भगवद्गीता 3.15

Karma Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 3.15 — "कर्म की उत्पत्ति ब्रह्माजी से होती है और ब्रह्माजी अक्षर तत्त्व से व्यक्त होते हैं। इसलिये सर्व व्या"
भगवद्गीता 3.15 — Karma Yoga
संस्कृत

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् | तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ||३-१५||

लिप्यंतरण

karma brahmodbhavaṃ viddhi brahmākṣarasamudbhavam . tasmātsarvagataṃ brahma nityaṃ yajñe pratiṣṭhitam ||3-15||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि मनुष्य का कार्य (कर्म) ब्रह्मा जी से उत्पन्न हुआ है, जो स्वयं अनंत और नश्वर नहीं होने वाले 'अक्षर' तत्त्व या परब्रह्म से आया है। इसका सरल अर्थ यह है कि पूरा विश्व और उसमें चलने वाली हर क्रिया ब्रह्मांडीय सत्य के चक्र में ही जन्म लेती हैं। इसलिए, सभी प्रकार का कर्म वास्तव में ईश्वर की स्वीकृति से होने वाले एक यज्ञ या पवित्र प्रक्रिया का हिस्सा है और इसका अंत भी उसी में होता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'कर्म योग' की मूलभूत अवधारणा पर आधारित है जो दार्शनिक रूप से सांख्य और वेदान्त के सिद्धांतों का समन्वय करता है। यह बताता है कि कर्म स्वतंत्र नहीं हैं, बल्कि वे एक अदृश्य क्रम (अक्षर) से जुड़े हुए हैं जिसे 'ब्रह्मा' कहा जाता है, और इस प्रकार सभी कार्य वास्तव में ईश्वरीय यज्ञ का हिस्सा बन जाते हैं।

शब्दार्थ
कर्म action, ब्रह्मोद्भवम् arisen from Brahma, विद्धि know, ब्रह्म Brahma, अक्षरसमुद्भवम् arisen from the Imperishable, तस्मात् therefore, सर्वगतम् allpervading, ब्रह्म Brahma, नित्यम् ever, यज्ञे in sacrifice, प्रतिष्ठितम् (is) established
पारंपरिक भाष्य
Brahma may mean Veda. Just as the breath comes out of a man, so also the Veda is the breath of the Imperishable or the Omniscient. The Veda ever rests in the sacrifice, i.e., it deals chiefly with sacrifices and the ways of their performance. (Cf. IV.24 to 32).Karma Action? Brahmodbhavam arisen from the injunctions of the Vedas.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर स्थित है जहाँ अर्जुन ने भीम और द्रोणाचार्य जैसे अपने ही गुरुओं को मारने से इनकार कर दिया था क्योंकि उन्हें लग रहा कि यह अधर्म (अनीति) होगा। भगवान श्री कृष्ण ने पहले उसी युद्ध में 'कर्म योग' की शुरुआत करते हुए अर्जुन को समझाया है, और अब वे उसे गहरे आध्यात्मिक सत्य से जोड़ रहे हैं कि कार्य क्यों किया जाता है। इस समय अर्जुन का मन संदेह और दुख में उलझा हुआ था, इसलिए कृष्ण उन्हें यह बताकर शांति देते हैं कि हर क्रिया एक बड़े चक्र (यज्ञ) की ओर ले जाती है।

आज के जीवन में

कल्पना करें कि आप किसी अत्यंत तनावपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं और परिणाम को लेकर बहुत घबराए हुए हैं, मानो सब कुछ आपके हाथ में हो। इस श्लोक का उपयोग यह समझने के लिए है कि आपका कार्य स्वयं ब्रह्मांडीय न्याय या कानून (कर्म सत्य) का हिस्सा है और परिणाम ईश्वर की स्वीकृति पर निर्भर करता है। जब आप इस सोच से काम करते हैं, तो घबराहट कम हो जाती है और आप केवल प्रक्रिया में ध्यान केंद्रित कर सकते हैं, न कि सिर्फ फल (परिणाम) को लेकर चिंता करते हुए।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

सोचिए जैसे बर्फ टूटकर नदी बनती है, जो समुद्र में मिल जाती है; ठीक वैसे ही हमारे काम (कर्म) एक बड़े स्रोत से आते हैं और फिर वहीं लौट जाते हैं। भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि जैसे आपका हाथ मां के शरीर से निकला होता है, उसी तरह आपके हर अच्छे या बुरे कार्य भी ईश्वर की योजना का हिस्सा होते हैं। जब हम किसी काम को बिना स्वार्थ के और दूसरों के भले के लिए करते हैं, तो वह एक 'यज्ञ' बन जाता है जो सबको खुश करता है।

