भगवद्गीता 10.30

Vibhuti Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 10.30 — "मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों में काल हूँ, मैं 'पशुओं' में सिंह (मृगेन्द्र) और पक्षियो"
भगवद्गीता 10.30 — Vibhuti Yoga
संस्कृत

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् | मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ||१०-३०||

लिप्यंतरण

prahlādaścāsmi daityānāṃ kālaḥ kalayatāmaham . mṛgāṇāṃ ca mṛgendro.ahaṃ vainateyaśca pakṣiṇām ||10-30||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे संपूर्ण विश्व के उत्कृष्ट रूपों में विद्यमान हैं। दैत्य (राक्षस) गणना में प्रह्लाद, समय की गणना करने वालों में 'काल' या मृत्यु, पशुओं में सिंह और पक्षियों में गरुड़ उनके विशेष अवतार हैं। इसका मुख्य संदेश यह है कि ईश्वर केवल दूर कहीं नहीं बल्कि हमारे चारों ओर की सबसे शक्तिशाली और महान चीजों के भीतर ही रहते हैं।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'भक्ति योग' और 'ज्ञान योग' के संयोग को दर्शाता है, जहाँ विशिष्ट रूपों (विभूतियों) के माध्यम से निरंजन ब्रह्म की पहचان करवाने का उद्देश्य है। यह सिद्धांत कि सर्वशक्तिमान ईश्वर सृष्टि में अपने उत्कृष्ठ रूपांतरणों (उत्तमात्म) के रूप में प्रकट होते हैं, इस बात को स्पष्ट करता है कि भगवान दूर नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व का केंद्र हैं।

शब्दार्थ
प्रह्लादः Prahlada, च and, अस्मि (I) am, दैत्यानाम् among demons, कालः time, कलयताम् among reckoners, अहम् I, मृगाणाम् among beasts, च and, मृगेन्द्रः lion, अहम् I, वैनतेयः son of Vinata (Garuda), च and, पक्षिणाम् among birds
पारंपरिक भाष्य
Prahlada, though he was the son of a demon (Hiranyakasipu), was a great devotee of the Lord.

यह कहाँ घटित होता है

यह संवाद महाभारत के युद्धक्षेत्र कुुरुक्षेत्र पर भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है, जब अर्जुन ने अपनी भावनाओं में उलझकर हथियार फेंकने की सोची थी। इससे पहले (अध्याय 10 के शुरुआत से), कृष्ण ने अपने दिव्य गुणों का वर्णन करना शुरू किया था ताकि अर्जुन को अपनी भूमिका और ईश्वर की महिमा समझ आए। युद्ध की तैयारी में, यह संदेश अर्जुन के मन से डर हटाने और उसे विश्वास दिलाते हुए कि वह स्वतः ही नहीं बल्कि ईश्वर का साधक है, दिया गया था।

आज के जीवन में

आज की दुनिया में जब आप किसी मुश्किल निर्णय के सामने होते हैं या कार्यस्थल पर सबसे कठिन चुनौती आती है, तो इस श्लोक को ध्यान में रखें कि जहाँ भी 'श्रेष्ठता' और 'समर्पण' का भाव हो वहाँ ईश्वर उपस्थित हैं। यदि आप किसी टीम लीडर के रूप में दबाव में काम कर रहे हैं या परिवार की जिम्मेदारी निभाते समय थके हुए महसूस कर रहे हैं, तो यह समझें कि उस क्षण का 'काल' (अवसर) और आपकी शक्ति ईश्वरीय स्वरूप ही है। इस दृष्टिकोण से डर नहीं बल्कि साहस और विश्वास पैदा होता है क्योंकि आपको पता चल जाता है कि आप अकेले नहीं हैं, आपके भीतर की सर्वोत्तम क्षमताएं ईश्वर का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो जैसे किसी खेल में जो सबसे तेज़ भागता है या जिसमें सबसे मजबूत हो, वह उसका 'राजा' माना जाता है। भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि वे सभी चीजों के भीतर होते हैं, लेकिन खास तौर पर उन चीजों में जिनकी ताक़त और महानता सबको प्यारी होती है जैसे सिंह सबसे मजबूत जानवर है या गरुड़ उड़ने वाला राजा। ऐसा ही प्रह्लाद दैत्य कुल के बीच बड़ा भक्त था, इसलिए कृष्ण कहते हैं कि वे उसी में भी हैं ताकि हमें पता चले कि वह हर जगह उनकी शक्ति और अच्छाई का रूप है।

