भगवद्गीता 10.36

Vibhuti Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 10.36 — "मैं छल करने वालों में द्यूत हूँ और तेजस्वियों में तेज हूँ, मैं विजय हूँ; मैं व्यवसाय (उद्यमशीलता) हू"
भगवद्गीता 10.36 — Vibhuti Yoga
संस्कृत

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् | जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ||१०-३६||

लिप्यंतरण

dyūtaṃ chalayatāmasmi tejastejasvināmaham . jayo.asmi vyavasāyo.asmi sattvaṃ sattvavatāmaham ||10-36||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे सभी उत्तम गुणों में सर्वश्रेष्ठ रूप धारण करते हैं। जिन लोग छल और चालाकी से खेलते हैं, वहाँ ईश्वर 'द्यूत' (सत्ता) के रूप में होते हैं, और जो तेजस्वी या शक्तिशाली हैं, वही उनकी 'तेज' की अभिव्यक्ति है। यह श्लोक सिखाता है कि विजय प्राप्त करने वाली इच्छाशक्ति और सात्विक पुरुषों का सच्चा गुण भी ईश्वर ही के रूप में प्रकट होते हैं। इसका मूल संदेश यह है कि हमें अपने जीवन की सबसे उच्च शक्तियों को परमात्मा से जोड़ना चाहिए।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह कथन 'अभेदवाद' (Non-dualism) और भगवद्गीता के 'विभूति योग' का सार है जो बताता है कि ईश्वर प्रकृति में ही सर्वोच्च गुणों के रूप में विद्यमान हैं। यह ज्ञान की उपासना (ज्ञान योग) को दर्शाता है, जहाँ पदार्थ और आत्मा के बीच का भेद मिटकर एक सत्य स्वरूप दिखाई देता है कि सर्वश्रेष्ठ गुण ही ईश्वर की अभिव्यक्ति हैं।

शब्दार्थ
द्यूतम् the gambling, छलयताम् of the fraudulent, अस्मि (I) am, तेजः splendour, तेजस्विनाम् of the splendid, अहम् I, जयः victory, अस्मि (I) am, व्यवसायः determination, अस्मि (I) am, सत्त्वम् the goodness, सत्त्ववताम् of the good, अहम् I
पारंपरिक भाष्य
Of the methods of defrauding others I am gambling such as diceplay. Gambling is My manifestation. I am the power of the powerful. I am the victoyr of the victorious. I am the effort of those who make that effort. I am Sattva which assumes the forms of Dharma (virtue)? Jnana (knowledge)? Vairagya (dispassion), and Aisvarya (wealth or lordship) in Sattvic persons.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया है, जब वे 'विभूति योग' (दिव्य गौरवों) का वर्णन कर रहे हैं। इससे ठीक पहले, अर्जुन ने भीम और कृष्ण के रूप में भयभीत होकर युद्ध छोड़ने की बात की थी, लेकिन अब कृष्ण उन्हें अपनी दिव्य शक्तियों को समझाकर प्रोत्साहित कर रहे हैं। इस संदर्भ में अर्जुन अपने विरोधी पक्ष (कौरवों) के बल और तेज पर चिंतित था, इसलिए कृष्ण कहते हैं कि सबसे उच्चतम शक्ति भी उनकी ही है ताकि अर्जुन का भय दूर हो।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक प्रोजेक्ट या किसी बड़े परीक्षा में शामिल हैं और आपको लगता है कि विपक्ष बहुत मजबूत है। इस श्लोक का उपयोग यह समझने के लिए करें कि आपके भीतर की 'व्यवसाय' (निर्णायक इच्छाशक्ति) और 'सत्त्व' (स्पष्ट चेतना) ही वह सच्ची ताकत हैं जो आपको विजयी बनाएगी। जब आप किसी मुश्किल निर्णय में डरते हों, तो यह याद रखें कि उस निष्पक्षता और दृढ़ संकल्प का मूल स्रोत ईश्वरीय शक्ति है, न कि केवल आपके अपने अहंकार की ताकत।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जैसे जब कोई बड़ा टूर्नामेंट होता है, तो जीतने वाला उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है, ठीक वैसा ही भगवान कृष्ण 'जीत' और 'तेज' के रूप में हैं। अगर कोई बहुत तेज़ चलता है या खेल में चालाकी से जीतता है, तो समझना चाहिए कि वह ईश्वर की शक्ति को महसूस कर रहा है। जैसे सूर्य की रोशनी सबसे तेज़ होती है और हवा सबसे मजबूत होती है, वैसे ही ईश्वर हमारे अंदर के हर अच्छे गुण में छिपकर रहते हैं ताकि आप भी जीत सकें।

