भगवद्गीता 1.13

Arjuna Vishada Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 1.13 — "तत्पश्चात् शंख, नगारे, ढोल व शृंगी आदि वाद्य एक साथ ही बज उठे, जिनका बड़ा भयंकर शब्द हुआ।"
भगवद्गीता 1.13 — Arjuna Vishada Yoga
संस्कृत

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः | सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ||१-१३||

लिप्यंतरण

tataḥ śaṅkhāśca bheryaśca paṇavānakagomukhāḥ . sahasaivābhyahanyanta sa śabdastumulo.abhavat ||1-13||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन की ओर से नहीं, बल्कि सारथी द्रोणाचार्य या संकेतकों द्वारा वर्णित है। इसमें बताया गया है कि युद्ध शुरू होने वाले ही सभी शंख, ढोल और वाद्ययंत्र एक साथ बज उठे हैं। इनकी ध्वनि इतनी भयानक और गूंजा हुआ था कि पूरा मैदान डर से कंपन करने लगा। यह दृश्य संकेतात्मक रूप से युद्ध की तैयारी, शक्ति का प्रदर्शन और आने वाले कठिन समय के अंतर्द्वंद्व को दर्शाता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक मुख्य रूप से 'कार्म योग' (Action Yoga) की प्रक्रिया का परिचय देता है, जहाँ व्यक्ति को अपने कर्तव्य के लिए तैयार होना चाहिए भले ही परिस्थितियां डरावनी हों। यह 'संख्या दर्शन' और 'योगाभ्यास' की शुरुआती अवस्थाओं में आने वाले बाहरी चक्रवात को स्वीकार करने की भावना से जुड़ा है, जो अंततः मन के स्थिर होने (स्थितप्रज्ञता) का मार्ग प्रशस्त करता है।

शब्दार्थ
ततः then शङ्खाः conches, च and, भेर्यः kettledrums, च and, पणवानकगोमुखाः tabors, drums and cowhorns, सहसा एव ite suddenly, अभ्यहन्यन्त blared forth, सः that, शब्दः sound, तुमुलः tremendous, अभवत् was. No Commentary.

यह कहाँ घटित होता है

भारतीय महाकाव्य महानाता की कुरुक्षेत्र लड़ाई से ठीक पहले यह घटना हुई है, जहाँ पांडव और कौरव दोनों सेनाएँ एक दूसरे के सामने खड़ी हैं। इस श्लोक में वर्णित तेज़ आवाजें युद्ध शुरू होने का चिह्न थीं जो द्रोणाचार्य द्वारा सुनवाई गई थीं या सारथी ने अर्जुन को बताई थीं। तुरंत पहले ही, पांडवों की सेना और कौरवों के बीच संख्या में भारी असमानता देखकर अर्जुन का मन विषाद (उदासी) और भय से भर गया था। अब जब वाद्ययंत्र बजने लगे हैं, तो यह बता रहा है कि युद्ध की तैयारी पूरी हो गई है और कोई पीछे हटने का मौका नहीं रह गया है।

आज के जीवन में

कल्पना करें कि आप किसी महत्वकर प्रोजेक्ट या नौकरी के इंटरव्यू से पहले बहुत घबराए हुए हैं, जहाँ सब कुछ एक साथ शुरू होने वाला हो और आपको डर लग रहा है। इस श्लोक का पाठ यह सिखाता है कि जब बाहरी दुनिया में भारी गड़गड़ाहट या अशांति (जैसे तनावपूर्ण वातावरण) फैल जाए, तो उस स्थिति को स्वीकार करना और अपनी मानसिक शांति बनाए रखना जरूरी होता है। जैसे युद्ध के आरम्भ में शब्दों की गूंज भयानक थी लेकिन वह एक नई प्रक्रिया का हिस्सा था, वैसे ही जीवन के संक्रमण काल में भी आप अपनी धैर्य और साहस से सामना कर सकते हैं।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जब बड़े खेल या किसी महत्वपूर्ण मुकाबले में टीम इकट्ठा होती है, तो वे अपनी बांगड़ियां (शंख) और ढोल एक साथ बजाते हैं ताकि सबको पता चल जाए कि शुरू हो रहा है। कुरुक्षेत्र के मैदान पर भी ऐसा ही हुआ; अर्जुन की ओर से सभी योद्धाओं ने अपने शृंगी, नगारे और अन्य वाद्ययंत्रों को एक साथ बजा दिया। यह आवाज़ इतनी तेज़ थी जैसे बादलों में गरजन हो रही हो, जो युद्ध के शुरू होने का संकेत था।