दैनिक चिंतन

आज आप जो कुछ भी कर रहे हैं, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, उसे स्वयं की सीमाओं से ऊपर उठाकर देखें। यह कार्य केवल व्यक्तिगत नहीं है, بلकि यह उस अमर तत्व (ब्रह्म) का प्रवाह है जिससे सृष्टि चल रही है और जो सभी यज्ञों में निवास करता है। जब आप अपने कर्मों को ब्रह्मा से जुड़ा हुआ समझेंगे, तो आपको कार्य करने की थकान नहीं लगेगी, बल्कि एक गहरा शांति अनुभव होगा कि आप उसी अमर धारा का साधन बन रहे हैं।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के आरंभ में, अपने किये जा रहे कार्यों को देखें और समझें कि यह कार्य ब्रह्मा (सृष्टि) से उत्पन्न हुआ है। मन ही सूर्य की तरह प्रकाशित होने वाले अक्षर तत्व से जुड़े हुए इस अनंत यज्ञ का हिस्सा बनने के लिए, अपने कर्मों को ईश्वर-अर्पण समझकर करें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. कर्मा का मूल स्रोत: ब्रह्म (Karma Source)
    यह अनुशासन बताता है कि सभी कर्मों की उत्पत्ति 'ब्रह्मा' से होती है, जो आदि सृष्टि के नियंत्रणकर्ता हैं। यह दर्शाता है कि कोई भी कार्य अकेला नहीं होता, बल्कि वह विश्व रचना का एक अनिवार्य हिस्सा है।
  2. अक्षर तत्व की चेतना (The Imperishable Source)
    ब्रह्मा स्वयं 'अक्षर' अर्थात नश्वर से भिन्न, शाश्वत और निरंतर सत्य तत्त्व से प्रकट होते हैं। इसका तात्पर्य है कि हमारे सभी कर्मों की जड़ें उस अनंत चेतना में होती हैं जो समय के साथ नहीं बदलती।
  3. सर्वव्यापी यज्ञ (Brahma as the Eternal Yajna)
    चूंकि ब्रह्म सर्वव्यापक है, इसलिए पूरा सृष्टि एक निरंतर चलने वाला 'यज्ञ' या समर्पण का माध्यम बन जाता है। हमें यह समझना चाहिए कि जीवन में प्रत्येक कार्य इसी शान्त और पवित्र यज्ञ की अभिव्यक्ति होनी चाहिए।

विषय

कर्म योग की प्रक्रियाब्रह्म और अक्षर तत्त्व का संबंधयज्ञ के रूप में जीवन जीनाअनंत स्रोत से कार्य की उत्पत्तिईश्वरीय नियंत्रण और कर्मसर्वव्यापी ब्रह्म

संबंधित श्लोक

2.473.95.106.3418.46

आगे पढ़ें

  1. 2.47 — इस अध्याय के आरंभिक संदेश को समझने के लिए, जो कर्म फल की इच्छा न करने का सिद्धांत बताता है।
  2. 3.9 — क्योंकि यह अनुशासन 'यज्ञ' और बंधन-मुक्ति के संबंध को स्पष्ट करता है जो वर्तमान श्लोक की गहराई बढ़ाता है।
  3. 12.15 — क्योंकि यह भगवान कृष्ण द्वारा उच्च आदर्शों और सर्वव्यापी प्रेम के लिए तत्पर होने का वर्णन करता है जो इस दार्शनिक विस्तार से मेल खाता है।

अनुशंसित पुस्तकें

GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.

इस श्लोक को साझा करें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक का मुख्य संदेश क्या है?
मुख्य संदेश यह है कि हमारा हर कर्म किसी बड़े स्रोत (ब्रह्मा) से आता है जो स्वयं अमर तत्त्व पर आधारित है। इसलिए, जब हम बिना लालच के कार्य करते हैं तो वह ईश्वरीय यज्ञ का हिस्सा बन जाता है और उसका फल भी वही होता है।
'अक्षर' शब्द से इसमें क्या समझा गया है?
इस संदर्भ में 'अक्षर' का अर्थ है वह तत्त्व जो नष्ट नहीं होता, अनंत और स्थायी है। यह परब्रह्म या ईश्वरीय सत्य को दर्शाता है जिससे ब्रह्मा (उपनिषदों के अनुसार) उत्पन्न हुआ है।
क्या इसका अर्थ है कि हमें कर्म नहीं करना चाहिए?
बिल्कुल नहीं, इसके विपरीत यह कहता है कि कर्म करने वाले को चिंता छोड़नी चाहिए क्योंकि कार्य स्वयं ब्रह्मांडीय नियम का हिस्सा हैं। यहाँ पर 'कर्मयोग' की बात हो रही है जहाँ व्यक्ति फल के भय या लालच से मुक्त होकर अपने कर्तव्य को निभाता है।
'नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्' का क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है कि सृष्टि में ईश्वर (ब्रह्म) हमेशा एक पवित्र अनुष्ठान या 'यज्ञ' के रूप में कार्य कर रहे हैं। हर क्रिया, चाहे वह प्राकृतिक हो या मानवीय, उसी शक्ति का विस्तार है जो स्थिर और सदाचार्यता से चलती रहती है।
अन्य भाषाओं में: भगवद्गीता 3.15 →