भगवद्गीता 10.7
Vibhuti Yoga · हिन्दी अनुवाद
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः | सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ||१०-७||
etāṃ vibhūtiṃ yogaṃ ca mama yo vetti tattvataḥ . so.avikampena yogena yujyate nātra saṃśayaḥ ||10-7||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो व्यक्ति भगवान की विभूतियों (अलौकिक शक्तियां) और उनका योग तत्त्वपूर्वक जान लेता है, वह अनिवार्य रूप से स्थिर ध्यान में स्थापित हो जाता है। यह ज्ञान केवल सैद्धांतिक नहीं बल्कि एक ऐसा अनुभव है जो आदमी को किसी भी परिस्थिति में कंपन या संशय से मुक्त कर देता है। इस श्लोक का मुख्य सिद्धांत है कि पूर्ण और निष्कपट ज्ञान ही मनुष्य को अडिग भक्ति और स्थिर बुद्धि प्रदान करता है, जिस पर कोई भी सन्देह नहीं रह जाता।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक ज्ञानयोग और भक्ति का एक सुंदर संगम प्रस्तुत करता है, जो कहते हैं कि निष्काम कर्म के साथ-साथ ईश्वर को जानना (ज्ञान) ही सच्ची स्थिरता की कुंजी है। यह 'अविकम्प योग' शब्द ध्यानयोग और दृढ़ विश्वास पर आधारित सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है, जहाँ संदेह के अभाव में आत्मा ईश्वर से पूर्णतः जुड़ जाती है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह संवाद महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र में हुआ था जहाँ पांडवों और कौरवों के बीच भयंकर संग्राम होने वाला था। इससे पहले अर्जुन ने अपनी शक्ति और धर्म की जिम्मेदारी को लेकर गहरा संकट अनुभव किया और हथियार फेंक दिए थे, जिस पर श्री कृष्ण ने उन्हें समझाने के लिए यह अध्याय शुरू किया था। अब श्री कृष्ण अर्जुन को अपनी विशाल विभूतियों (देवताओं और प्रकृति में उनकी उपस्थिति) का वर्णन कर रहे हैं ताकि वे ईश्वर की महिमा समझ सकें। अर्जुन, जो अभी तक भगवान के रूप से पहचानने में संकोच रहा था, अब इस ज्ञान द्वारा पूरी तरह प्रेरित होकर युद्ध के लिए तैयार होगा क्योंकि उसे विश्वास आ गया है कि ईश्वर उसके साथ हैं।
आज के जीवन में
आज की भागदौड़ भरी दुनिया में जब कोई व्यक्ति करियर या परिवार से जुड़ी किसी गंभीर समस्या (जैसे नौकरी का खतरा या कर्जा) के सामने आकर घबरा जाता है, तो उसे यह श्लोक एक सच्चा आधार देता है। यदि वह समझ ले कि उसकी परिस्थितियाँ भी ईश्वर की विभूतियों (स्वभाव और नियमों) का ही हिस्सा हैं और उनका अर्थ गहराई से जान लिया, तो उसके मन में घबराहट खत्म हो जाएगी। वह ऐसे किसी भी निर्णय को बिना डरे या संशय के ले पाएगा जो 'अविकम्प योग' (निश्चल ध्यान) की स्थिति देता है, अर्थात वह काम करते हुए भी मन से शांत और केंद्रित रहेगा।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
बेटे/बेटी, जैसे एक छोटा बच्चा अगर यह पूरी तरह जान लेता है कि उसका प्यारा घर कहाँ है और वह कैसे सुरक्षित रहेगा, तो उसे कभी डर या भ्रम नहीं होता, वैसे ही श्री कृष्ण कहते हैं। यदि हम ईश्वर की शक्तियों को सच्चाई से समझ लेते हैं, तो हमारी आत्मा एक मजबूत खंभे की तरह स्थिर हो जाती है। इससे कोई भी मुश्किल चीज़ या डरावना विचार हमें हिला नहीं सकता और न ही हम किसी बात में कभी शंकित (संदेह) होने लगते हैं, बिल्कुल एक पहाड़ की तरह हम मजबूत हो जाते हैं।
दैनिक चिंतन
क्या आपको कभी लगता है कि ईश्वर का दर्शन केवल दूर किसी धाम में होता है? इस भगवद्गीता के श्लोक को पढ़कर समझें कि जब आप ईश्वर की महिमा और उनके योगिक मार्गों को सच्चाई से जान लेते हैं, तो आपको अंदर ही एक गहरी शांति और निश्चलता मिलती है। यह ज्ञान संदेह के भ्रम को मिटा देता है और आपके कर्मों में एक नया आत्मविश्वास भर देता है। आज से आपका हर कर्म इस अविकम्प योग की ओर ले जाने वाला हो जाएगा, क्योंकि आपको अब विश्वास है कि ईश्वर सबमें विद्यमान हैं।
आज के लिए एक अभ्यास
आज जब आप किसी भी कार्य में लगे हों, तो मन को यह स्मरण दिलाएं कि ईश्वर की विभूतियां और योग के सिद्धांत आपके अंदर ही निहित हैं। अपने ध्यान को इन दिव्य गुणों पर केंद्रित करके स्थिर करें और जानिए कि आपका सच्चा ज्ञान आपको संदेह से मुक्त अविकम्प (निश्चल) योग की ओर ले जाता है।
मुख्य शिक्षाएँ
- तत्त्वज्ञान ही सच्ची उपाय है
सिर्फ नाम या रूपों को देखना पर्याप्त नहीं, बल्कि ईश्वर की विभूतियों और योग के वास्तविक स्वरूप (तत्त्व) का गहरा ज्ञान आवश्यक है। यह आध्यात्मिक समझ ही व्यक्ति को अज्ञानता से बांधने वाले तारों को तोड़ती है। - अविकम्प योग की स्थिति
सच्चे ज्ञान प्राप्त करने के बाद, मन संसार की झंझावातों से हिलता नहीं और वह 'अविकम्प' यानी निश्चल अवस्था में युक्त हो जाता है। यह एक ऐसी ध्यान स्थिति है जो किसी भी बाहरी परिस्थिति द्वारा डगमगाई नहीं जा सकती। - संशय का अंत
जब ज्ञान पूर्ण होता है, तो 'नैत्र संशय' (कोई भी संदेह) शेष नहीं रहता। यह विश्वास की ऐसी अवस्था है जो आत्मा को निश्चित और स्थिर करती है कि ईश्वर का मार्ग ही सत्य है।
विषय
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आगे पढ़ें
- 2.47 — यह श्लोक कर्मयोग और फलाशक्ति की अविकम्प स्थिति का वर्णन करता है जो इस विभूति ज्ञान के आधार पर होता है।
- 3.30 — यह श्लोक कर्मों को ईश्वर में समर्पित करने की प्रक्रिया दिखाता है, जो विभूतियों को जानने के बाद स्वाभाविक रूप से आती है।
- 12.15 — यह श्लोक उस भक्त का वर्णन करता है जिसका मन स्थिर हो चुका होता है, जो कि 10वें अध्याय के ज्ञान का परिपाक है।
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