भगवद्गीता 17.22

Shraddhatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 17.22 — "जो दान बिना सत्कार किये, अथवा तिरस्कारपूर्वक, अयोग्य देशकाल में, कुपात्रों के लिए दिया जाता है, वह द"
भगवद्गीता 17.22 — Shraddhatraya Vibhaga Yoga
संस्कृत

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते | असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ||१७-२२||

लिप्यंतरण

adeśakāle yaddānamapātrebhyaśca dīyate . asatkṛtamavajñātaṃ tattāmasamudāhṛtam ||17-22||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि दान का एक रूप है जो तामस (अज्ञानी और मंद) माना जाता है। जब कोई व्यक्ति बिना सम्मान के, किसी अप्राप्त पात्र को या बिल्कुल गलत समय पर दान देता है, तो वह दान नहीं बनता। कृष्ण कहते हैं कि ऐसा कार्य तिरस्कारपूर्वक किया गया और उसका फल भी नगण्य होता है। इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि दान की शुद्धि उसके माध्यम (दानी), समय, स्थान और पात्र पर निर्भर करती है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक कर्म योग (Karma Yoga) के सिद्धांतों को विकसित करता है जो बताता है कि किसी भी कार्य का मूल्य उसकी 'भावना' और 'प्रकृति' में निहित होता है। यह त्रिगुण (सात्विक, राजसी, तामसिक) की अवधारणा पर आधारित है जिसके अनुसार मानव कर्मों को उनके गुणों के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। इसमें विशेष रूप से 'दशा' और 'पात्रता' का सिद्धांत जोड़ा गया है कि कैसे अज्ञान या तिरस्कार युक्त कार्य आत्म-साक्षात्कार में बाधा डालते हैं।

शब्दार्थ
अदेशकाले at a wrong place and time, यत् which, दानम् gift, अपात्रेभ्यः to unworthy persons, च and, दीयते is given, असत्कृतम् without respect, अवज्ञातम् with insult, तत् that, तामसम् Tamasic, उदाहृतम् is declared to be
पारंपरिक भाष्य
Adesakale At a wrong place and time At a place which is not holy, where irreligious people congregate and where beggars assemble, where wealth acired through illegal means such as gambling, theft, etc., is distributed to gamblers, singers, fools, rogues, women of evil reputation and at a time which is not auspicious. But, this does not discourage giving alms or other charity to the poor and the needy. In their case these restrictions do not apply. Without respect, etc. Without pleasant speech, without the washing of feet or without worship, although the gift is made at a proper time and place. The donor does not give in good faith although he gets a worthy recipient. He never bends his head in worship. He does not offer him a seat. He treats him with contempt or disrespect. Lord Krishna says to Arjuna I have described that faith, charity, austerity, food, etc., are invariably coloured by the three alities. There was no desire on My part to refer to the lower ones but to distinguish the highest purity it was necessary to point out the mark of the other two. When the two are set aside, the third is more clearly appreciated in the same way as if day and night are removed the twilight is seen better. Even so be avoiding passion and darkness, the third, viz., purity or Sattva becomes vividly clear and purity which is the best can be easily realised. Thus in order to show thee the real nature of purity? I have described the other two, so that laying them aside, and resorting to the highest thou mayest attain the goal, viz.? Moksha.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध मैदान में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेश देते समय कहा गया था, जहाँ पांडवों का विरोधी द्रोणाचार्य और भीम जैसे महान योद्धार हैं। इससे पहले कि कृष्ण तामसिक दान के बारे में बताएं, उन्होंने सत्त्वगुणी (शुद्ध) और रजोगुणी (रागात्मक) दान का वर्णन किया था ताकि अर्जुन को पता चले कि कैसे गुणों की स्थिति हमारे कर्मों को प्रभावित करती है। युद्ध के तनावपूर्ण वातावरण में, जब अर्जुन संदेह और दुख से घिरे थे, यह उपदेश उन्हें सिखाता था कि सही इरादें और समय का पालन करना ही धर्म की निडरता बनाता है।

आज के जीवन में

आधुनिक जीवन में, यदि कोई व्यक्ति कार्यालय में अपनी टीम के सदस्य को बिना सम्मान या खुशी के बोनस देता है या किसी जरूरतमंद को दान करते समय उनकी गरिमा का अपमान करता है, तो वह कार्य तामस माना जाएगा। यह स्थिति उस नौकरीदाता से भी जुड़ सकती है जो कर्मचारियों की मदद करने की बात कहते हैं लेकिन उन्हें उपेक्षित रखते हैं और गलत वक्त पर निर्णय लेते हैं। ऐसे में, व्यक्ति को चाहिए कि वह दान या सहायता करते समय दूसरों के मनोभाव का ख्याल रखें और यह सुनिश्चित करें कि देने की प्रक्रिया सम्मानजनक हो, न कि तिरस्कारपूर्ण।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

