भगवद्गीता 7.23

Jnana Vijnana Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 7.23 — "परन्तु उन अल्प बुद्धि पुरुषों का वह फल नाशवान् होता है। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं "
भगवद्गीता 7.23 — Jnana Vijnana Yoga
संस्कृत

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् | देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ||७-२३||

लिप्यंतरण

antavattu phalaṃ teṣāṃ tadbhavatyalpamedhasām . devāndevayajo yānti madbhaktā yānti māmapi ||7-23||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो लोग देवताओं की पूजा करते हैं, उनका प्राप्त फल केवल एक बार का और नाशवान होता है। इन लोगों को 'अल्पमेध' या कम बुद्धि वाले कहा गया है क्योंकि वे क्षणभंगुर सुखों में ही लिपटे रहते हैं। इसके विपरीत, जो भक्त सीधे परमात्मा कृष्ण की शरण में आते हैं, उनके फल का अंत नहीं होता और वे अनन्त शांति प्राप्त करते हैं। इस श्लोक का मुख्य सिद्धांत यह है कि देवताओं तक जाने वाला रास्ता समय के साथ समाप्त हो जाता है, जबकि भगवान की उपासना हमेशा चलने वाली सच्चाई में ले जाती है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'भक्त योग' और 'ज्ञान योग' की गहराई को प्रस्तुत करता है, जहाँ कर्मों का फल (काम्य कर्म) अस्थायी होता है लेकिन ईश्वर के प्रति समर्पण (नित्य भक्ति) पारमार्थिक मुक्ति दिलाता है। यह सिद्धांत 'अद्वैत वेदांत' की नींव पर खड़ा है कि क्षणभंगुर संसार में निष्ठा रखना अज्ञान का लक्षण है, जबकि ब्रह्म (ईश्वर) को ही सर्वोच्च लक्ष्य मानकर जानने वाला सच्चा ज्ञानी कहलाता है।

शब्दार्थ
अन्तवत् finite, तु verily, फलम् the fruit, तेषाम् of them, तत् that, भवति is, अल्पमेधसाम् those of small intelligence, देवान् to the gods, देवयजः the worshippers of the gods, यान्ति go to, मद्भक्ताः My devotees, यान्ति go to, माम् Me, अपि also
पारंपरिक भाष्य
The exertion in the two kinds is the same and yet people do not attempt to worship the Supreme Being in order to attain the maximum benefits or the infinite reward (liberation or Moksha). The reward obtained by men of small understandng and petty intellect who worship the minor deities is small, perishable and temporary. Yajnas (Vedic rituals)? Homas (rituals in which oblations are offered into the sacred fire) and Tapas (penance) of various sorts can bestow only temporary rewards on the performer. Liberation from the wheel of transmigration alone will give everlasting bliss and eternal peace. Those who worship Indra and others are Sattvic devotees those who worship Yakshas and Rakshasas (demoniacal beings) are Rajasic devotees and those who worship the Bhutas and Pretas (discarnate spirits) are Tamasic devotees. The knowledge of those who worship the small deities is partial and incomplete. It cannot lead to liberation. (Cf. IX.25)

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान कुुरुक्षेत्र में हुआ है, जहाँ पांडवों की सेना को हराकर कौरवों का अंतिम संघर्ष चल रहा था। श्री कृष्ण इस समय 'ज्ञान विज्‍यान योग' (सच्चे ज्ञान और अनुभव के योग) में हैं, क्योंकि वे अर्जुन को यह समझा रहे थे कि भगवान का सत्य स्वरूप क्या है। तभी तक अर्जुन ने देवताओं की पूजा करने वाले पुरुषों के फल पर संदेह किया था और कृष्ण अब उस शंका को दूर कर रहे हैं।

आज के जीवन में

कल्पना करें कि आप किसी महत्वकारी नौकरी या व्यवसाय में सफलता हासिल करने के लिए बहुत मेहनत कर रहे हैं, लेकिन सिर्फ अस्थायी प्रतिष्ठा या धन की उम्मीद रखते हुए। यदि आपका लक्ष्य केवल बोनस या पदोन्नति (जैसे देवताओं का फल) है, तो एक बार मिलने पर वह भी खत्म हो सकता है और फिर चिंता वापस आ सकती है। लेकिन अगर आप अपनी मेहनत को ईश्वर की सेवा में समर्पित करते हैं और परिणामों से मुक्त रहते हुए कर्म करते हैं (जैसे भगवान का मार्ग), तो आपको अंदरूनी शांति मिलती है जो बाहरी तनावों या असफलताओं के बाद भी नहीं जाती।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम्हारे पास दो तरह का खाने को मिल रहा है: एक तो ताज़ी मिठाइयां जो कुछ देर के लिए मजेदार लगती हैं लेकिन जल्दी खाकर खत्म हो जाती हैं, और दूसरा कोई ऐसा जादूई भोजन जिससे तुम हमेशा भरपूर रहो। जो बच्चे सिर्फ एक बार की मिठाइयों पर ही आश्रित होते हैं, वे थोड़ी देर बाद फिर से भूखे हो जाते हैं और उन्हें 'अल्प बुद्धि' वाला समझा जाता है क्योंकि उन्होंने लंबी उम्र का सुख नहीं चुना। लेकिन जो बच्चे हमेशा खाए जाने वाले उस जादूई भोजन को चुन लेते हैं, वे कभी भी खाली महसूस नहीं करते और हमेशा खुश रहते हैं।

