भगवद्गीता 3.11

Karma Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 3.11 — "तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवतागण तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार परस्पर उन"
भगवद्गीता 3.11 — Karma Yoga
संस्कृत

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः | परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ||३-११||

लिप्यंतरण

devānbhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ . parasparaṃ bhāvayantaḥ śreyaḥ paramavāpsyatha ||3-11||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि देवताओं और मानवों के बीच परस्पर पालन-पोषण का एक चक्र है। जब हम यज्ञ या सेवा के माध्यम से देवताओं की उन्नति करते हैं, तो वे भी हमारी भलाई करते हैं। इस प्रकार आपसी सहयोग और कृतघ्नता रहित कार्य करके मनुष्य परम श्रेय अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'कर्मा योग' (Karma Yoga) के सिद्धांतों का केंद्र बिंदु है जो निष्काम कर्म और यज्ञ की अवधारणा को विकसित करता है। इसमें यह दर्शाया गया है कि अद्वैत वेदांत में व्यक्तिगत स्वार्थ से परे जाकर सर्वत्र देवताओं (प्रकृति के नियमों) के साथ एकता स्थापित करना ही वास्तविक साधना है।

शब्दार्थ
देवान् the gods, भावयत nourish (ye), अनेन with this, ते those, देवाः gods, भावयन्तु may nourish, वः you, परस्परम् one another, भावयन्तः nourishing, श्रेयः good, परम् the highest, अवाप्स्यथ shall attain
पारंपरिक भाष्य
Deva literally means the shining one. By this sacrifice you nourish the gods such as Indra. The gods shall nourish you with rain, etc. the highest good is the attainment of the knowledge of the Self which frees one from the round of births and deaths. The highest good may mean the attainment of heaven also. The fruit depends upon the motive of the aspirant.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर होता है, जहाँ अर्जुन विरोधी पक्ष से लड़ने में संशय और करुणा की अवस्था में थे। भगवान श्रीकृष्ण ने पहले गीता का प्रस्तावनात्मक भाग (ज्ञान योग) समझाया था और अब वे 'कर्मायोग' के मार्ग को विस्तार से स्पष्ट कर रहे हैं। कृष्ण अर्जुन को यह समझाते हुए कि सिर्फ लड़ने या न लड़ने का विकल्प नहीं, बल्कि एक उच्चतर दायित्व है जो परोपकार और धर्म के चक्र पर आधारित है।

आज के जीवन में

आज के आधुनिक जीवन में यह श्लोक तब लागू होता है जब कोई प्रोजेक्ट लीडर अपनी टीम की मदद से एक बड़े कार्य को पूरा करता है, न कि सिर्फ अपने लिए काम करे। यदि आप अपने कर्मों का फल दूसरों के भला के लिए समर्पित करेंगे (जैसे शिक्षक छात्रों की सफलता चाहना या डॉक्टर रोगियों में सुधार करना), तो कार्य तनावमुक्त हो जाएगा और नेटवर्क मजबूत होगा। यह विचार आपको आत्म-केन्द्रि होने से हटाकर सामाजिक जिम्मेदारी और सहयोग की भावना पर ले जाता है, जिससे मानसिक शांति मिलती है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जैसे एक दोस्त अपनी मिठाई किसी दूसरे बच्चे के साथ बांट देता है, तो वह भी उसे अपना खिलौना या मदद की पेशकश करके बदला देता है, वैसे ही इस श्लोक में कहा गया है कि जब हम देवताओं (प्राकृतिक शक्तियों) को खुश करते हैं, वे हमारी मदद के लिए तैयार हो जाते हैं। अगर आप दूसरों की भलाई करेंगे और ईर्ष्या नहीं करेंगे, तो जीवन आसानी से और सुखी होगा। यह एक ऐसा खेल है जिसमें सबको जीत मिलती है जब सभी साथ-साथ काम करते हैं।

दैनिक चिंतन

क्या कभी आपने सोचा है कि आपके हर छोटे काम का असर सीधे आपके और दूसरों के भविष्य पर पड़ता है? श्रीमद्‌भगवद्गीता हमें सिखाती है कि जब हम अपने कार्यों को समर्पित करके देवताओं की उन्नति करते हैं, तो वे देवता भी आपकी रक्षा और उन्नति में सहयोगी बनते हैं। यह परस्पर का बंधन ही आपको उस परम श्रेय तक ले जाता है जो अकेले नहीं मिल सकता।

