भगवद्गीता 1.22

Arjuna Vishada Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 1.22 — "जिससे मैं युद्ध की इच्छा से खड़े इन लोगों का निरीक्षण कर सकूँ कि इस युद्ध में मुझे किनके साथ युद्ध क"
भगवद्गीता 1.22 — Arjuna Vishada Yoga
संस्कृत

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् | कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ||१-२२||

लिप्यंतरण

yāvadetānnirikṣe.ahaṃ yoddhukāmānavasthitān . kairmayā saha yoddhavyamasmin raṇasamudyame ||1-22||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवद् गीता के इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से विनती कर रहे हैं कि वे अपनी सैन्य को देख सकें। वह जानना चाहते हैं कि युद्ध की तैयारी के समय उनके सामने खड़े वीरों में से किसके साथ उन्हें लड़ना होगा। यह दृश्य अर्जुन के मन में उत्पन्न होने वाले संदेह और करुणा को दर्शाता है, क्योंकि वे अपने ही कुटुंबियों और गुरुओं को देख रहे हैं।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक कर्म योग की प्रारंभिक अवस्था को दर्शाता है जहाँ अर्जुन अभी 'कर्म' (कार्य) में नहीं बल्कि परिणामों और भावनाओं में उलझे हुए हैं। यह दृश्य 'ज्ञान' के महत्व पर जोर देता है कि बिना सही पहचान और समझ के कोई कार्य शुरू नहीं करना चाहिए, भले ही वह धर्म का हो। अर्जुन की इस स्थिति कर्मयोगी बनने से पहले की एक आवश्यक चरण को दर्शाती है जहाँ व्यक्ति अपने डर और पक्षपातों को देखता है।

शब्दार्थ
-- 1.22 सेनयोः of the armies, उभयोः of both, मध्ये in the middle, रथम् car, स्थापय place, मे my, अच्युत O Achyuta (O changeless? Krishna), यावत् while, एतान् these, निरीक्षे behold, अहम् I, योद्धुकामान् desirous to fight, अवस्थितान् standing, कैः with whom, मया by me, सह together, योद्धव्यम् must be fought, अस्मिन् in this, रणसमुद्यमे eve of battle. No Commentary.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र रणक्षेत्र में स्थित है, जहाँ पांडव और कौरव की विशाल सेनाएं एक-दूसरे के विपरीत खड़ी हैं। अर्जुन ने अपनी सेना को व्यवस्थित किया है और उन्होंने भगवान श्री कृष्ण (जो उनके रथ का सारथी हैं) से यह अनुरोध किया है कि वे उन्हें पूरी तरह देखने की अनुमति दें ताकि वे अपने विरोधियों की पहचान कर सकें। इससे पहले, अर्जुन ने पांडवों को संघर्ष के लिए तैयार करने का आदेश दिया था और अब वह अपनी भावनाओं से घिरा हुआ है क्योंकि उन्हें पता चल गया कि उनके सामने खड़े लोग उनका अपना परिवार और गुरु हैं।

आज के जीवन में

जब हम किसी कठिन फैसले, जैसे नौकरी बदलना या कोई बड़ा विवाद सुलझाने के लिए तैयारी कर रहे होते हैं, तो अक्सर हमें डर लगता है कि परिणाम क्या होगा। इस श्लोक की सीख यह है कि निर्णय लेने से पहले स्थिति का गहराई से अवलोकन करें और समझें कि आपके विरोधी या चुनौती कौन हैं, ताकि आप अपनी भावनाओं को पहचान सकें। जैसे अर्जुन ने युद्ध शुरू करने से पहले देखा, वैसे ही हम भी अपने डर का कारण जानकर उसे दूर कर सकते हैं और शांत मन के साथ आगे बढ़ सकते हैं।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम एक बहुत बड़े खेल मैदान पर खड़े हो, लेकिन अचानक तुम्हें पता चलता है कि तुम्हारे दोस्तों और भाई-बहन उसी रिंग में खिलाड़ी हैं। जैसे ही आप अपने मित्रों को देखते हैं, आपको डर लगने लगता है कि क्या मुझे उन्हें हरा करके जीतना चाहिए? अर्जुन भी ठीक ऐसा महसूस कर रहे थे; उन्होंने कृष्ण से कहा- 'मुझे सबको अच्छे से देखने दो ताकि पता चल सके कि मेरे साथ युद्ध करने वाले लोग किससे हैं।' यह उनका डर था, न कि लड़ना।

