भगवद्गीता 10.41
Vibhuti Yoga · हिन्दी अनुवाद
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा | तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ||१०-४१||
yadyadvibhūtimatsattvaṃ śrīmadūrjitameva vā . tattadevāvagaccha tvaṃ mama tejoṃśasambhavam ||10-41||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो भी वस्तु या प्राणी इस संसार में दिव्य, तेजस्वी और शक्तिशाली है, वह सब मेरे ही एक छोटे से भाग (अंश) का प्रकाश है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि भौतिक दुनिया की हर सुंदरता और ताकत का मूल स्रोत ईश्वरीय तेज या 'महातेज' है। इससे हमारा उद्देश्य यह समझना होना चाहिए कि बाहरी रूपों में भी वह एक ही दिव्य ऊर्जा विराजमान है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक भगवद् गीता की 'अद्वैत वेदांत' परंपरा से जुड़ा है, जो यह सिखाती है कि ईश्वर (ब्रह्म) और सृष्टि के बीच अंतर नहीं है बल्कि एक ही सत्य का विस्तार है। इसे 'भक्ति योग' की ओर ले जाने वाला कदम माना जा सकता है, जहाँ भक्त प्रकृति में ईश्वर को देखकर उसकी आराधना करने लगता है और समझता है कि सब कुछ त्याग-पूर्वक ईश्वरीय ऊर्जा का ही रूप है।
शब्दार्थ
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में चल रहे संवाद का हिस्सा है जहाँ अर्जुन ने वीरता और धर्म से संबंधित अपने सभी प्रश्नों को पूछा था। अब भगवान श्री कृष्ण 'विभूति योग' अध्याय 10 में हैं, जो यह दर्शाते हैं कि वे कैसे संपूर्ण ब्रह्मांड के हर अंश में विद्यमान हैं। युद्ध से पहले की इस गहन अवस्था में कृष्ण अर्जुन को विश्व का आकार और अपने दिव्य स्वरूप (विभूति) समझा रहे हैं ताकि अर्जुन का भय दूर हो सके और उन्हें अपना धर्म निभाने की प्रेरणा मिले।
आज के जीवन में
कल्पना करें कि आप किसी महत्वपूर्ण कार्य में तनावग्रस्त हैं या नौकरियों के संसाधनों को लेकर चिंतित हैं; इस श्लोक का उपयोग करके आप यह देख सकते हैं कि आपके पास जो भी कौशल, अवसर और सहायता है, वह ईश्वर की उपलब्धि और उसकी दिव्य शक्ति से ही आया है। जब आपको लगता है कि कोई समस्या बहुत बड़ी है या संसाधन कम हैं, तो यह सोचें कि आपके पास जो भी 'तेज' (कौशल) है, वह ईश्वर का अंश है जिसे आप सही दिशा में लगा सकते हैं। इस दृष्टिकोण से आप घबराहट को शांत करके अपने कार्य में कृतज्ञता और आत्मविश्वास के साथ काम करेंगे।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो जैसे सूरज की रोशनी अनेक दीपकों और आईनों पर पड़ती है, तो हर जगह चमक दिखाई देती है लेकिन वह चमक असल में एक ही सूरज से आ रही होती है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि दुनिया का जो भी कुछ सुंदर, बड़ा या ताकतवर दिखता है, वह सब ईश्वर की रोशनी का ही हिस्सा है। जब तुम किसी तारे को देखो या किसी फूल की सुंदरी देखाओ, तो समझना कि उसमें भी भगवान की एक चिंगारी विराजमान है।
दैनिक चिंतन
आज जब आप किसी ऐसे व्यक्ति या वस्तु को देखेंगे जो आपको आकर्षित करती है, तो उसे केवल बाहरी रूप न समझकर उसमें छिपे divine प्रकाश को पहचानने की कोशिश करें। यह दृष्टिकोण आपके लिए संसार में पाए जाने वाले हर कल्याणकारी और शक्तिशाली तत्व का स्रोत, परमात्मा के साथ जोड़ देगा। आप देखेंगे कि जब तक आपको प्रत्येक चीज़ में ईश्वरीय चमक दिखाई न देती है, तब तक वे पूर्ण रूप से आपके लिए नहीं उजागर होतीं।
आज के लिए एक अभ्यास
आँखें बंद करें और अपने आसपास की प्रकृति में उस चमत्कारिक ऊर्जा को देखें जो आपको जीवन दे रही है। यह समझने का अभ्यास करें कि हर सुंदरता, हर ताकत और हर विभूति अंततः भगवान कृष्ण के एक छोटे से भाग (तेज) की ही पराकांक्षा है।
मुख्य शिक्षाएँ
- सृष्टि का स्रोत एक ही है
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि विविधता के बावजूद, सभी उत्पन्न वस्तुओं और प्राणियों की मूलभूत ऊर्जा समान है। यह हमें याद दिलाता है कि जो कुछ भी महान है, वह ईश्वर का ही प्रकाशित रूप है। - तेजोअंश (ऊर्जा के कण)
ईश्वरीय सत्ता 'महत्वपूर्ण' और 'दुर्विजेय' होने के बावजूद, उसकी प्रत्येक विभूति उसके तेज का एक अंश मात्र है। इसका तात्पर्य यह है कि कोई भी वस्तु स्वतंत्र नहीं बल्कि परमात्मिक शक्ति की अभिव्यक्ति है। - देखने की नई दृष्टि
भगवान अर्जुन से कहते हैं कि हमें हर सुंदर या शक्तिशाली चीज़ को 'मेरा ही रूप' समझना चाहिए। यह प्रार्थना और साक्षात्कार का मार्क है जो दृष्टि में पवित्रता लाता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — कर्मयोग के सिद्धांतों से जुड़ने के लिए यह श्लोक पढ़ें ताकि आप इस ज्ञान को कर्तव्य में उतार सकें।
- 3.30 — अपने सभी कर्म ईश्वर को अर्पित करने के लिए यह श्लोक पढ़ें, जो 10वीं अध्याय की विभूतियों का आनुभविक अनुसरण है।
- 12.15 — इसके बाद भगवान के गुणों और उनके प्रेम में लीन रहने वाले सदाचार्य पुरुष की विशेषताओं को जानें, जो इस विभूति ज्ञान का परिणाम है।
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