सोचिए आप अपने दोस्त को तोहफा देना चाहते हैं लेकिन उसे गुस्से में फेंक देते हैं या किसी ऐसे बच्चे को देते हैं जो उसकी देखभाल नहीं कर सकता, क्या वह अच्छा होगा? भगवान कृष्ण कहते हैं कि दान तभी सही है जब आप प्यार और सम्मान से दें। अगर आप बिना मुस्कुराए या गलत समय पर कोई चीज देकर दूसरों को दुख पहुँचाएं, तो वह 'तामस' या बुरे तरह का काम कहलाता है। असली दान दिल से दिया गया प्यार और सम्मान होता है।

दैनिक चिंतन

क्या आप कभी ऐसे दान में शामिल हुए हैं जहाँ देने वाले की नजरों में गुरुत्व था या प्राप्त करने वाला उससे तिरस्कृत हुआ? भगवान श्रीkrishna हमें सिखाते हैं कि दान का मूल्य पैसों में नहीं, बल्कि उसके दिए जाने के भाव और संदर्भ में निहित है। आज की चुनौती यह है कि आप किसी को ऐसे तरीके से मदद करें जिससे उनकी आत्मा गौरवान्वित हो, न कि हतोत्साहित। जब हम दान तामसिक नहीं बल्कि सात्विक बनाते हैं, तो वह हमारे और दूसरों के जीवन में सच्चे सुख का मार्ग प्रशस्त करता है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के आत्म-मंथन में विचार करें कि क्या आपका दान या सेवा किसी की कद्र बढ़ाती है या उसे घटा रही है। अपने मन को शिष्टता और सम्मान से प्रेम का एक ऐसा वार्षिक बनने दें जो बिना किसी अपेक्षा के, सही समय पर और योग्य पात्र को दिया जाए।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. दान की शुद्धि काल और स्थान पर निर्भर करती है
    यदि दान किसी अनुचित समय या असंगत जगह दिया जाए, तो वह तामसिक हो जाता है। सही समय (desha-kala) का पता लगाना भी दान के गुण की पहचान में महत्वपूर्ण है।
  2. प्राप्तकर्ता की पात्रता और सम्मान
    अयोग्य व्यक्तियों को दान देना या उन्हें तिरस्कारपूर्वक उपहार देना, उस कार्य के फल को नष्ट कर देता है। दान में प्राप्त करने वाले का आदर करना अनिवार्य है ताकि वह सात्विक बने।
  3. तमोगुण से मुक्ति का मार्ग
    जब हम अज्ञानता या अवमानना के साथ दान देते हैं, तो यह तमस् की चिड़िया को बढ़ावा देता है। इसे सुधारकर सही उद्देश्य और सम्मान के साथ देने से हम आत्मिक विकास कर सकते हैं।

विषय

दान का महत्वत्रिगुण (सात्विक, राजस, तामस)कर्म की शुद्धतासम्मान और विनम्रताधार्मिक कर्तव्यआत्म-परिवर्तन

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आगे पढ़ें

  1. 17.20 — इस अघ्या के बाद यह पढ़ें ताकि सात्विक दान की परिभाषा और उसके लक्षणों को समझ सकें।
  2. 9.26 — यह श्लोक आपको सिखाएगा कि भगवान तक छोटे से प्रेमपूर्ण दांन भी कैसे स्वीकार किया जाता है, जो दान के मूल भाव को उजागर करता है।
  3. 18.5 — अंत में यह पढ़ें ताकि आप समझ सकें कि तामसिक क्रियाओं से मुक्ति कैसे प्राप्त की जा सकती है और कर्मों का शुद्धीकरण क्या है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तामस दान और सात्विक दान के बीच मुख्य अंतर क्या है?
तामस दान बिना सम्मान या तिरस्कारपूर्वक, गलत समय पर और अप्राप्त पात्रों को दिया जाता है जो कि मंद बुद्धि वाला होता है। इसके विपरीत, सात्विक दान में देते समय खुशी होती है, उचित स्थान-समय का चयन किया जाता है और प्राप्तकर्ता की गरिमा का सम्मान किया जाता है।
आधुनिक जीवन में 'अदेश काल' को कैसे पहचाना जाए?
'अदेश काल' का अर्थ है गलत समय या स्थिति। आधुनिक संदर्भ में, यदि आप किसी व्यक्ति की भावनाओं के लिए अनुकूल नहीं समय (जैसे कि वे बहुत दुखी हों) पर दान देते हैं और वह उन्हें और अधिक उदास कर देता है, तो उसे गलत समय माना जाएगा। सही काल तब होता है जब दान देने से दोनों पक्षों को सुविधा मिले।
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