भगवद्गीता 9.21

Raja Vidya Raja Guhya Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 9.21 — "वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्यक्षीण होने पर, मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों व"
भगवद्गीता 9.21 — Raja Vidya Raja Guhya Yoga
संस्कृत

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति | एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ||९-२१||

लिप्यंतरण

te taṃ bhuktvā svargalokaṃ viśālaṃ kṣīṇe puṇye martyalokaṃ viśanti . evaṃ trayīdharmamanuprapannā gatāgataṃ kāmakāmā labhante ||9-21||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो लोग केवल वेदों में वर्णित कर्मकांड और स्वर्ग जैसे भोगों की प्राप्ति के लिए पूजा करते हैं, उनकी पुण्यशक्ति समाप्त होने पर उन्हें वापस इस मृत्युलोक (भूमि) पर लौटना पड़ता है। यह श्लोक बताता है कि सांसारिक स्वर्ग भी अस्थायी है और उसका भोग करने के बाद व्यक्ति फिर से जन्म-मरण के चक्र में प्रवेश कर जाता है। मुख्य शिक्षा यह है कि केवल कामनाओं की पूर्ति या तत्काल सुख पर ध्यान देकर नहीं, बल्कि निष्काम भाव और अविनाशी आनंद (ब्रह्मानुभूति) को लक्ष्य बनाकर ही मुक्ति मिलती है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'कर्मा योग' (Karma Yoga) की शिक्षाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भगवान कृष्ण द्वारा 'संसार चक्र' या जन्म-मरण के चक्र को समझाने के लिए प्रयोग किया गया है। यह दर्शाता है कि 'कामनायुक्त कर्म' (Kamya Karma) अस्थायी फल देते हैं और व्यक्ति को पुनर्जन्म में बांधकर रखते हैं, जबकि 'निष्काम कर्म' मुक्ति का मार्ग खोलता है। यह दार्शनिक तंतू ज्ञान योग की ओर भी संकेत करता है कि केवल भोगों से आत्मा को सच्ची शांति नहीं मिल सकती।

शब्दार्थ
ते they, तम् that, भुक्त्वा having enjoyed, स्वर्गलोकम् heavenworld, विशालम् vast, क्षीणे at the exhaustion of, पुण्ये merit, मर्त्यलोकम् the world of mortals, विशन्ति enter, एवम् thus, त्रयीधर्मम् of the three Vedas, अनुप्रपन्नाः abiding by, गतागतम् the state of goind and returning, कामकामाः desiring desires, लभन्ते attain
पारंपरिक भाष्य
When the accumulated merit (the cause of heavenly pleasures) is exhausted, they descend to this world. They come and go. They have no independence. The Dharma of the three Mere Vedic ritual, enjoined by the three Vedas. KamaKamah The people whose minds are filled with Vasanas or worldly tendencies.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान, कुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है, जो 'राजविद्या राजगूह्य योग' (अध्याय 9) का हिस्सा है। इससे ठीक पहले कृष्ण ने अपने दिव्य रूप के बारे में और भक्ति मार्ग की महिमा बताई थी। अर्जुन, जो युद्ध से उदास था और संदेह में था, उन्हें यह समझने की आवश्यकता है कि वेदों द्वारा वर्णित कर्मकांड (काम्या कर्म) केवल सीमित फल देते हैं।

आज के जीवन में

मान लीजिए किसी कंपनी में आप बहुत मेहनत करके एक बोनस या प्रमोशन पा लेते हैं, जो आपको कुछ महीनों तक सुख और आत्मविश्वास दिलाता है; लेकिन जैसे ही वह अवधि पूरी होती है, अगर आपके पास कोई स्थायी कौशल या नई दिशा नहीं बनती, तो फिर से वही बेचैनी लौट जाती है। इसी तरह, जीवन में हम अक्सर केवल आर्थिक संपत्ति (पुण्य) को इकठ्ठा करने पर ध्यान देते हैं और भूल जाते हैं कि यह भी कभी खत्म हो सकती है। वास्तविक शांति तब मिलती है जब हम परिणाम की चिंता किए बिना, अपने कर्तव्यों (Dharma) के लिए निष्काम भाव से कार्य करते हैं और आंतरिक संतोष को अपना आधार बनाते हैं।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जैसे हम स्कूल में अच्छे नंबर लाते हैं तो दोस्तों के साथ खाना खा सकते हैं, लेकिन जब वह मजा समाप्त हो जाता है और अगला दिन आता है, तो फिर से पढ़ना शुरू करना होता है। कृष्ण भगवान कहते हैं कि स्वर्ग में जाकर बहुत सुंदर गीत सुनने और अच्छे खाने का मज़ा लेना भी एक प्रकार की 'अस्थायी छुट्टी' जैसा है, लेकिन जब उसका समय पूरा हो जाता है तो आपको फिर से घर (इस धरती पर) वापस आ जाना पड़ता है। अगर आप हमेशा के लिए खुश रहना चाहते हैं, तो सिर्फ एक बार की छुट्टी का इंतज़ार करने के बजाय सच्ची समझदारी और अच्छे कर्म करना जरूरी है ताकि आपको दोबारा किसी भी दुख या गम में न जाना पड़े।