दैनिक चिंतन

प्यारे दोस्त, क्या आप कभी महसूस करते हैं कि दुनियादारी की दौड़ आपको थका देती है? यह गीता का संदेश हमें याद कराता है कि जो लोग केवल अस्थायी फलों को चाहते हैं, उनका ज्ञान सीमित होता है। जब आप ईश्वर में ही अपना लक्ष्य बना लेते हैं, तो आपको कभी भी निराशा नहीं होती क्योंकि वह सदा-सर्वकालिक और पूर्ण प्रेम है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के लिए अपने मन को स्थिर करें और यह सोचें कि आपका भगवान से प्रेम ही सच्चा लक्ष्य है, न कि अस्थायी फल। जब भी कोई कामना आपके मन में आए, उसे 'अल्प-बुद्धि' की ओर ले जाने वाले पथ के रूप में पहचानें और उसकी जड़ को अपने भक्ति भाव से काट दें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. अस्थायी फलों की सीमाएं (Limits of Temporary Fruits)
    यह श्लोक स्पष्ट करता है कि देवताओं के पूजकों को प्राप्त होने वाले भोग और सुख अंत में नश्वर होते हैं। ये सभी पदार्थ कालक्रम के साथ विघटित हो जाते हैं, इसलिए इन्हें ही परम लक्ष्य समझना 'अल्प-बुद्धि' का कार्य है।
  2. भक्ति की श्रेष्ठता (Superiority of Devotion)
    कृष्ण भक्तों को यह आश्वासन देते हैं कि जो लोग निस्वार्थ भाव से उनके चरणों में समर्पित होते हैं, वे सीधे परमात्मा तक पहुँच जाते हैं। इस पथ का परिणाम अमर और पूर्ण है, न कि केवल क्षणिक सुख-दुख की गतिरोक।
  3. बुद्धि का विस्तार (Expansion of Intellect)
    'अल्प-बुद्धि' शब्द उन लोगों को संदर्भित करता है जिनका दृष्टिकोण केवल भौतिक लाभ तक सीमित होता है। सच्ची बुद्धिमानी तभी आती है जब व्यक्ति देवताओं की अस्थायी पूजा से हटकर काल्पनिक और पारमार्थिक ईश्वर में समर्पित हो जाता है।

विषय

भक्ति का महत्व (Devotion)अस्थायी फल बनाम शाश्वत मुक्ति (Fruit vs Liberation)देवता और ईश्वर की उपासना (Worship of Gods and God)कर्मयोग का सच्चा स्वरूपज्ञान की गहराई (Depth of Knowledge)आत्मा की अमरता

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  1. 2.47 — इस श्लोक के बाद 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' पढ़ना आवश्यक है ताकि समझा जा सके कि फल की आकांक्षा छोड़कर कर्तव्य क्यों करना चाहिए।
  2. 3.9 — यह श्लोक 'यज्ञ' और अनासक्त कर्म के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताता है, जो इस विषय की गहराई को बढ़ाएगा।
  3. 12.15 — इसके बाद भक्तों के गुण पढ़ना चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो कि एक सच्चा भक्त कैसे बनता है और उसे ईश्वर का क्या आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या देवताओं की पूजा करना गलत है?
नहीं, देवताओं की पूजा करना स्वयं में बुरा नहीं है, लेकिन श्लोक के अनुसार इसका फल 'अंतवत्' या नाशवान होता है। जब तक आपकी इच्छाएं और लक्ष्य केवल अस्थायी सुखों पर केंद्रित हैं, तब तक वह फल भी समय के साथ समाप्त हो जाएगा। गीता का संदेश यह नहीं कि देवताओं की पूजा न करें, बल्कि यह है कि आपको अपने लक्ष्य को अनंत और शाश्वत ईश्वर में बदलना चाहिए।
'अल्पमेधसाम्' शब्द का क्या अर्थ होता है?
"अल्पमेध" का शाब्दिक अर्थ 'कम बुद्धि वाला' या 'सीमित विवेक रखने वाले' है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि वे व्यक्ति पागल हैं, बल्कि उनमें वह गहरी समझ (ज्ञान) की कमी है जो उन्हें बताती हो कि अस्थायी सुखों से परे एक अनंत सत्य भी होता है। ये लोग केवल क्षणिक फलों में लिपटे रहते हैं और भगवान जैसी स्थायी शक्ति को पहचानने में असमर्थ होते हैं।
भक्तों का क्या अंत नहीं हो सकता, जबकि देवताओं के उपासकों का फल खत्म क्यों होता है?
देवता भी ईश्वर के ही अवतार या संचालक हैं, लेकिन उनके माध्यम से प्राप्त सुख संसारिक और समय-सीमित होते हैं। भगवान कृष्ण सीधे उपास्य पदार्थ (ईश्वर) हैं जो स्वयं अनंत हैं; इसलिए जिनका प्रेम और समर्पण उनमें निहित है, उनके फल का अंत नहीं होता क्योंकि वे ब्रह्म के साथ मिल जाते हैं। यह भक्ति की शक्ति को दर्शाता है कि सीधे स्रोत से जुड़ने वाला कभी भी सूखा नहीं पड़ सकता।
इस श्लोक का हमारे दैनिक जीवन में क्या प्रयोग हो सकता है?
आज के समय में, यह श्लोक हमें चेतावनी देता है कि यदि आपका लक्ष्य सिर्फ पैसा या पद ही है (अस्थायी फल), तो एक बार मिलने पर वह खत्म भी होगा और फिर चिंता होगी। लेकिन अगर आप अपने कर्मों को ईश्वर की इच्छा के अनुसार, निस्वार्थ भाव से करते हैं (भक्ति या समर्पण), तो आपको परिणाम चाहे जो आए, आंतरिक शांति नहीं जाती। यह हमें लंबे समय तक टिकाऊ संतुष्टि और सुख प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है।
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