भगवद्गीता 2.43

Sankhya Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 2.43 — "कामनाओं से युक्त, स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले लोग भोग और ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाली अनेक क्रि"
भगवद्गीता 2.43 — Sankhya Yoga
संस्कृत

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् | क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ||२-४३||

लिप्यंतरण

kāmātmānaḥ svargaparā janmakarmaphalapradām . kriyāviśeṣabahulāṃ bhogaiśvaryagatiṃ prati ||2-43||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो लोग केवल कामनाओं और स्वर्ग में भोग-संपत्ति पाने की इच्छा रखते हैं, वे उन्हें विभिन्न अनुष्ठानों और विशेष क्रियाओं का वर्णन करते हैं। कृष्ण स्पष्ट कर रहे हैं कि ये कार्य अस्थायी सुख दे सकते हैं लेकिन उनका परिणाम नए जन्म के रूप में भोगने वाले पुनर्जन्म को बढ़ाता है। इस श्लोक का मुख्य सिद्धांत यह है कि केवल स्वार्थ और बाहरी फल की आशा से कर्म करना, अज्ञानपूर्ण होता है जो व्यक्ति को मोक्ष मार्ग से दूर ले जाता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'कर्म योग' और 'ज्ञान योग' के बीच के तर्क को समझाता है जो संख्य दर्शन का एक अंग है, जहाँ कृष्ण भक्ति या अनुष्ठानों (karma-kanda) की सीमाओं को स्पष्ट करते हैं। यह सिद्ध करता है कि जब तक व्यक्ति 'काम' और स्वार्थ से मुक्त नहीं होता, तब तक वह किसी भी फल के लिए किए गए कर्म उसे बंधनों में ही रखेंगे। इसका मूल संदेश यह है कि अर्जुन को अपनी स्थिति (स्वयं का धर्म) पर ध्यान देना चाहिए न कि बाहरी भोग-संपत्ति की प्राप्ति के लिए विविध अनुष्ठानों में उलझना चाहिए।

शब्दार्थ
कामात्मानः full of desires, स्वर्गपराः with heaven as their highest goal, जन्मकर्मफलप्रदाम् leading to (new) births as the result of their works, क्रियाविशेषबहुलाम् exuberant with various specifi actions, भोगैश्वर्यगतिम् प्रति for the attainment of pleasure and lordship. No commentary.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में स्थित संध्या समय की पृष्ठभूमि पर आया, जहाँ पांडवों और कौरवों के बीच भीषण संघर्श होने वाला था। इससे ठीक पहले अर्जुन ने हथियार फेंक दिए थे क्योंकि वे अपने गुरुओं और बंधुओं को मारने में असमर्थता का अनुभव कर रहे थे, जिसके बाद कृष्ण ने उन्हें 'संख्य योग' की शिक्षा देनी शुरू की। अर्जुन अभी भी भ्रमित था कि युद्ध करना सही है या नहीं और उसे स्वार्थ के बिना क्या कार्य करना चाहिए, इसमें गहरी उलझन थी। कृष्ण ने अपने शिष्य को समझाने के लिए उन लोगों का वर्णन किया जो केवल धर्म की बाहरी अनुष्ठानों पर निर्भर रहते हैं और स्वर्ग जैसी अस्थायी चीजें चाहते हैं, यह बताकर कि यह रास्ता कौशल नहीं है।

आज के जीवन में

आधुनिक जीवन में एक उदाहरण तब होता है जब कोई व्यक्ति केवल बोनस या प्रमोशन पाने की इच्छा से अपने कार्यालय में अत्यधिक लंबी घंटे काम करता है और अन्य कर्मचारियों को दबाता है, यह मानकर कि यही सफलता का एकमात्र रास्ता है। यदि वह व्यक्ति केवल अपनी निजी वृद्धि (स्वर्ग) पर ध्यान दे रहा हो तो अक्सर इससे नई चिंताएं और पतन आ सकता है जो उसे भविष्य में कर्मों के बंधनों से जकड़ लेते हैं। वास्तविक सफलता तब मिलती है जब काम को अपने दायित्व (dharma) के लिए किया जाए, न कि सिर्फ व्यक्तिगत लाभ या दूसरों पर प्रभाव डालने की आशा में।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करें जैसे कोई दोस्त आपको एक ऐसे खिलौने का लालच देता है जिसके बदले उसे और भी ज्यादा खेलने के लिए कहता है, लेकिन वह भूल जाता है कि अगर आप बार-बार वही काम करते हैं तो आप कभी बड़े नहीं हो पाएंगे। ठीक इसी तरह, जो लोग सिर्फ अच्छा घर या खुशहाल जीवन (जैसे स्वर्ग) पाने के लिए बहुत सारे विशेष तरीके अपनाते हैं, वे अक्सर नई समस्याओं में फंस जाते हैं और दोबारा जन्म लेने की प्रक्रिया चालू रख देते हैं। कृष्ण जी कह रहे हैं कि हमें सिर्फ मजेदार चीजों के पीछे भागना नहीं चाहिए, बल्कि यह समझना चाहिए कि असली खुशहाल कैसे मिलती है।

