भगवद्गीता 1.8

Arjuna Vishada Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 1.8 — "एक तो स्वयं आप, भीष्म, कर्ण, और युद्ध विजयी कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र है।"
भगवद्गीता 1.8 — Arjuna Vishada Yoga
संस्कृत

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः | अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ||१-८||

लिप्यंतरण

bhavānbhīṣmaśca karṇaśca kṛpaśca samitiñjayaḥ . aśvatthāmā vikarṇaśca saumadattistathaiva ca ||1-8||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में सारथि संजय, पांडुपुत्रों के पक्ष में लड़ रहे भीष्म पिताmahim को कृपाचार्य और अन्य वीर योद्धाओं की सूची दे रहा है। यह बताते हुए कि युद्ध का सामना करने वाले शक्तिशाली विरोधी दल कौन हैं, संजय अर्जुन के मन में डर और आतंक को स्पष्ट कर रहे हैं। मुख्य शिक्षा यह है कि जब हम अपने पक्ष की तुलना दुश्मनों से करते हैं, तो गतिशीलता या भय जैसी भावनाएं उत्पन्न हो सकती हैं।

इसके पीछे का सिद्धांत

इस श्लोक को 'कर्म योग' (Karma Yoga) की तैयारियों का हिस्सा माना जाता है, जहाँ अर्जुन को अपनी भावनाओं और भय के साथ निपटना होगा ताकि वह कर्तव्य पालन कर सके। यह 'संख्या दर्शन' (Sankhya) की अवधारणा पर आधारित है कि आत्मा अनश्वर है, इसलिए शारीरिक डर या रिश्तेदारी का बंधन अंत में महत्वपूर्ण नहीं होता। भगवान कृष्ण के उपदेश से पहले यह दृश्य 'विषाद योग' (Arjuna's Despair) को स्थापित करता है जो ज्ञान और आत्म-ज्ञान की आवश्यकता पर जोर देता है।

शब्दार्थ
भवान् yourself, भीष्मः Bhishma, च and, कर्णः Karna, च and, कृपः Kripa, च and, समितिञ्जयः victorious in war, अश्वत्थामा Asvatthama, the son of Dronacharya, विकर्णः Vikarna, च and, सौमदत्तिः the son of Somadatta, तथा thus, एव even, च and. No Commentary.

यह कहाँ घटित होता है

यह कथन महाभारत के युद्ध के आगमन पर सूर्योदय से ठीक पहले का है, जब अर्जुन ने पांडवों की ओर और दुर्योधनों की ओर खड़े योद्धाओं को देखा था। संजय, जो धृतराष्ट्र के राजमहल में थे, भगवान विष्णु द्वारा प्रदान किए गए 'दिव्य दर्शन' से यह सब देख रहे हैं और उन्हें बताते हैं कि भीष्म पिताmahim जैसे वरिष्ठ योद्धाओं की उपस्थिति अर्जुन के मन को घबराहट में डाल रही है। इस क्षण पर, युवक राजकुमार अर्जुन ने अपनी तलवारें फेंक दी हैं और शरीर कांपने लगे हैं क्योंकि उन्हें अपने ही रिश्तेदारों और गुरुओं से भयंकर युद्ध करना पड़ेगा।

आज के जीवन में

आज के समय में यह एक ऐसे प्रबंधक की स्थिति को दर्शाता है जो अपनी नई कंपनी छोड़ना चाहता है लेकिन उन सभी वरिष्ठ लोगों का सामना करने की चिंता कर रहा है जिनके साथ उसने सालों काम किया है। जैसे अर्जुन अपने गुरुओं और भाइयों के विरोध से डरा था, वैसा ही प्रबंधक भी अपनी पुरानी टीम या बॉसों को नाराज़ करने का डर महसूस करता है। इस स्थिति में हमें यह समझना चाहिए कि भय अक्सर सच्चाई नहीं होता, बल्कि हमारी कल्पना और 'जो हो सकता है' के बारे की चिंता होती है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जैसे दो बड़े स्कूलों के बीच फुटबॉल मैच में एक टीम अपने खिलाड़ियों को देखती है और उन्हें डर लगने लगता है क्योंकि वे बहुत मज़बूत दिख रहे हैं, वही अर्जुन ने भी किया। संजय ने उसे बताया कि दुश्मनों की तरफ सबसे बड़े योद्धा जैसे भीष्मदादा, कर्ण दादा और अन्य ताकतवर लोग खड़े हैं। इससे समझ आता है कि जब हमें लगता है कि सामने वाले बहुत ज्यादा शक्तिशाली हैं, तो डरना स्वाभाविक होता है लेकिन यह केवल एक भावना है जो बाद में बदल सकती है।

