भगवद्गीता 9.17
Raja Vidya Raja Guhya Yoga · हिन्दी अनुवाद
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः | वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ||९-१७||
pitāhamasya jagato mātā dhātā pitāmahaḥ . vedyaṃ pavitramoṃkāra ṛksāma yajureva ca ||9-17||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे स्वयं इस संपूर्ण ब्रह्मांड के पिता, माता और दादा (पितामह) हैं। उनका यह कहना है कि ज्ञान योग्य वस्तु, पवित्रता का प्रतीक 'ॐ', और सभी तीन वेद ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मूलतः उनके ही रूप हैं। इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि ईश्वर न केवल सृष्टि के रचयिता हैं बल्कि वह स्वयं उस ज्ञान और पवित्रता का स्वरूप हैं जिससे हमें जानना चाहिए।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह दृष्टिकोण ज्ञान योग (Jnana Yoga) की बुनियाद पर खड़ा है जो ईश्वर को निगुण ब्रह्म के रूप में प्रकट करता है, साथ ही भक्ति भावनाओं को भी पोषित करता है। यह सिद्धांत 'अखंड' या अद्वैत दर्शन का समर्थन करता है जहाँ सृष्टि और उसका रचयिता एक दूसरे से पृथक नहीं हैं बल्कि ईश्वर ही सब कुछ के भीतर निहित है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह वचन महाभारत के युद्ध के मैदान कुुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया है, जब वे धर्म और अधर्म के द्वंद्व से उलझे हुए थे। कृष्ण ने इससे पहले 'राजविद्या राजगुह्य' (सबसे गुप्त ज्ञान) का प्रारंभ किया था और अब उन्हें ईश्वर की सर्वव्यापकता समझा रहे हैं। अर्जुन के मन में अभी भी क्लेश है, इसलिए कृष्ण उसे विश्वास दिलाते हुए बता रहे हैं कि वे ही सभी प्राणियों का मूल स्रोत और लक्ष्य हैं।
आज के जीवन में
मान लीजिए आप एक बहुत बड़े निर्णय के सामने खड़े हैं या किसी परियोजना में संघर्ष कर रहे हैं, जहाँ आपको लगता है कि सब कुछ आपके हाथ से निकल रहा है। इस श्लोक का उपयोग करते हुए आप यह सोच सकते हैं कि यदि ईश्वर ही 'धाता' (फल देने वाला) और सभी के पालनहार हैं, तो परिणाम की चिंता छोड़कर अपने कर्तव्य पर ध्यान दें। जब हम कार्य को किसी उच्च शक्ति या सिद्धांत के लिए समर्पित कर देते हैं, तब आत्मविश्वास बढ़ता है और अनावश्यक तनाव कम हो जाता है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना कीजिए जैसे आपका घर आपके माँ-बाप द्वारा बनाया गया है, उन्हें आपको खिलाना और बचाना भी पसंद है, और उनकी कहानियां सुनकर ही आपको सच्चाई समझ आती है। भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे उसी तरह इस पूरी दुनिया के माता-पिता और दादाजी जैसे हैं जो सबकी देखभाल करते हैं। वह यह भी कहते हैं कि 'ॐ' का जाप करने वाला शब्द या पवित्र पुस्तकें सिर्फ कठिन शब्द नहीं, बल्कि उनका ही स्वरूप हैं जिसे जानना बहुत जरूरी है।
दैनिक चिंतन
प्रिय मित्र, क्या कभी आपको लगा है कि देवता या ईश्वर बहुत दूर आकाश में रहते हैं? आज का संदेश बताता है कि वे न केवल आपके पास हैं बल्कि आपकी प्रकृति और अस्तित्व की मूल भूमि भी हैं। जब आप किसी पवित्र शब्द, गीत या विचार को सुनते हैं, तो समझें कि वह स्वयं परमात्मा का स्वरूप है जो आपको आशीर्वाद दे रहा है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के अभ्यास में गुरुदेव श्री कृष्ण की इस वाणी को स्मरण करें कि वे ही आपका पालनहार, पोषक और आत्मा हैं। अपने मन को शांत करके प्रतीत करें कि यह समस्त जगत उनसे अलग नहीं है और आप भी उनके वही एक भाग हैं जो सब कुछ में व्याप्त है।
मुख्य शिक्षाएँ
- ईश्वर में सृष्टि की अखंडता (Non-duality of Creation)
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि कर्म और भक्ति का फल पाने के लिए ईश्वर से अलग कोई अन्य माध्यम नहीं है। वे ही वह मूल स्रोत हैं जिससे यह विशाल जगत उत्पन्न हुआ, धारण किया गया और उसका संकल्प भी उनकी इच्छा पर निर्भर करता है। - वेदों का अंतिम लक्ष्य: वेद्य (Jnana)
ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद केवल कर्मकांड नहीं हैं, बल्कि उनमें छिपा रहस्य 'ओम्' स्वरूप परमात्मा को जानना ही है। ईश्वर स्वयं वेद्य (ज्ञान योग्य) वस्तु हैं, अर्थात ज्ञान का विषय और उसका स्रोत दोनों एक ही हैं। - पवित्रता की उत्पत्ति
सभी पवित्र चीजें जो हमारे जीवन में शुद्धि लाती हैं, उनका मूल स्वयं ईश्वर के रूप में विद्यमान है। जब कोई वस्तु या कर्म 'पवित्र' कहलाता है, तो उसकी वास्तविक शक्ति और पवित्रता का स्रोत परमात्मा ही होते हैं।
विषय
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आगे पढ़ें
- 9.4 — यह श्लोक बताता है कि भगवान कैसे सृष्टि को धारण करते हैं लेकिन उसमें व्याप्त नहीं होते, जो इस अद्वैत भावना की गहराई समझने में मदद करेगा।
- 10.8 — यह प्रसंग विस्तार से बताता है कि कृष्ण ही 'अमृत' और 'पवित्र' का स्रोत हैं, जो 9.17 की बात को और स्पष्ट करता है।
- 14.26 — यह श्लोक बताता है कि कैसे भक्ति के माध्यम से हम उस 'पवित्र' अवस्था में जाते हैं जहाँ ईश्वर और जीवात्मा का भाव मिट जाता है।
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