दैनिक चिंतन

क्या कभी ऐसा लगा है कि हमारे सामने ऐसे लोग खड़े हैं जो हमारा परीक्षण ले रहे हैं, जैसे अर्जुन ने भी युद्ध के मैदान में देखा था? आज का दिन आपको इस बात की याद दिलाता है कि आपके संघर्ष और संबंध गहराई से जुड़े हुए हैं। जब आप 'मुझे किससे लड़ना होगा' सोचने के बजाय 'मैं क्यों खड़ा हूँ' यह समझेंगे, तो भ्रम मिट जाएगा। अपने अहंकार को थोड़ा पीछे हटाकर देखें कि आपके आसपास की हर शक्ति आपको किस दिशा में ले जा रही है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज इस क्षण में, अपनी आँखों से देखने के बजाय भीतर की दृष्टि को खोलें। जैसे अर्जुन ने युद्धक्षेत्र में अपने प्रियजनों का निरीक्षण किया था, उसी तरह आप भी उन लोगों और स्थितियों को पहचानें जिनसे आपको जीवन में जुड़ना है या संघर्ष करना पड़ेगा।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. निरीक्षण का महत्व (Importance of Observation)
    युद्ध शुरू करने से पहले कृष्ण ने अर्जुन को अपने विरोधियों की पहचान करवाई, जो दर्शाता है कि हर संघर्ष में सही ज्ञान और अवलोकन अनिवार्य है। बिना परिस्थितियों को समझे कोई भी कार्य शुरू करना मूढ़तापूर्ण हो सकता है।
  2. कर्म का विवेक (Discrimination in Action)
    'युद्ध की इच्छा से खड़े' होने पर अर्जुन ने स्वतः ही अपने कर्त्तापन और विरोधियों के बीच संबंध स्थापित किया। यह सिखाता है कि हमें अपनी भूमिका और दूसरों का स्थान स्पष्ट रूप से समझकर चलना चाहिए।
  3. संघर्ष की प्रकृति (Nature of Struggle)
    इस श्लोक में 'राण' के संदर्भ ने दिखाया कि जीवन का हर मोड़ एक परीक्षण होता है जिसमें हमें अपने कर्म और धर्म को समझना होगा। यह निरीक्षण अज्ञानता से मुक्ति की पहली सीढ़ी है।

विषय

कर्म और कर्तव्य (Duty)विषाद या दुख का कारण (Reason for Despair)परिवार और रिश्ते (Family Bonds)अवलोकन और समझ (Observation and Understanding)संघर्ष की तैयारी (Preparation for Conflict)कृष्ण के प्रति श्रद्धा (Devotion to Krishna)

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — अर्जुन के निरीक्षण के बाद, अगले अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण उन्हें कर्मयोग और फल से वैराग्य का गहरा उपदेश देते हैं।
  2. 3.30 — इस श्लोक के बाद यह पढ़ें ताकि आप समझ सकें कि अपने कर्मों को ईश्वर की अभिकल्पना में सौंपकर कैसे आगे बढ़ा जाए।
  3. 12.15 — अंततः यह पढ़ें ताकि आप देख सकें कि एक ज्ञानी व्यक्ति, जो कर्म और धर्म का सही निरीक्षण करता है, वह ईश्वर को कैसे प्रिय होता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अर्जुन इस श्लोक में क्या मांग रहे हैं?
अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से अनुरोध कर रहे हैं कि वे उन्हें अपने रथ पर खड़ा करने दें ताकि वे अपनी सामने खड़ी दोनों सैन्यों को देख सकें। उनका मुख्य उद्देश्य यह पहचानना है कि युद्ध में उनके साथ लड़ने वाले लोग किससे होंगे, क्योंकि वे अब तक केवल शब्द सुनकर नहीं बल्कि दृश्य से ही परिचित होना चाहते हैं।
क्या अर्जुन का यह डर गलत था?
अर्जुन का डर उनकी मानवीय भावनाओं और परिवार के प्रति प्रेम से उत्पन्न हुआ था, जो एक संवेदनशील व्यक्ति की पहचान है। हालाँकि धर्म दृष्टि से युद्ध करना उनके कर्तव्य में शामिल था, लेकिन यह श्लोक दर्शाता है कि बिना गहराई से अवलोकन और भावनाओं को समझे निर्णय लेने का परिणाम क्या हो सकता है।
इस श्लोक में 'अच्युत' शब्द किसके लिए प्रयोग किया गया है?
'अच्युत' भगवान श्री कृष्ण के एक नाम का उल्लेख करता है, जिसका अर्थ है 'जो कभी गिरते नहीं हैं' या 'परिवर्तनहीन।' अर्जुन इस शब्द से उनसे सम्मान और आसक्ति दर्शाते हुए बात कर रहे हैं कि वे उनकी सहायता के लिए विश्वास करते हैं।
क्या यह श्लोक युद्ध शुरू करने का संकेत देता है?
नहीं, बल्कि इसमें अर्जुन युद्ध शुरू करने से पहले अपनी स्थिति और विरोधियों को समझने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं। वे तुरंत लड़ना नहीं चाहते थे, बल्कि यह जानकर कि किसके साथ लड़ना है, उनके मन में उत्पन्न होने वाले संशयों का समाधान करना चाहते थे।
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