दैनिक चिंतन

क्या आपने कभी सोचा है कि आपके अंदर की वह साहसिकता या दृढ़ संकल्प, जो आपको हर चुनौती पर विजय दिलवा रही है, वास्तव में ईश्वरीय ऊर्जा का ही प्रवाह है? जब हम अपने व्यवसाय या उद्यमशीलता (Vyavasaya) को केवल अपनी मेहनत मान लेते हैं, तो हम उस स्रोत की अनदेखी कर देते हैं जिससे यह शक्ति आती है। आज आपका संकल्प और आपके अंदर का सात्विक भाव ही भगवान कृष्ण का वह रूप हैं जो आपको आगे बढ़ा रहे हैं।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के लिए मन को स्थिर करें और यह सोचें कि आपकी सफलता या तेजस्वी प्रकृति स्वयं में नहीं, बल्कि परमात्मा की विभूतियों का ही एक रूप है। जब भी कोई काम आपको पूर्ण ज्ञान और ऊर्जा से भर दे, तो उस क्षण को ईश्वर के 'तेज' (Tejas) के रूप में पहचानें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. विजय की वास्तविक स्रोत
    संघर्ष और युद्ध में विजय (Jay) केवल शारीरिक ताकत से नहीं, बल्कि ईश्वरीय अनुग्रह का परिणाम है। यह सिखाता है कि हमें अपने संघर्षों में स्वयं को ही परमात्मा की साक्षी मानना चाहिए।
  2. उद्यमशीलता एक दिव्य शक्ति
    सफल काम करने और व्यवसाय (Vyavasaya) के लिए जो दृढ़ निश्चय होता है, वह भी कृष्ण का ही रूप है। यह हमें प्रेरित करता है कि अपना सारा उद्यम ईश्वर को समर्पित कर दें।
  3. सात्विक गुणों की महिमा
    जो लोग सात्विक हैं, उनमें जो शुद्धता और प्रकाश है, वह भी परम सत्य का ही प्रतिबिंब है। यह हमें सिखाता है कि अच्छाई और पवित्रता ईश्वर की पहचान हैं।

विषय

ईश्वर की सर्वोच्चताविजय और जीत का सारइच्छाशक्ति (व्यवसाय)सात्विक गुणों की प्रकृतितेजस्वी शक्तियाँदिव्य विभूतियों

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — यह श्लोक कर्म योग और फल की चिंता न करने का मूल सिद्धांत देता है, जो इस विभूति को समझने के लिए आवश्यक है।
  2. 3.30 — इसमें कर्मों को भगवान में अर्पित करने का आदेश दिया गया है, जिससे व्यवसाय और संकल्प ईश्वर के प्रति समर्पण बन जाते हैं।
  3. 12.15 — भक्ति योग में यह श्लोक बताता है कि कृष्णा को प्रिय होने वाला व्यक्ति (सात्विक और विजयी) कैसे होता है, जो इस अध्याय की संपूर्ण छवि पूरा करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह श्लोक हमें आत्मविश्वास कैसे देता है?
यह श्लोक यह समझाकर कि आपकी सबसे बड़ी ताकत (तेज), जीत की भावना और दृढ़ संकल्प ईश्वर से ही प्राप्त होते हैं, आपको अहंकार से मुक्त कर आत्मविश्वास देता है। जब आप डर या अनिश्चितता में हों, तो यह ज्ञान कि 'मैं' नहीं बल्कि 'वो शक्ति' आपके भीतर कार्य कर रही है, आपको स्थिर बनाता है।
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