दैनिक चिंतन

प्यारे मित्र, क्या आपने कभी सोचा है कि जब भी आपको लगता है कि आप अकेले लड़ रहे हैं, तो वह शक्ति जो प्रह्लाद को राक्षसों से बचाती थी और सिंह के रूप में वनराज बनकर चलती है, आपके भीतर ही विद्यमान है। भगवान कृष्ण ने हमें यह नहीं बताया कि वे दूर कहीं हैं, बल्कि उन्होंने कहा कि दुर्बलताओं का सामना करने वाले प्रह्लाद और शक्तिशाली सिंह दोनों में उनकी वास्तविक उपस्थिति है। आज जब भी आप जीवन की किसी चुनौती या डर से घिरे महसूस करेंगे, तो यह जानें कि वही काल (कृष्ण) आपके अंदर उस समय के रूप में विद्यमान हैं जो आपको परिपक्वता और शक्ति प्रदान करते हैं।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने अंदर की उस शक्ति को पहचानें जो आपको डर और हिंसा से बचाती है, ठीक जैसे गरुड़ पक्षियों में सर्वश्रेष्ठ हैं या सिंह वनराज। जब भी आप किसी चुनौती का सामना करें, स्वयं को 'प्रह्लाद' की तरह अटल आस्था और 'काल' के रूप में अनिर्णीत समय से जुड़ा हुआ महसूस करें कि ईश्वर हर कठिन परिस्थिति में आपके साथ हैं।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. दुर्लभ मूल्य की पहचान (मृगेन्द्र)
    इस कविता में भगवान कहते हैं कि पशुओं में वे 'मृगेन्द्र' अर्थात सिंह के रूप में विद्यमान हैं, जो यह दर्शाता है कि ईश्वर सबसे शक्तिशाली और महान प्राणी भी हैं। इसका तात्पर्य यह है कि प्रकृति की किसी भी सर्वोच्च संपदा या शक्ति का मूल आधार वही दिव्य ऊर्जा है जिसकी हम पूजा करते हैं।
  2. अविचल आस्था और धैर्य (प्रह्लाद)
    दैत्यों के बीच भी भगवान 'प्रह्लाद' कहलाते हैं, जो एक बालक होने पर भी अपनी अटूट श्रद्धा से अपने दानव पिता का भी विश्वास जीत लेता था। यह हमें सिखाता है कि ईश्वर सबसे कठिन और विपरीत परिस्थितियों में भी उन लोगों के साथ होते हैं जो निष्काम भाव से उनके आगे झुकते हैं, चाहे वे दानव हों या देवता।
  3. समय का स्वामी (काल)
    'गणना करने वालों में काल' होकर भगवान समय की वह शक्ति बनते हैं जो सब कुछ समाप्त करती है और पुनर्जन्व के चक्र को आगे बढ़ाती है। यह सिखाता है कि हमें किसी भी घटना या परिस्थिति से डरना नहीं चाहिए, क्योंकि अंततः सभी समय का नियम ईश्वर की इच्छा पर ही चलता है और वह सब कुछ देख रहा होता है।

विषय

ईश्वर की विभूतियाँ (Divine Glories)समर्पण और भक्ति (Devotion and Surrender)काल का महत्व (Significance of Time/Death)दृष्टिकोण बदलना (Changing Perspective)श्रेष्ठता की पहचान (Recognition of Excellence)अहंकार त्याग (Renunciation of Ego)

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — कर्मयोग का मूल सिद्धांत और कर्तव्य पर जोर, जो 'प्रह्लाद' की आस्था को संचालित करता है।
  2. 3.30 — सर्वश्रेष्ठ भक्ति के रूप में अपना समर्पण करने का वर्णन, जो प्रकृति और कर्मों के बीच संबंध को स्पष्ट करता है।
  3. 12.15 — भक्त की गुणधर्मों का विवरण, जो 'मृगेन्द्र' और 'प्रह्लाद' जैसी दिव्य प्रकृति को विकसित करने के लिए आवश्यक है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या 'प्रह्लाद' दैत्य कुल से थे या कोई अन्य व्यक्ति?
हाँ, प्रह्लाद दैत्य (राक्षस) कुल के थे जो नरसींह अवतार का सबसे बड़ा भक्त था। कृष्ण उन्हें सभी दैत्यों में उत्कृष्ट और सर्वोत्तम मानते हैं इसलिए कहते हैं कि वे उनमें विद्यमान हैं, यह दर्शाता है कि ईश्वर किसी भी जाति या वर्ग के बाहर नहीं होते।
'विनायके' से क्या तात्पर्य है और वह कौन था?
वास्तव में श्लोक का सही पद 'वैनतेयः' (Vainateya) है, जिसका अर्थ है 'विनाता के पुत्र', जो गरुड़ देव हैं। वे सभी पक्षियों और उड़ने वाले जीवों पर राजा माने जाते हैं इसलिए कृष्ण कहते हैं कि वे उनमें भी विद्यमान हैं।
'काल' शब्द का यहाँ क्या अर्थ है?
यहाँ 'काल' का अर्थ केवल समय नहीं, बल्कि मृत्यु और नष्ट करने वाला (Time as the Destroyer) है। कृष्ण कहते हैं कि जो लोग गणना या नियति को समझने की क्षमता रखते हैं, वे जानते हैं कि अंत में सब कुछ 'काल' द्वारा ही समाप्त होता है, इसलिए वह सबसे शक्तिशाली तत्व के रूप में उनकी उपस्थिति दर्शाई गई है।
यह श्लोक हमें कैसे मदद करता है जब हम डरे हुए हों?
जब हम किसी चुनौती या डर से घिरे होते हैं, यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि ईश्वर सबसे मजबूत और महान रूपों में ही नहीं बल्कि अपनी रक्षात्मक ऊर्जा (समय/मृत्यु) के माध्यम से भी उपस्थित हैं। यदि आप किसी संघर्ष का सामना कर रहे हैं, तो यह समझने पर कि ईश्वर उस समय और स्थिति में ही आपके साथ हैं, मन को शक्ति मिलती है।
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