भगवद्गीता 2.28

Sankhya Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 2.28 — "हे भारत ! समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त "
भगवद्गीता 2.28 — Sankhya Yoga
संस्कृत

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत | अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ||२-२८||

लिप्यंतरण

avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata . avyaktanidhanānyeva tatra kā paridevanā ||2-28||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि सभी जीवों की अवस्था तीन प्रकार की है: जन्म से पहले वे 'अव्यक्त' (दृश्यमान नहीं) होती है, जीवन भर 'व्यक्त' (देखी जा सकने वाली) रहती है और मृत्यु के बाद फिर 'अव्यक्त' हो जाती हैं। चूंकि यह प्रकृति का एक नियमित और अनिवार्य क्रम है, इसलिए किसी भी प्राणी की इस यात्रा में शोक करना बेहूदा है। कर्मयोगी को चाहिए कि वह इस तथ्य को समझकर दुख के बजाय निष्ठा से कार्य करे।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह उपदेश 'ज्ञान योग' के तहत आता है जो भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया था, विशेष रूप से 'सांख्य दर्शन' की अवधारणा पर आधारित है। यह श्लोक प्राणी की तीन अवस्थाओं (अव्यक्त-व्यक्त-अव्यक्त) के माध्यम से आत्मा और देह में अंतर को स्पष्ट करता है, जो कि कर्मयोग का मूल आधार है।

शब्दार्थ
अव्यक्तादीनि unmanifested in the beginning, भूतानि beings, व्यक्तमध्यानि manifested in their middle state, भारत O Bharata, अव्यक्तनिधनानि unmanifested again in the end, एव also, तत्र there, का what, परिदेवना grief
पारंपरिक भाष्य
The physical body is a combination of the five elements. It is seen by the physical eyes only after the five elements have entered into such combination. After death, the body disintegrates and the five elements go back to their source it cannot be seen. Therefore, the body can be seen only in the middle state. The relationship as son, friend, teacher, father, mother, wife, brother and sister is formed through the body on account of attachment and Moha (delusion). Just as planks unite and separate in a river, just as pilgrims unite and separate in a public inn, so also fathers, mothers, sons and brothers unite and separate in this world. This world is a very big public inn. People unite and separate. There is no pot in the beginning and in the end. Even if you see the pot in the middle, you should think and feel that it is illusory and does not really exist. So also there is no body in the beginning and in the end. That which does not exist in the beginning and in the end must be illusory in the middle also. You must think and feel that the body does not really exist in the middle as well. He who thus understands the nature of the body and all human relationships based on it, will not grieve.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत की युद्धभूमि कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया संदेश है, जहाँ अर्जुन अपने ही रक्त के लिए और मित्रों-शिक्षकों के लिए मृत्यु का डर दिखा रहे थे। पिछले अध्याय में 'संख्या योग' (ज्ञान) की शुरुआत हो चुकी थी और कृष्ण ने आत्मा को अमर सिद्ध किया था, जिसके बाद वे इस प्रकृति के चक्र को समझा रहे हैं। अर्जुन गहरे विषाद में थे कि उनका धर्म (युद्ध) करना है या न करना चाहिए, जबकि कृष्ण उन्हें यह बताकर शांत कर रहे हैं कि मृत्यु एक साधारण परिवर्तन मात्र है।

आज के जीवन में

कल्पना करें कि आपकी कंपनी में बड़े प्रोजेक्ट को समाप्त करने का निर्देश आया और आपको लगा कि वह बहुत महत्वपूर्ण था, अब उसे खोकर दुखी हैं। इस श्लोक के अनुसार, जैसे कोई वस्तु समय के साथ गायब हो जाती है या रूप बदल लेती है (जैसे पुरानी कार को नई मॉडल में अपग्रेड करना), वैसा ही हर व्यवस्था का अंत होता है। आप उस अव्यक्त अवस्था की चिंता करने के बजाय, वर्तमान समय में अपनी भूमिका (कर्म) निभाने पर ध्यान केंद्रित करें ताकि नई शुरुआत को सफल बना सकें और मानसिक शांति पा सकें।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

अर्जुन जैसे छोटे भाई, सोचो जैसे हम स्कूल जाते समय अपने घर में होते हैं (व्यक्त), फिर रात को सोने पर वहां नहीं दिखते या नींद में अदृश्य हो जाते हैं। ठीक वैसा ही हर प्राणी का जीवन होता है: पहले वह छिपा रहता है, फिर हमारे सामने आ जाता है और अंत में वापस गायब (अव्यक्त) हो जाता है। जैसे दिन के बाद रात आती है या पानी जमकर बर्फ बन जाता है, यही प्रकृति का नियम है, इसलिए इस पर रोना नहीं चाहिए।