आज के लिए एक अभ्यास

आज की ध्यान में केवल अपने कार्यों को ही नहीं, बल्कि उन कार्यों से उत्पन्न होने वाले परिणामों और परस्पर निर्भरता का भी चिंतन करें। जब आप कोई कार्य करते हैं तो मन में यह भावना लाएं कि इससे दूसरे जीवित प्राणी या देवी-देवताओं की उन्नति हो रही है, जिससे स्वयं भी सुदृढ़ होंगे।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. कर्मों के माध्यम से देवताओं की उन्नति (Yajna)
    इस श्लोक में 'यज्ञ' का संदर्भ है जहाँ हम अपने कार्यों को समर्पित करके विश्व के अस्तित्व और नियंत्रण में शामिल होने वाले बलों (देवताओं) की सेवा करते हैं। यह सिद्धांत बताता है कि जब कार्य निस्वीकार भाव से किया जाता है, तो वह व्यक्तिगत स्वार्थ को छोड़कर समग्र कल्याण की ओर अग्रसर होता है।
  2. परस्पर निर्भरता और सहयोग (Paraspara Bhavayanta)
    जीवन एक पारस्परिक संबंधों का जाल है; जब हम दूसरों के कल्याण में लगे रहते हैं, तो प्रकृति या देवी-देवताएँ भी आपके लिए मार्ग सुनहरी करती हैं। यह सिखाता है कि अकेले चमत्कार नहीं होता, बल्कि परस्पर भाव (संवाद और सहयोग) से ही समस्त सद्‌भाव स्थापित हो सकता है।
  3. परम श्रेय की प्राप्ति
    जब हम निःस्वीकार भाव से कार्य करके परस्पर उन्नति करते हैं, तो अंत में 'परम श्रेय' या आत्म-साक्षात्कार का मार्ग खुल जाता है। यह केवल भौतिक लाभ नहीं बल्कि वह ऊँची अवस्था है जहाँ व्यक्ति अपनी सीमाओं से मुक्त होकर दिव्य सत्य को अनुभव करता है।

विषय

कर्मा योग (Karma Yoga)यज्ञ की महत्ता (Importance of Yajna)परस्पर सहयोग (Mutual Cooperation)निष्काम कर्म (Selfless Action)देवता-मानव संबंध (Relationship between Gods and Humans)परोपकार का फल (Fruits of Selflessness)

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  1. 3.9 — इससे पहले का संदर्भ यह समझने के लिए कि कर्म क्या 'बद्धि' (बंधन) और क्या 'यज्ञ' है, इस विषय की गहराई को बढ़ाने हेतु।
  2. 3.10 — इस श्लोक में प्रकृति द्वारा कर्मों के सृजन और देवताओं से संबंध स्थापित करने का मूल सिद्धांत दिया गया है जो इस श्लोक 3.11 की नींव बनाता है।
  3. 4.24 — कर्मों को यज्ञ के रूप में देखने और आत्मा-ब्रह्म पर केंद्रित करने के उच्चतर दृष्टिकोण की ओर ले जाने वाला महत्वपूर्ण संक्रमण।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'देवताओं की उन्नति' का शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
शाब्दिक रूप से इसका तात्पर्य देवताओं (प्राकृतिक बलों या ऊर्जाओं) को संतुष्ट करना यज्ञ के माध्यम से है। आध्यात्मिक दृष्टि से, यह हमें सिखाता है कि जब हम दूसरों और प्रकृति की भलाई के लिए कार्य करते हैं, तो हम अपने भीतर उच्च जागरूकता को विकसित कर रहे होते हैं जो 'उन्नति' कहलाती है।
यह श्लोक कर्मा योग और ज्ञान योग में कैसे संबंधित है?
यह सीधे तौर पर कर्म योग का हिस्सा है जो कार्य के माध्यम से आत्मा की शुद्धि को दर्शाता है। हालांकि, यह परोपकार और सहयोग की समझ (ज्ञान) के बिना संभव नहीं है, इसलिए इसमें ज्ञान और कर्म दोनों का अभिनंदन है जिससे मोक्ष प्राप्त होता है।
क्या आधुनिक समय में यज्ञ करने का अर्थ सिर्फ पूजा-पाठ से ही समझा जा सकता है?
नहीं, भगवान कृष्ण ने स्पष्ट किया है कि 'यज्ञ' का आशय केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि हर उस कार्य को करना है जो समाज और प्रकृति की उन्नति में सहायता करे। आज का शिक्षक, चिकित्सक या सामाजिक工作者 भी जब निस्वार्थ भाव से काम करता है, वह यज्ञ ही कर रहा होता है।
'परम श्रेय' प्राप्त करने के लिए परस्पर भावना क्यों आवश्यक है?
क्योंकि अहंकार और स्वार्थ मनुष्य को बांधे रखते हैं, जबकि 'परस्पर भावना' (एक-दूसरे की उन्नति करना) कर्तव्य के चक्र को तोड़ता है। यह सहयोग का मार्ग तब तक नहीं चल सकता जब तक कि हम अपने स्वयं के लाभ से ऊपर उठकर दूसरों के प्रति दया और सम्मान भाव रखें, जो अंत में परम श्रेय (मोक्ष) की ओर ले जाता है।
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