दैनिक चिंतन

क्या आपके जीवन का उद्देश्य केवल कर्मों का फल भोगना और फिर उसका अंत होने पर पुनः यहाँ लौटना है? यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि तीनों वेदों में वर्णित कर्म-मार्ग भी यदि निष्काम नहीं हुआ, तो वह केवल एक बार का स्वर्गीय सुख दे सकता है, लेकिन अंततः मृत्युलोक की वापसी अनिवार्य करती है। आपकी आत्मा को इस चक्र से मुक्त होने और उस सनातन धाम में जाने का अवसर चाहिए जहाँ कोई पलायन नहीं होता।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने मन में यह विचार करें कि क्या आपकी आध्यात्मिक तलाश केवल अस्थायी सुखों या स्वर्ग की प्रतीक्षा तक सीमित है। गुरु कृष्ण का संदेश स्मरण करते हुए, इस क्षण से ही अपना ध्यान परमात्मा में स्थिर करें और यह प्रतिज्ञा लें कि आप पुनः जन्म-मृत्यु के चक्र को छोड़कर निरंतर शांति की ओर बढ़ेंगे।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. कर्मों की अस्थायी प्रकृति
    भुक्त पुण्य और स्वर्ग भी कालांतर में क्षीण हो जाता है, इसलिए यह केवल एक मध्यवर्ती सुख मात्र है। जब तक हमारा चित्त भोग-वांछना पर टिका हुआ है, तब तक अंततः पलायन (मृत्युलोक) अनिवार्य होता है।
  2. गतागत का चक्र
    काम-वांछना वाले और केवल फलभोगी कर्मयोगी पुरुषों को जन्म और मृत्यु की इस अथान्त प्रणाली (संसार) में ही बंधे रहना पड़ता है। वे आते हैं, सुख भोगते हैं और फिर वापस यहाँ लौट आते हैं, बिना किसी स्थायी मुक्ति के।
  3. परम लक्ष्य की ओर प्रेरणा
    यह श्लोक हमें यह समझने के लिए प्रोत्साहित करता है कि केवल कर्म-कांड या स्वर्ग प्राप्ति ही अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता। सच्चा मोक्ष और ब्रह्मानंद की प्राप्ति के लिए निर्भरता मुक्त भक्ति और ज्ञान का मार्ग अपनाना आवश्यक है।

विषय

अस्थायी सुख और पुण्यकामनायुक्त कर्म (Kamya Karma)जन्म-मरण का चक्र (Samsara)वेदों की सीमाएँनिष्काम भावपरम मुक्ति

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — कर्मफल की मोह-विमोचन और 'कर्तव्यमात्र' का सिद्धांत समझने के बाद यह श्लोक सीधा कड़ी देता है।
  2. 9.25 — इस अध्याय में अगला श्लोक भिन्न-भिन्न उपलब्धियों और उनके परिणामों की तुलना करता है, जो 9.21 के संदर्भ को गहराता है।
  3. 8.16 — मृत्युलोक से मुक्ति और पुनः जन्म न लेने की परमात्मा की वापसी का अंतिम लक्ष्य यहाँ विस्तार से बताया गया है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या स्वर्गलोक हमेशा के लिए नहीं होता?
नहीं, यह श्लोक स्पष्ट करता है कि स्वर्ग भी अस्थायी है। जब वहां भोगने वाले व्यक्ति का पुण्य (अच्छे कर्मों का फल) समाप्त हो जाता है, तो उन्हें फिर से मृत्युलोक या इस संसार में वापस लौटना पड़ता है। इसलिए केवल स्वर्ग की कामना करना मुक्ति नहीं दे सकता।
'त्रयीधर्म' का अर्थ क्या है और यह कहां लागू होता है?
'त्रयीधर्म' से तात्पर्य ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में वर्णित उन विधानों या कर्तव्यों से है जो फल की कामना (काम्या) के साथ किए जाते हैं। यह उन लोगों पर लागू होता है जो पूजा-अर्चना और बलिदान करके स्वर्ग जैसे सुख प्राप्त करने का लक्ष्य रखते हैं, लेकिन भोक्ता बनने के बाद वापस संसार में आ जाना पड़ता है।
क्या इसका मतलब यह है कि कर्म करना बंद कर देना चाहिए?
नहीं, इसका अर्थ यह नहीं है कि कर्म छोड़ दें। गीता का मूल संदेश 'निष्काम कर्म' या बिना फल की आस के कार्य करने को कहता है। जब हम अपने धर्मा (कर्तव्य) के लिए निस्वार्थ भाव से काम करते हैं, तो पुण्य क्षय होने पर भी हमें वापस संसार में नहीं लौटना पड़ता और मुक्ति का मार्ग खुल जाता है।
'गत-आगत' शब्द का क्या तात्पर्य है?
'गत-आगत' (Gata-Agata) का अर्थ है 'जाना और वापस आना', जो जन्म और मृत्यु के चक्र को दर्शाता है। यह बताता है कि जिस व्यक्ति की इच्छाएं अभी भी भोगों में केंद्रित हैं, वह एक बार स्वर्ग जाने के बाद फिर से इस संसार में जन्म लेगा, और ऐसा चलता रहेगा जब तक उसे आत्म-ज्ञान नहीं मिल जाता।
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