दैनिक चिंतन

अक्सर हमारी दिनचर्या और सफलता की परिभाषाएं स्वयं ही उन पुरानी आदतों से चलती हैं जो केवल 'भोग' या 'ऐश्वर्य' प्राप्त करने के लिए बनाई गई थीं। जब आप देखते हैं कि दूसरे लोग आपको कितनी विभिन्न क्रियाओं (उपासना, पूजाएं, अनुष्ठान) करने को कह रहे हैं, तो सोचिए कि क्या वे वास्तव में आपके आत्मिक विकास की ओर ले जा रही हैं या केवल जन्म-जन्मांतर का कर्मफल देकर आपको यहाँ ही रोकने वाली हैं। अपनी इच्छाओं (कामना) को स्वीकार करना बुरा नहीं है, लेकिन जब वे आपकी एकमात्र दिशा बन जाएं और स्वर्ग या सुख के लिए बाध्य कर दें, तो यह आपके सच्चे धर्म से विचलन हो जाता है। आज का उद्देश्य यह न हो कि कामनाएं गायब हो जाएं, बल्कि यह हो कि आप इनके पीछे भागे बिना अपना कर्तव्य निभा सकें।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने मन में आने वाली उस कामना को पहचानें जो आपको स्वर्ग या बड़े भोगों की ओर धकेल रही है। यह विचार करें कि क्या आपकी कर्म-क्रियाएं केवल फलाशंसा से प्रेरित हैं, अथवा वे अपने पालनकर्ता का आदेश मानने में संतुष्ट हैं? एक क्षण के लिए इन सभी 'कामनाओं' को छोड़कर बस कर्तव्यपालन पर ध्यान दें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. कामना-संचालित धर्म की सीमाएं
    जब किसी व्यक्ति का जीवन केवल कामनाओं (काम) से भरा होता है, तो उसका दृष्टिकोण स्वर्ग या बड़े पुरस्कार तक ही सिमट जाता है। यह विचारधारा धर्म को एक व्यापार की तरह बना देती है जहां कर्म का फल तत्क्षण मिलने की उम्मीद रहती है।
  2. अनंत क्रियाओं में गुम होना
    फलप्रदायी होने के वादे पर अनेक प्रकार की विशेष कर्म-क्रियाएं (विशिष्ट पूजा, अनुष्ठान) प्रचलित हैं जो लोगों को भोग और ऐश्वर्य दिलाने का आश्वासन देती हैं। ये क्रियाएँ मन में इतनी गहराई से उतर जाती हैं कि व्यक्ति सत्य के प्रति अपने कर्तव्य की ओर देखना बंद कर देता है।
  3. जन्म-कर्म-फल का चक्र
    ये सभी फलप्रदायी क्रियाएं वास्तव में जन्म के रूप में कर्मों के परिणाम (फलाशंसा) को ही प्रदान करती हैं, न कि मोक्ष या मुक्ति की ओर ले जाती हैं। इस प्रकार यह चक्र व्यक्ति को बार-बार जन्म और मृत्यु के सागर में डूबने से रोकता नहीं है बल्कि उसे उसमें अधिक गहरा खींचकर ले जाता है।

विषय

कर्म फल का सिद्धांतस्वर्ग की अस्थायी प्रकृतिअज्ञान और मोहयुक्तिपूर्ण कर्मयोगभोग-संपत्ति से मुक्तिपुनर्जन्म का चक्र

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — यह आया पत्रक इस अध्याय का सार है जो हमें बताता है कि फल की इच्छा के बिना कर्म करना ही असली योग है।
  2. 3.12 — इस श्लोक में वर्णित विस्तृत यज्ञ और भोगों का संबंध यह समझने के लिए महत्वपूर्ण है कि फलप्रदायी कर्म कैसे काम करते हैं।
  3. 12.15 — कृष्ण द्वारा बताए गए ऐसे व्यक्ति की विशेषताएं जो इस प्रकार की भोग-सुख की आकांक्षा से मुक्त होकर स्थिर धैर्य रखते हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह श्लोक क्यों महत्वपूर्ण है और इसका मुख्य संदेश क्या है?
यह श्लोक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उन सभी लोगों के भ्रम को दूर करता है जो कर्मों का उद्देश्य केवल बाहरी सुख या स्वर्ग प्राप्त करना मानते हैं। इसका मूल संदेश यह है कि जब तक व्यक्ति कामनाओं (desires) से मुक्त नहीं होता, तब तक वह किसी भी अनुष्ठान या विशेष क्रिया द्वारा उसे बंधनों और नए जन्मों में ही धकेलेगा।
'कामात्मानः' शब्द का क्या अर्थ है और यह कौन सी स्थिति दर्शाता है?
'कामात्मानः' का अर्थ है 'जिनका मन केवल कामनाओं या इच्छाओं से भरा हुआ हो'। यह उन लोगों की स्थिति को दर्शाता है जो अपने आचरण और कर्मों को सिर्फ अपनी व्यक्तिगत खुशी, धन या स्वर्ग जैसे फलों को पाने के लिए करते हैं, न कि निस्वार्थ भाव से।
क्या यह श्लोक कहता है कि हमें कभी भी किसी अच्छा काम नहीं करना चाहिए?
नहीं, बिल्कुल नहीं। गीता केवल उन 'विशेष क्रियाओं' (kriya-vishesha) का वर्णन कर रही हैं जो सिर्फ फल की आशा से और अहंकार में की जाती हैं। यह कर्म करने को मना नहीं करता, बल्कि हमें कहती है कि कर्म को स्वार्थमुक्त भाव से करें ताकि वह पुनर्जन्म का कारण न बन सके।
'भोगैश्वर्यगतिं प्रति' शब्दों में क्या संदेश छिपा है?
ये शब्द उन लोगों की ओर इशारा करते हैं जो केवल भोग (सुख-सुविधाओं) और ऐश्वर्य (อำนาจ/धन) प्राप्त करने के रास्तों पर चलते हैं। कृष्ण बता रहे हैं कि यदि कोई इन बाहरी चीजों को ही अपना अंतिम लक्ष्य मान लेता है, तो वह स्वयं को नए जन्मों और संसार के चक्र में फंसाने का कार्य कर रहा होता है।
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