दैनिक चिंतन

जब आप अपने जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े होते हैं, तो अक्सर आपको लगता है कि आपके सामने बहुत से शक्तिशाली बाधाएं या विरोधक हैं, जैसे भगवद्गीता में भीष्म और कर्ण थे। लेकिन इस पंक्तियों को समझकर आप देखेंगे कि ये सभी व्यक्ति एक ही युद्ध के मैदान में एक साथ खड़े होकर आपको एक गहरे संदेश दे रहे हैं: यह समय आत्म-ज्ञान का है। इन महान योद्धाओं की सूची आपके भीतर उस डर या भ्रम को उजागर करती है जिसे आप दूर करने के लिए तैयार नहीं हैं।

आज के लिए एक अभ्यास

इस श्लोक में देखें कि कर्ण, भीष्म और अश्वत्थामा जैसे महान योद्धा कैसे एक ही पक्ष के लिए खड़े हैं। आज अपनी प्रार्थना में उन सभी का ध्यान करें जो आपके जीवन में मार्गदर्शन करने वाले या आपको चुनौती देने वाले 'सहायक' (samitiñjaya) हैं, और समझें कि उनकी उपस्थिति एक बड़े लक्ष्य की ओर संकेत कर रही है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. संघर्ष का वास्तविक स्वरूप (The Nature of Conflict)
    यह श्लोक हमें बताता है कि महान संघर्ष केवल दो पक्षों के बीच नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच होता है। भीष्म और कर्ण जैसे महापुरुष एक ही तरफ खड़े होकर यह दिखाते हैं कि जब धर्म का मार्ग चुनना मुश्किल हो जाता है तो विरोध कितना शक्तिशाली हो सकता है।
  2. विद्या और योग्यता की भूमिका (Role of Knowledge and Competence)
    सभी उल्लिखित नाम गुरुकुल के सबसे प्रतिभाशाली छात्र हैं, जो दर्शाते हैं कि ज्ञान और कौशल का उपयोग अक्सर व्यक्तिगत लोभ या भ्रम में किया जा सकता है। यह हमें चेतावनी देता है कि बाहरी शक्ति होने पर भी आंतरिक दृष्टि (Buddhi) की अनुपस्थिति विनाश को निमंत्रण देती है।
  3. सामूहिक संकल्प का प्रभाव (Power of Collective Will)
    एक साथ खड़े होने वाले योद्धाओं की सूची एक सामूहिक शक्ति को दर्शाती है जो व्यक्तिगत डर या सतही कारणों पर आधारित हो सकती है। यह हमें सिखाता है कि जब तक आत्म-ज्ञान (Atma-jnana) नहीं होता, तब तक बड़ी संख्या और महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि भी गलत दिशा में एकजुट करने के लिए उपयोग की जा सकती हैं।

विषय

कर्तव्य (Dharma)भय और डर (Fear and Anxiety)पुरुषार्थ का विरोधियों की सूची (List of Opponents)विषाद योग (Arjuna's Despair)गुण-कर्म (Quality of Action)संजय की दृष्टि (Sanjay's Vision)

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — यह श्लोक अर्जुन के इस निराशा को हल करता है और आपको कर्मयोग का सार समझाता है कि फलाशंका छोड़कर कार्य करना चाहिए।
  2. 3.30 — इसके बाद यह श्लोक पढ़ें जो अर्जुन को सभी कर्मों को भगवान में समर्पित करने का आदेश देता है, जिससे उनका मन शांत होता है।
  3. 12.15 — अंत में इस श्लोक के माध्यम से पढ़ें जो भगवान की प्रकृति और एक परमात्मीय भक्त (devotee) के गुणों का वर्णन करता है, जिससे आपके मन में आशा और समर्पण जागा।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संजय ने इस सूची को धृतराष्ट्र को क्यों सुनाया?
संजय, जो राजा के दूरस्थ प्रतिनिधि थे और भगवान विष्णु की कृपा से यह सब देख रहे थे, धृतराष्ट्र को युद्ध के वास्तविक परिदृश्य का वर्णन करके अर्जुन की स्थिति समझाने में सहायता करते हैं। उन्होंने इस सूची को सुनाया ताकि राजा पता लगा सकें कि अर्जुन क्यों डर रहा है और उनके पुत्रों के विपरीत कितने शक्तिशाली योद्धा मौजूद हैं।
'समितिञ्जय' (Samitiñjaya) का अर्थ क्या है?
'समितिं' का अर्थ संघर्ष या युद्ध से होता है और 'इंजय' का अर्थ विजेता। इसलिए, कृपाचार्य को 'समितिञ्जय' कहा गया है क्योंकि वे अपने शत्रुओं पर जीत हासिल करने में सक्षम थे। यह उपनाम उनकी युद्ध कौशल और सामरिक दूरदर्शिता को दर्शाता है।
अध्याय 1 श्लोक 8 किस विद्या का हिस्सा माना जाता है?
इस श्लोक को 'विषाद योग' (Arjuna's Despair) का हिस्सा माना जाता है, जो गीता के पहले अध्याय में आता है। यह वह समय है जब अर्जुन कर्म और नैतिकता के बीच संघर्ष कर रहे हैं और भगवान की ओर से मार्गदर्शन प्राप्त करने से पहले अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं।
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