट होने वाला है, तो यह श्लोक सिखाता है कि समय की इस प्रवाह को समझना ज़रूरी है। जैसे अर्जुन ने डरते हुए भी भगवान के आगे अपनी स्थिति स्वीकार की, वैसे ही हमें कठिन निर्णयों में घबराने के बजाय अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए और परिणाम ईश्वरीय नियम पर छोड़ने का साहस करना चाहिए। यह सीखती है कि भले ही बाहर की स्थितियाँ (जैसे आग) तबाही मचा रही हों, भीतर का सत्य अविचल बना रहता है और हमें धैर्य के साथ उस प्रवाह में बहावना चाहिए।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

सोचिए जैसे बहुत तेज धूप में हम अपनी आँखें नहीं खोल पाते, वैसे ही अर्जुन ने कृष्ण का विशाल रूप देखा जो पूरी दुनिया को घेर रहा था। इसमें ऐसा लगा मानो एक बड़ा दावानल (आग) सब कुछ खा रहा हो और चारों तरफ बहुत गर्मी हो रही है। लेकिन यह डराने के लिए नहीं, बल्कि यह दिखाने के लिए था कि भगवान की शक्ति कितनी विशाल है जो समय को भी नियंत्रण में रखती है।

दैनिक चिंतन

आज जब भी आपको लगता है कि जीवन का संपूर्ण प्रवास कठिन हो गया है और आप किसी विशाल शक्ति के सामने छोटे पड़ रहे हैं, तो याद रखें कि यह उसी 'विश्वरूप' की ओर से एक अत्यंत करुणापूर्ण संकेत है। भगवान का वह उग्र प्रकाश जो सब कुछ जला रहा है, वास्तव में आपके भीतर के सभी बाधाओं और क्लिष्टताओं को नष्ट करने के लिए ही आया है ताकि आप अपने असली स्वरूप से जुड़ सकें। यह तपन डर का कारण नहीं, बल्कि एक गहरे परिवर्तन की ओर आमंत्रण है जो आपको पूर्ण शांति और दिव्य प्रकाश में ले जाएगा।

आज के लिए एक अभ्यास

अपने भीतर के उस उग्र प्रकाश को देखें जो समस्त संसार को तपा रहा है, और स्वयं को इस विशाल रूप में विलीन करें। जब आप कर्तव्य या भक्ति की आग में जल रहे हों तो जानिए कि यह दहन नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि शुद्धि के लिए है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. सर्वनाशकारी उग्रता का अर्थ
    यह दृश्य दिखाता है कि ईश्वर की शक्ति कभी भी धर्म के लिए नष्ट करने वाली नहीं होती, बल्कि अधर्म और अनिर्दिष्ट काल को समाप्त करती है। जैसे आग लकड़ी को जलाकर राख बना देती है ताकि उससे शुद्ध ऊष्मा निकले, वैसे ही भगवान का प्रकाश अज्ञान को नष्ट करता है।
  2. समग्र ग्रहण और पूर्ण समर्पण
    जब ईश्वर 'लोकों' को ग्रसन करते हैं, तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह सब कुछ खत्म कर रहे हैं, बल्कि वे अपने में सभी प्राणीयों को समाहित कर लेते हैं। यह हमें सिखाता है कि पूर्ण समर्पण (समग्रतः) करने पर ही अहंकार का नाश होता है और ईश्वर के साथ एकता स्थापित होती है।
  3. जगत् की तपावट और शुद्धि
    भगवान का तेज जगत को परिपूर्ण करके उसे 'तपा' रहा है, जो दर्शाता है कि सृष्टि के प्रत्येक कण में ईश्वर की उपस्थिति और उसकी शक्ति निहित है। यह तपन हमें सिखाता है कि जीवन का हर संघर्ष या परीक्षा वास्तव में आत्म-सुधार और उच्चतम ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक प्रक्रिया है।

विषय

काल और समय की शक्ति (Power of Time)भगवान का विश्वरूप (Cosmic Form)डर और आत्मसमर्पण (Fear and Surrender)विनाश और सृष्टि का चक्रउग्र तेज की दृश्यताभक्ति में भय

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  1. 2.47 — इस श्लोक के बाद आप कर्मयोग और फल की आशा न करने का सिद्धांत समझेंगे, जो इस विशाल रूप को देखने वाले अर्जुन के लिए आवश्यक था।
  2. 3.30 — यह श्लोक आपको 'सर्वकर्माण्यपि' करके समर्पण करने का मार्ग दिखाएगा, जो भगवान की उग्रता के बीच भी कर्म करते रहने का आधार है।
  3. 12.15 — चतुर्थ अध्याय में भक्ति योग और ईश्वर को प्रेम से देखने का वर्णन, जो इस डरावने विश्वरूप के बाद अर्जुन की शान्ति लौटने का कारण बना।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अर्जुन ने कृष्ण को 'विष्णो' क्यों कहा था?
क्योंकि जब अर्जुन ने भगवान का विश्वरूप देखा, तो उन्हें लगा कि वे केवल एक दोस्त या सारथी नहीं बल्कि सम्पूर्ण विराट् (ब्रह्मांड) के स्वामी और समस्त प्राणियों को ग्रसने वाले काल हैं। 'विष्णो' शब्द का प्रयोग अर्जुन ने उनकी सर्वव्यापकता, सभी लोकों पर उनके अधिकार और उनकी दिव्य उग्र शक्ति को स्वीकार करने के संकेत में किया था।
इस श्लोक में 'तेजोभिः आपूर्य जगत्' का क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ यह है कि भगवान के विश्वरूप से निकलने वाला उग्र प्रकाश और तेज इतना शक्तिशाली था कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड को भर दिया था। इससे संकेत मिलता है कि ईश्वरीय ज्ञान या सत्य की आग कितनी तीव्र होती है जो सभी अज्ञान और भ्रांति का नाश कर देती है, जैसे यह श्लोक दिखाता है।
क्या यह विश्वरूप दर्शन केवल डरावना था या उसमें कोई संदेश भी था?
यह दृश्य अर्जुन को प्रारंभ में भयावह लगा क्योंकि उसे अपनी बंधुओं और पुत्रों का विनाश दिखाई दे रहा था, लेकिन इसका मुख्य संदेश 'समय' की अनिवार्यता है। यह सिखाता है कि समय (काल) सभी सृष्टियों को निगल लेता है और केवल भगवान ही उससे ऊपर हैं; इसलिए हमें कर्म करने का साहस रखना चाहिए।
आज की जीवन में इस श्लोक से क्या सीखनी चाहिए?
इसका मुख्य संदेश यह है कि जब भी हमारे जीवन में कोई विपरीत परिस्थिति या डर आ जाए, तो हमें घबराने के बजाय ईश्वर पर विश्वास करना चाहिए। जैसे अर्जुन ने भगवान की शक्ति को स्वीकार करके अपने कर्मों का भार छोड़ा था, वैसे ही आज भी हमें परिणाम से डरे बिना अपनी जिम्मेदारियां निभानी चाहिए और आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए।
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