दैनिक चिंतन

प्रिय पाठक, क्या आपने कभी सोचा है कि आपके द्वारा प्यार किए जाने वाले सभी प्राणी और स्वयं भी उसी अनंत चक्र में बंधे हैं? जैसे सुबह की कोहरा दिन के उजाले में गायब हो जाता है लेकिन वापस आ सकता है, वैसे ही हमारी शरीरिक अवस्थाएं व्यक्त होती हैं और फिर अव्यक्त में मिल जाती हैं। इस सत्य को समझने पर चिंता का बोहल हल्का हो जाता है क्योंकि आप जान जाते हैं कि यह केवल एक मध्यवर्ती यात्रा है, अंत नहीं।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने अस्तित्व को एक गहरी शांति में खो दें, यह सोचते हुए कि आपका वास्तविक स्वरूप जन्म से पहले और मृत्यु के बाद भी वही 'अव्यक्त' है जो कभी नहीं बदलता। जब भी कोई शोक या चिंता मन में आए, तो इसे एक अस्थायी व्यक्त रूप मानकर उसकी गहराई को न देखें बल्कि उसके पीछे छिपे शाश्वत सत्य पर ध्यान दें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. जन्म और मृत्यु की अनिवार्यता का स्वीकार करना
    भगवान कृष्ण बताते हैं कि प्राणी जन्म से पहले अव्यक्त (अदृश्य) होते हैं, फिर शरीर के रूप में व्यक्त होते हैं, और अंत में पुनः अव्यक्त हो जाते हैं। यह एक निश्चित प्रक्रिया है जिसे स्वीकार करना ही शांति की कुंजी है।
  2. शोक का असंगतता
    चूंकि सभी प्राणी अव्यक्त अवस्था से शुरू होकर वहां लौटते हैं, इसलिए मृत्यु के बाद शोक करना या चिंता करना पूर्ण रूप से व्यर्थ है। यह ज्ञान हमें आत्म-विश्वास और मानसिक स्थिरता प्रदान करता है।
  3. अव्यक्त का स्वरूप
    'अव्यक्त' शब्द उन अवस्थाओं को दर्शाता है जहां हमारी आत्मा या चेतना अपने स्रोत में रहती है, जो इंद्रियों से परे और अविभाजित होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह कुछ नहीं है, बल्कि यह एक गहराई वाली स्थिति है जिससे व्यक्त रूप उभरता है।

विषय

आत्मा की अमरताकर्म और परिणामशोक का त्यागप्रकृति का चक्रज्ञान योगविश्वास

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  1. 2.47 — यह अनुच्छेद आपको कर्म के फल की चिंता किए बिना कार्य करने का आदेश देगा, जो अव्यक्त-व्यक्त तर्क पर आधारित है।
  2. 3.30 — इस श्लोक में कृष्ण आपको अपने सभी कर्मों को उन्हें समर्पित करने का आदेश देते हैं, जिससे चिंता मुक्त होकर कार्य किया जा सके।
  3. 12.15 — यह श्लोक आपको एक ऐसे व्यक्ति के रूप में विकसित होने में मदद करेगा जो सभी प्राणियों से डरता नहीं है और जिससे कोई डरता नहीं, जो इस विषय की परिपक्व समझ का प्रतीक है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह श्लोक मृत्यु को क्या कहता है?
इस श्लोक के अनुसार, मृत्यु कोई अंत या खत्म हो जाना नहीं बल्कि एक अवस्था से दूसरी अवस्था में संक्रमण है। प्राणी जन्म और मरण दोनों ही 'अव्यक्त' (दृश्यमान न होने) की स्थिति में होते हैं, केवल बीच का जीवन समय 'व्यक्त' होता है। इसलिए यह प्रकृति का एक स्वतःस्फूर्त नियम है जिस पर शोक करना उचित नहीं है।
क्या इसका मतलब है कि हमें अपने कर्तव्यों को नजरअंदाज कर देना चाहिए?
नहीं, बल्कि इसके विपरीत; जब आप शोक या परिणाम की चिंता से मुक्त होते हैं तो आप अधिक बेहतर और निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्य (धर्म) का पालन कर पाते हैं। यह शिक्षा आपको कार्य के फल में बाधा पैदा करने वाले भय या दुख को दूर करने की प्रेरणा देती है, न कि कार्य से भागने की।
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