दैनिक चिंतन

क्या आप महसूस करते हैं कि आपके जीवन के अंदर भी कर्तव्य, डर और संघर्ष की वह 'भयंकर ध्वनि' गूंज रही है? जैसे पंचावरण में शंख और ढोल एक साथ बजे तो सुन्नता आ जाती है, वैसे ही आपके मन के विविध विचार भी अक्सर आपको घेर लेते हैं। इस क्षण को स्वीकार करें कि जब बाहरी दुनिया की गूंज बहुत तेज हो जाए, तभी आपकी वास्तविक शक्ति और स्थिरता का परीक्षण होता है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज की ध्यान प्रक्रिया में, अपने कानों को उस विनाशकारी और भयंकर शब्द-ध्वनि के लिए खोलें जो युद्धभूमि से गूंजी। इस शोर के पीछे छिपे अहंकार और द्वंद्व की ध्वनि का अनुभव करें, और मन को उस शांत स्थिति में ले जाए जहां सभी वाद्य यंत्र एक साथ बजने पर भी आंतरिक सन्नाटा बना रहता है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. कर्म के कारण होने वाली भयंकर ध्वनि
    इसverset में वर्णित 'tumula' (भयंकर) शब्द कर्तव्य पालन की प्रक्रिया में अनिवार्य रूप से आने वाले संघर्ष और विरोध का प्रतिबिंब है। जब हम अपने धर्म के लिए खड़े होते हैं, तो अक्सर एक ऐसा गूंजता हुआ वातावरण बन जाता है जो मन को हिला देता है।
  2. बाहरी शोर और आंतरिक स्थिरता
    शंखों, ढोलकों और नगाड़ों का एक साथ बजना बाह्य संघर्ष को दर्शाता है जो अंततः हमारे भीतर की शांति को चुनौती देता है। गीता सिखाता है कि सच्चा योगी इन सभी भयानक ध्वनियों के बीच भी अपने मन को स्थिर रख सकता है, चाहे बाहर का वातावरण कितना भी अशांत क्यों न हो।
  3. व्यक्तिगत संघर्ष से उदासीनता
    अर्जुन के विषाद में यह शब्द ध्वनि उस समय की है जब आत्मा का सत्य अहंकार और लोभ के बाधाओं को तोड़ रहा था। यह सिखाता है कि कर्मों का फल या परिणाम जो भी हो, उसे एक निष्पक्ष दृष्टि से देखना ही असली बुद्धिमानी है।

विषय

कर्तव्य (Duty)भय और साहस (Fear and Courage)युद्ध का प्रारंभ (Start of War)मानसिक तैयारी (Mental Preparation)ध्वनि की शक्ति (Power of Sound)विषाद योग (Arjuna's Despair)

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  1. 2.47 — इसverset में 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' का सिद्धांत आता है, जो अर्जुन के विषाद और युद्ध की ध्वनि से निपटने के लिए सबसे महत्वपूर्ण समाधान प्रदान करता है।
  2. 3.30 — यहverset 'सर्वकर्मणि' का ज्ञान देता है कि सभी कर्मों को ईश्वर के समर्पण में अर्पित करके बाहरी शोर से मुक्ति कैसे पाई जाए।
  3. 12.15 — इसverset में भगवान कृष्ण उस व्यक्ति का वर्णन करते हैं जो सभी जीवों को दुख और सुख नहीं देता, जिससे बाहरी ध्वनियों से प्रभावित न होने की क्षमता विकसित होती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

किसने यह शब्द सुना और अर्जुन ने इसे क्यों नहीं सुना?
यह वर्णन संभवतः सारथी द्रोणाचार्य या किसी अन्य गवाह द्वारा किया गया है क्योंकि युद्ध शुरू होने वाले ही सभी योद्धाओं के शंख बज उठे थे। अर्जुन उस समय अपने मन में विषाद और दुविधा से इतना व्यस्त था कि बाहरी शोर की ओर ध्यान नहीं दे पा रहे थे, हालाँकि यह आवाज़ उनके कानों तक पहुंची थी लेकिन उनकी मानसिकता ने उसे अलग तरह से प्रोसेस किया।
क्या 'तुमुल' शब्द का सीधा अनुवाद क्या है और इसका महत्व क्यों है?
'तुमुल' (tumula) का अर्थ है बहुत भारी, भीड़-भाड़ वाला या भयानक। यह शब्द उस आवाज़ की तीव्रता को दर्शाता है जो युद्ध के शुरू होने और दसियों हजारी योद्धाओं के एक साथ बजने से उत्पन्न हुई थी। इसका उपयोग गीता में डर, अनिश्चितता या किसी महत्वपूर्ण घटना की शुरुआत की तीव्रता को व्यक्त करने के लिए किया गया है।
क्या यह श्लोक अर्जुन के पाप का संकेत देता है?
नहीं, यह श्लोक सीधे तौर पर किसी पाप की बात नहीं करता बल्कि बाहरी वातावरण और युद्ध की प्रारंभिक घटनाओं को वर्णित करता है। हालाँकि, इस भयानक आवाज़ का वर्णन अर्जुन के मन में पहले से ही व्याप्त विषाद (despair) को और गहरा कर देता था क्योंकि यह संकेत दे रहा था कि अब कोई पीछे हटने का रास्ता नहीं है।
यह श्लोक हमें आज के जीवन में क्या सिखाता है?
यह श्लोक सीख देता है कि जब भी जीवन में बड़े संक्रमण या अशांति की लहर (जैसे नई जॉब, विवाह, या किसी मुश्किल निर्णय) आती है, तो बाहरी शोर और डर स्वाभाविक हैं। हमें उस स्थिति को स्वीकार करना चाहिए कि जब बड़े बदलाव की तैयारी चल रही हो, तो वह प्रक्रिया कितनी भी भयावन क्यों न लगे, उसे एक साथ शुरू होने देना ही सफलता का पहला चरण है।
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